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राजीव के होने की अहमियत

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:06 PM IST

राजीव गांधी की जन्मतिथि पिछले हफ्ते कांग्रेस पार्टी ने मनाई। उनकी हत्या 17 साल पहले कर दी गई थी, इसलिए 30 साल से कम उम्र के ज्यादातर लोगों को उनके बारे में याद भी नहीं होगा।


पीछे मुड़कर देखें तो इसका अंदाजा लगाना भी काफी मुश्किल होगा कि भारत जैसे बड़े और जटिल मुल्क का प्रधानमंत्री एक 40 साल का शख्स हो सकता है। वह ऐसा शख्स, जिसके पास केवल हवाई जहाज उड़ाने का अनुभव हो। राजनीति में उनके 10 साल कई मुश्किलों, कामयाबियों और नाकामयाबियों से घिरे हुए हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या वह वक्त आ गया है, जब इतिहास को उस शख्स का आकलन करना चाहिए। राजीव गांधी ने खुद को कभी उस तरह से नहीं सोचा होगा, लेकिन वह हिंदुस्तान के आखिरी दूरदर्शी राजनेता थे। अगर आप उनकी पहलों की जबरदस्त सूची पर नजर दौड़ाएंगे तो आपको भी पता चल जाएगा क्यों। उनका कहना था कि 21वीं सदी के वास्ते खुद को तैयार करने के लिए देश को कंप्यूटरों को गले लगाना ही पड़ेगा।

तब इस बात का राजनीतिक गलियारों में खूब मजाक उड़ाया गया। कई दूसरे लोगों ने भी इसे एक मजाक के तौर पर लिया था क्योंकि तब पसर्नल कंप्यूटर बस पैदा भर हुए थे। लेकिन उनका सोचना सही था। उन्होंने टेलीकम्युनिकेशंस की अहमियत को बड़े गौर से समझा था। उन्होंने ही टेलीफोन सेवा का कॉर्पोरेटाइजेशन किया था और इस तरह जन्म हुआ एमटीएनएल का।

उन्होंने दूरसंचार की पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया और इस तरह अस्तित्व में आए हर नुक्कड़ पर मौजूद एसटीडी बूथ। उन्होंने नतीजे देने में सरकारी नाकामयाबी का अंदाजा काफी पहले लगा लिया था। उन्होंने सरकारी बाबुओं की खुद को तकनीकी रूप से अलग रखने की आदत का अंदाजा लगा लिया था। इसलिए राजीव गांधी ने उन्हें समय-समय पर मिड टर्म टे्रनिंग देने की पुरजोर वकालत की।

जैसा उनके ज्यादातर सुझावों के साथ हुआ, इन मुद्दों पर उनकी हंसी उड़ाई गई। उन्होंने केवल अमीर घरों में पैदा हुए बच्चों को ही स्कूल जाते हुए देखा था। इसलिए उन्होंने हर जिले में नवोदय विद्यालय का सपना देखा, जहां गरीब बच्चों को भी अच्छी शिक्षा मिलती। आज मुल्क के स्कूलों में सबसे अच्छा रिजल्ट नवोदय विद्यालय का ही होता है।

उन्होंने देसी नदियों पर मंडराते खतरे को देखा, तो ‘गंगा सफाई अभियान’ अस्तित्व में आया। उस वक्त किसी को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में कानोंकान खबर भी नहीं थी, लेकिन उन्होंने उस खतरे को देखा और भारतीय सेना को परमाणु हथियारों का जखीरा बनने की इजाजत दे दी।

दूसरी तरफ, वह नेहरू से भी बड़े शांतिप्रिय नेता थे। उन्होंने राष्ट्रपति जयवर्ध्दने के साथ बात करके तमिलों को सबसे अच्छा सौदा मुहैया करवाया था, लेकिन लिट्टे की मोटी बुध्दि में यह बात नहीं घुसी। उन्होंने इस दूरदर्शी नेता की हत्या कर डाली। उनके शासनकाल में ही पंजाब, असम और मिजोरम में चरमपंथियों के साथ वार्ताएं हुईं।

पंजाब के मामले में तो उनकी शिकस्त हुई, लेकिन बाकी के दो मामलों में दोनों पक्षों के बीच वार्ता हुई। हालांकि, उन्होंने तीनों मामलों में पूरी समझदारी और गंभीरता दिखाई थी। आर्थिक मोर्चे पर भी उन्होंने खुद को एक दूरदर्शी नेता साबित किया। अपने पहले ही बजट में उन्होंने आयकर की 66 फीसदी की उच्चतम दर को कम करके 50 फीसदी कर दिया।

1991 के आम चुनाव में कांग्रेस का जो घोषणापत्र आया था, उससे साफ और बोल्ड घोषणा पत्र का इंतजार कांग्रेस पार्टी को आज भी है। उसके ज्यादातर कदमों को ही अपना कर नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने भारत को आर्थिक आजादी दिलाई थी। पहल के मामले में तो राजीव गांधी की बराबरी केवल उनके नाना जवाहरलाल नेहरू से हो सकती है।

उन्होंने कई ऐसे पहल को अमली जामा पहनाया, जिसकी कमाई हम आज भी खा रहे हैं। अगर राजनीति उनके पल्ले नहीं पड़ी तो इसकी चार वजहें हो सकती हैं। पहली बात तो यह कि वह दिल की आवाज सुनते थे या उनका तरीका आम भारतीय से जुदा था या बोफोर्स तोप दलाली कांड। या फिर वह काफी युवा थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उस इंसान की उसके कदमों के लिए इज्जत नहीं करें।

First Published : August 23, 2008 | 4:44 AM IST