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महज कर सुधार से कहीं बढ़कर है जीएसटी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 5:50 PM IST

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की अभी तक की यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण रही है। इस दौरान जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन) प्लेटफॉर्म को कई तकनीकी फिसलनों का सामना करना पड़ा। वहीं छोटे उद्यमों के समक्ष जीएसटी के अंतर्गत पंजीकरण को लेकर भी एक हिचक थी। और इनसे भी बढ़कर चुनौती थी जीएसटी को लेकर जमीनी स्तर पर केंद्र और राज्यों के अधिकारियों के बीच समन्वय बनाने की। बहरहाल इसके सूत्रपात के पांच वर्ष बाद अंततः जीएसटी का मजबूत ढांचा सामने दिखा है। इसने समूची मूल्य वर्धन श्रृंखला (वैल्यू चेन) को एकीकृत कर दिया है, जिसमें कच्चे माल से लेकर खुदरा तक की पूरी कड़ियां शामिल हैं, जिसमें केंद्र और राज्यों के दोहरे कराधान के लक्ष्य की पूर्ति हुई है।
धीरे-धीरे ही सही, लेकिन जीएसटी राजस्व में तेजी आई है। यह लाभ मुख्य रूप से बेहतर कर अनुपालन के कारण हुआ है। इस अनुपालन को कई पहलुओं ने सुगम बनाया है। मसलन आपूर्ति रसीदों (इनवॉयस) की अपलोडिंग से इनपुट क्रेडिट को जोड़ना। 20 लाख रुपये से अधिक के सालाना कारोबार करने वाले उद्यमों के लिए ई-इनवॉयस की व्यवस्था। 50,000 रुपये से अधिक की खेप के लिए ट्रांसपोर्टरों द्वारा ई-वे बिल दाखिल करने जैसे प्रावधानों ने यह अनुपालन आसान बनाया है। अद्यतन आंकड़े दर्शाते हैं कि वित्त वर्ष 2020-21 में जो जीएसटी संग्रह जीडीपी का 5.8 प्रतिशत था वह 2021-22 में बढ़कर जीडीपी का 6.4 प्रतिशत हो गया। यह स्थिति तब है जब भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार ड्यूटी के मामलों में तीन प्रतिशत की गिरावट आई, जिसने जीएसटी संग्रह को एक प्रतिशत तक गिराने का काम किया। अरविंद सुब्रमण्यन और जोश फेलमैन ने अपने एक हालिया आलेख में इसका उल्लेख किया है। ऐसे में यदि राजस्व निरपेक्ष  जीएसटी पूर्व की 14.8 प्रतिशत की दर को कायम रखा जाता तो 2021-22 के दौरान जीएसटी-जीएसडीपी अनुपात असल में 7.4 प्रतिशत पहुंच जाता। हालांकि राजस्व में अगली बढ़ोतरी प्री-जीएसटी के 14.9 प्रतिशत (जैसा कि पंद्रहवें वित्त आयोग ने अपनी हालिया रिपोर्ट में सुझाया है) के स्तर के बजाय 11.8 प्रतिशत के वर्तमान स्तर के आधार पर ही आएगी। इसीलिए, इस पृष्ठभूमि में जीएसटी परिषद द्वारा गठित बोम्मई समिति की सिफारिशें महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं। यहां जीएसटी दरों को तार्किक बनाने की चुनौती सामने आती है। इस चुनौतीपूर्ण कवायद को इस रूप में अंजाम देना होगा कि मुद्रास्फीतिक दबाव को कम किया जाए, जिसके लिए मानक दर को 16 प्रतिशत पर लाना होगा। इससे होने वाले राजस्व की भरपाई के लिए रियायतों के दौर में चरणबद्ध तरीके से निकलने के साथ ही 5 प्रतिशत की दर में बढ़ोतरी करनी होगी और 12 प्रतिशत की दर को मानक दर के साथ जोड़ना होगा और उच्चतम दर में भी कुछ परिवर्तन की आवश्यकता होगी।
तेजी से बढ़ता जीएसटी राजस्व जीडीपी के अनुपात में करों की हिस्सेदारी के स्तर को 20 प्रतिशत तक ले जाने के मध्यम अवधि के लक्ष्य की पूर्ति में सहायक होगा, जो स्तर हमसे लंबे समय से छिटका हुआ है। इससे सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य पर भारी रकम खर्च करने की गुंजाइश मिलेगी, जो कारक उत्पादकता में वृद्धि करके इस दशक के शेष वर्षों के लिए सात प्रतिशत की सतत वृद्धि को बरकरार रखने में मददगार होगा।
राजस्व का पहलू जीएसटी सुधार का एक अहम पहलू है, लेकिन यह भी समझा जाना चाहिए कि जीएसटी महज एक कर सुधार से कहीं बढ़कर है। इसने अर्थव्यवस्था को तेजी के नए पंख लगाए हैं, जिन्हें उसके आर्थिक प्रभाव के अपर्याप्त विश्लेषण के चलते अपेक्षित सराहना नहीं मिल सकी है। इसमें एक बड़ी बाधा यही रही कि जीएसटीएन का डेटा अर्थशास्त्रियों और अहम थिंक टैंकों के साथ साझा नहीं किया गया। जीएसटीएन द्वारा सृजित व्यापक डेटाबेस सरकार को निश्चित ही सार्वजनिक दायरे में लाना चाहिए। ऐसी चर्चा थी कि नीति आयोग इस प्रकार के एक डेटा पोर्टल की योजना बना रहा है, जिससे निजी उपभोक्ताओं को भी डेटा मिल सकेगा। इस डेटा की पड़ताल से कई सवालों पर मंथन से ऐसा अमृत निकल सकता है, जो सार्वजनिक नीति विमर्श को समृद्ध ही करेगा।
जैसे कि क्या जीएसटी जैसे सुधार ने आंतरिक बाजार को विस्तार देने का काम किया है, क्योंकि इससे अनुमान लगाया गया था कि चुंगी और प्रवेश शुल्क जैसी आंतरिक बाधाओं के हटने से वस्तुओं की आवाजाही सुगम होगी? ऐसी स्थिति में क्या एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) संग्रह का व्यापक रूप से अध्ययन के लिए उपयोग किया जा सकता है? क्या सेवा कर कंपनियों को पूंजीगत वस्तुओं को लेकर करों के मोर्चे पर लाभ हुआ, जो क्रेडिट उनके लिए जीएसटी से पूर्व की व्यवस्था में उपलब्ध नहीं था? क्या हम सेवा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों द्वारा उपलब्ध इनकम टैक्स रिटर्न में जीएसटी टर्नओवर डेटा का उपयोग कर जीएसटी से पूर्व की स्थिति में इस पैमाने पर तुलना के लिए उपयोग कर सकते हैं कि इन कंपनियों ने शायद उनके लिए उपलब्ध टैक्स क्रेडिट को लेकर उनके टर्नओवर की कहीं ज्यादा सटीक तस्वीर दिखाई है? क्या जीएसटी सुधार ने व्यापक राजकोषीय इक्विटी सुनिश्चित की है? क्या उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे गरीब उपभोक्ता राज्यों को जीएसटी से पहले की स्थिति की तुलना में उनके जीएसडीपी के अनुपात में बेहतर राजस्व लाभ मिला है? अंतरराज्यीय ढुलाई में समय घटने से वस्तुओं की आवाजाही का खाका कैसे बदला है? क्या अब जीएसटी से पहले के दौर की तुलना में उन वस्तुओं की ज्यादा आवाजाही संभव हुई है, जो जल्दी खराब हो जाती हैं। जैसे कि फल-सब्जियां आदि। जीएसटी संग्रह में कैश-सेनवैट अपने पूर्व के 20:80 अनुपात की तुलना में कैसे सुधरा है, क्या यह बेहतर अनुपालन के कारण हुआ है? क्या बड़ी कंपनियों द्वारा छोटी कंपनियों से वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद की स्थिति में जीएसटी पूर्व काल की तुलना में कुछ बदलाव आया है?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो गहन पड़ताल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इससे जीएसटी के व्यापक आर्थिक प्रभाव की बड़ी तस्वीर सामने आएगी, जिसे अभी तक केवल राजस्व के एकांगी या कहें कि संकुचित नजरिये से ही देखा जाता है। इसके साथ ही हमें वृहद मैक्रो परिप्रेक्ष्य के लिहाज से कुछ और वस्तुओं को जीएसटी में शामिल करने की आवश्यकता है। इसमें भूमि और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों पर विचार किया जा सकता है। इसी प्रकार बिजली को शामिल करने से ऊर्जा सुधारों पर उसका खासा प्रभाव पड़ सकता है। इससे बिजली उत्पादन में काम आने वाले कोयला, गैस और अक्षय ऊर्जा को मिल रही सब्सिडी के अध्ययन में भी पारदर्शिता आएगी। स्वाभाविक है कि इसके निहितार्थ जलवायु नीति पहलुओं से भी जुड़े होंगे। हालांकि इससे राज्य के राजस्व पर कुछ कैंची चल सकती है।
(लेखक केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के सेवानिवृत्त सदस्य हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं।)

First Published : July 4, 2022 | 11:49 PM IST