भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार में शुभेंदु अधिकारी के एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी के बीच ममता बनर्जी के कई समर्थकों को कुछ साल पहले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की कैबिनेट बैठक में हुई एक बातचीत को याद करना चाहिए। ममता ने अचानक हंगामा किया और उठकर बैठक से चली गईं। एक मंत्री ने झुंझलाकर कहा, ‘ममता को क्या हो गया है!’
हालांकि मंत्री ने यह ऐसे ही बोल दिया था लेकिन वहां मौजूद प्रणव मुखर्जी ने इसका उत्तर देना उचित समझा। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे साफ किया, फिर से पहना और धीरे से कहा: ‘अगर कोई यह सोचे कि वह रवींद्रनाथ ठाकुर से बेहतर कवि, बीथोवेन से बेहतर (संगीतकार) और लियोनार्दो दा विंची से बेहतर चित्रकार है, तो फिर उसके लिए सब कुछ एक समस्या है।’
यह ममता की ही अतिवादी सोच थी, और केवल उन्हीं की, जिसने शुभेंदु अधिकारी को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से बाहर निकालकर भाजपा की गोद में धकेल दिया।
अधिकारी का प्रभाव क्षेत्र दक्षिण बंगाल है। उनके पिता शिशिर अधिकारी कांग्रेसी और प्रभावशाली नेता थे, जो मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। वामपंथियों के वर्चस्व वाले कोंताई और तमलुक के इलाकों में,कांग्रेस का झंडा बुलंद था। वामपंथियों का साम्राज्य धीरे-धीरे ढहता गया, नंदीग्राम ने इसके पतन को और तेज कर दिया। शुभेंदु अधिकारी ने ही वामपंथियों द्वारा ‘भूमि हड़पने’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
उनकी क्षमता को पहचानते हुए, ममता ने उन्हें टीएमसी युवा शाखा का अध्यक्ष और उस समय माओवादी समूहों के प्रभाव में रहे जंगलमहल के लिए पार्टी का पर्यवेक्षक बनाया। पांच साल से भी कम समय में, टीएमसी कांग्रेस और वामपंथी दलों, दोनों से यह राजनीतिक क्षेत्र छीनने में सफल रही। साथ ही क्षेत्र के उन युवाओं का विश्वास भी पुनः प्राप्त करने में कामयाब रही जो वामपंथी उग्रवाद की ओर अग्रसर हो रहे थे।
उनका उदय प्रभावशाली रहा। 2009 में, शुभेंदु तमलुक से लोक सभा के लिए चुने गए, उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता लक्ष्मण सेठ को 1,72,000 वोटों से हराया। वर्ष 2014 में उन्होंने माकपा के इब्राहिम अली को हराकर तमलुक संसदीय सीट बरकरार रखी।
टीएमसी ने 2016 में उन्हें नंदीग्राम विधान सभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया। उनका मुकाबला वाम मोर्चा और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार अब्दुल कादिर शेख से था। शुभेंदु ने 67 फीसदी से अधिक वोट प्राप्त करके जीत हासिल की। उनकी शानदार जीत के बाद ममता ने उन्हें परिवहन मंत्री बनाया। वर्ष 2018 में उन्हें पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार भी दिया गया। लेकिन ममता उनके बढ़ते प्रभाव से चिंतित होने लगीं।
इसके अलावा, उनकी अपनी उत्तराधिकार योजना थी जिसमें शुभेंदु का कोई स्थान नहीं था। लेकिन वह उनके सिद्ध राजनीतिक कार्यों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकीं, इसलिए एक समानांतर संगठन, टीएमसी युवा बनाया गया और उनके भतीजे अभिषेक को इसका प्रमुख चुना गया। बाद में उन्होंने टीएमसी युवा को भंग कर दिया और टीएमसी की युवा शाखा को पुनर्जीवित किया: एक बार फिर अभिषेक के नेतृत्व में। शुभेंदु का उपयोग पार्टी को मजबूत करने के लिए किया गया, लेकिन उन्हें ममता के करीबी लोगों में कभी शामिल नहीं किया गया।
वह भी दरबारी कहलाना पसंद नहीं करते थे। विधायक के रूप में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वह कभी भी कोलकाता में रात न बिताएं। वह प्रतिदिन अपने निर्वाचन क्षेत्र से राज्य की राजधानी तक 200 किलोमीटर की दूरी तय करते थे, कभी-कभी रात के 1 बजे घर पहुंचते थे और फिर सुबह जल्दी काम पर जाने के लिए निकल जाते थे।
मुख्यमंत्री और उनके सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्री के बीच विश्वास की कमी स्पष्ट हो गई। उन्होंने एक बार कहा था, ‘मैं परिवहन मंत्री था, लेकिन मंत्रालय ममता चला रही थीं।’ अपमानों का सिलसिला बढ़ता ही गया। इन सबके मूल में ‘शुभेंदु और अभिषेक के बीच की प्रतिद्वंद्विता थी। वर्ष 2020 में दुर्गा पूजा के दौरान तो ऐसा लगा मानो मतभेद सुलझ ही नहीं सकते। शुभेंदु के निर्वाचन क्षेत्र में उनके द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों में हर जगह पोस्टर लगे हुए थे जिन पर लिखा था: ‘दादार अनुगामी (दादा का अनुयायी)।’
आधिकारिक तौर पर शुभेंदु ने इस बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार किया। लेकिन इन कार्यक्रमों में टीएमसी का कोई बैनर या ममता की तस्वीर नहीं थी। इसी बीच, टीएमसी नेता नंदीग्राम गए और वहां एक बैठक की, जिसमें उन्हें ‘मीर जाफर’ कहकर संबोधित किया गया। उसी वर्ष के अंत में 2021 के विधान सभा चुनावों से पहले शुभेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हो गए।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद, ममता की अपनी पार्टी पर ऐसी पकड़ थी कि नेताओं को पता था कि उन्हें उनकी हर जिद पूरी करनी होगी अन्यथा दरकिनार कर दिया जाएगा। इसके चलते कुछ ऐसे अप्रत्याशित परिणाम सामने आए कि कई नेताओं को, जो यह मानकर चल रहे थे कि उनका राजनीतिक भविष्य बहुत उज्ज्वल है, ममता द्वारा दरकिनार किए जाने के बाद यह पता चला कि उन्हें आखिर क्यों बाहर का रास्ता दिखाया गया था। उदाहरण के लिए, उन्हें दरकिनार किए जाने के कारणों में ममता के गाते समय रवींद्र संगीत को पूरी एकाग्रता के साथ न सुनना या ममता की बताई दवाएं न लेना (वह खुद को डॉक्टर समझती हैं) शामिल हैं।
अब जब ममता मुश्किल हालात में खड़ी हैं, तो उन्हें खुद का, उन सभी लोगों का जिन्हें उन्होंने खुद से दूर कर दिया है, गहराई से आकलन करने की जरूरत है और खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर क्यों उनकी दुनिया उनके पैरों के पास ही खंडहर बनकर बिखर गई है।