facebookmetapixel
Advertisement
डिजिटल पेमेंट नियमों में बदलाव,UPI पर MDR से 10,000 करोड़ रुपये तक सरकार को मिल सकता है बड़ा राजस्वNDA सांसदों की बैठक में खेल और रोजगार पर फोकस, युवाओं के लिए बढ़ते अवसरों का दिया गया ब्यौरा1991 के आर्थिक सुधारों ने बदली भारत की दशा, उसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को मिली रफ्तार: जयराम रमेशखनिज ब्लॉकों की नीलामी के बाद भी धीमी रफ्तार, 720 में केवल 105 खदानें शुरूREIT और InvIT निवेशकों को बड़ी राहत, नई टैक्स व्यवस्था में भी डिविडेंड रहेगा पूरी तरह टैक्स फ्रीडिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, RBI को 4 हफ्ते में SOP बनाने का दिया निर्देशFuel Prices: पेट्रोल-डीजल कीमतों पर सरकार रखेगी नजर, जरूरत पड़ने पर उठाएगी कदमTax Amendment Bill 2026: विदेशी निवेशकों के लिए आसान होंगे टैक्स नियम, लोकसभा में विधेयक पेशNSE क्लोजिंग प्राइस विवाद से बदला म्युचुअल फंड NAV, निवेशकों पर दिखा अलग-अलग असरMeta के अधिकारियों से आज सरकार की बैठक, WhatsApp और कंटेंट मॉडरेशन पर होंगे सवाल

देश के श्रम कानूनों को मिले पुरातन समझौतों से मुक्ति

Advertisement

पुराने पड़ चुके आईएलओ समझौतों से बाहर निकलना भारत को श्रमिक विरोधी नहीं बनाता है। विस्तार से बता रहे हैं लवीश भंडारी और भुवना आनंद

Last Updated- May 14, 2026 | 9:54 AM IST
Labour Code
Representational Image

कर्नाटक ने वर्ष 2023 में जब अपने कारखाना अधिनियम में संशोधन कर स्वीकृत कारखाना श्रमिकों के लिए 12 घंटे की शिफ्ट की अनुमति दी तब ट्रेड यूनियनों ने जिनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में तर्क दिया गया कि यह बदलाव भारत की उस प्रतिबद्धता का उल्लंघन करता है जो उसने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ के काम के घंटे (उद्योग) समझौते 1919 (सी001) के तहत जताई थी। इसके तहत श्रमिकों को अधिकतम प्रतिदिन आठ घंटे और प्रति सप्ताह 48 घंटे काम करने का प्रावधान है। इस प्रकार जो बहस घरेलू स्तर पर उत्पादकता, वेतन और श्रमिकों की पसंद के बीच संतुलन पर होनी चाहिए थी वह एक अंतरराष्ट्रीय मामले में बदल गई।

यह अपनी तरह की कोई इकलौती घटना नहीं है। यह एक सदी पहले लिए गए निर्णय का स्वाभाविक परिणाम है। भारत ने काम के घंटों को लेकर खुद को आईएलओ के नियमों के सबसे हस्तक्षेपकारी हिस्से से आबद्ध कर लिया था।

पत्थर की लकीर

भारत आईएलओ का संस्थापक सदस्य है और वह 1922 से ही उसकी संचालन संस्था का स्थायी सदस्य रहा है। समय के साथ हमने आईएलओ के 47 समझौतों और एक प्रोटोकॉल को मंजूर किया। इनमें से 39 अभी तक जारी हैं। शुरुआती समझौतों में से पहला था काम के घंटे (उद्योग) जिसे भारत ने 1921 में अनुमोदित किया था। इसके परिणामस्वरूप जब भी भारत में कोई व्यक्ति काम के समय के अलग-अलग मॉडल आजमाना चाहता है तो उसे एक अंतरराष्ट्रीय संधि से निपटना पड़ता है।

यह समस्या उतनी गंभीर नहीं होती यदि यह समझौता सार्वभौमिक सहमति को दर्शाता। आईएलओ के 187 सदस्य देशों में से केवल 52 ने सी001 को अनुमोदित किया है और केवल 30 ने इसके साथ जुड़े काम के घंटे ( वाणिज्य एवं कार्यालय) समझौते, 1930 (सी030) को अनुमोदित किया है। प्रमुख विनिर्माण शक्तियों जैसे अमेरिका, जर्मनी, चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम ने सी001 को अनुमोदित नहीं किया है। न्यूजीलैंड ने विपरीत रास्ता अपनाया। कई दशकों तक इस संधि का पालन करने के बाद उसने इसे नामंजूर कर दिया और अब कार्य समय को राष्ट्रीय कानून और सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से नियंत्रित करता है।

इस प्रकार भारत एक अजीब श्रेणी में है। वह एक बड़ा, औद्योगीकरण की प्रक्रिया में शामिल श्रम-संपन्न अर्थतंत्र है जिसने स्वयं को 1919 के युग की कार्य समय संधि के अधीन कर लिया है, जिसे इसके अधिकांश निर्यात प्रतिस्पर्धियों ने टाल दिया है। केवल कार्य समय ही नहीं, बल्कि भारत ने अपनी 47 अनुमोदित संधियों के साथ अन्य बड़े विनिर्माण देशों की तुलना में कहीं अधिक सक्रियता दिखाई है। जैसे अमेरिका ने 14 और चीन ने 28 को ही किया है। भारत के संविधान में श्रम को समवर्ती सूची में रखा गया है। यानी श्रम का अधिकार संघ और राज्य सरकारों दोनों के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन संघीय कानून को प्राथमिकता प्राप्त है। इसलिए जब भी सरकार किसी आईएलओ संधि पर हस्ताक्षर करती है, तो वह स्वतः ही किसी भी राज्य पर प्रभावी हो जाता है। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। आईएलओ की संधियां केवल सिफारिशें नहीं हैं। आईएलओ का प्रत्यक्ष शिकायत तंत्र और त्रिपक्षीय स्वरूप उसको संयुक्त राष्ट्र की अन्य संस्थाओं से अलग बनाता है। किसी भी नियोक्ता या श्रमिक संगठन, किसी अन्य सदस्य राज्य, अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के किसी प्रतिनिधि, या आईएलओ की अपनी संचालन संस्था द्वारा शिकायत या प्रस्तुति दर्ज की जा सकती है। गंभीर और लगातार मामलों में यह एक आयोगीय जांच का रूप ले सकता है। यदि कोई सरकार आयोग की सिफारिशों को लागू करने से सहमत नहीं होती, तो आईएलओ की संचालन संस्था अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन को ‘ऐसी कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है जिसे वह उचित और आवश्यक समझे।’ इसके अलावा आईएलओ के निर्णय व्यापार और सहायता की शर्तों में भी शामिल होते हैं। विशेषकर यूरोपीय संघ के साथ और ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं।

भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि सुधारों से असंतुष्ट लोग केवल राजनीतिक प्रक्रिया और विधान मंडल के माध्यम से ही दखल देने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे जिनेवा अपील कर सकते हैं। सी001 और इसी तरह के अन्य साधनों का हवाला दे सकते हैं, और एक औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं जो सरकार के हाथ बांध देती है। 2020 से कई श्रमिक संघों ने कथित तौर पर नई श्रम संहिताओं के संबंध में आईएलओ से संपर्क किया है जिसकी वजह से भी संभवतः उनके कार्यान्वयन में देरी हुई है।

निर्णय कौन करे?

प्रश्न यह नहीं है कि कार्य समय की सीमा या अन्य संधियों को लेकर जताई गई प्रतिबद्धताएं अच्छी हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि भारत में कार्य समय, वेतन, उत्पादकता और रोजगार के बीच संतुलन का निर्णय कौन करता है? हमारी अपनी संसद और राज्य विधान सभाएं, जो भारतीय नागरिकों, श्रमिकों और कंपनियों के प्रति जवाबदेह हैं, या जिनेवा स्थित समितियों, विशेषज्ञों और निकायों का तंत्र जो हमारी संस्थाओं के प्रति जवाबदेह नहीं है? हमें वह करना होगा जो भारत और भारतीयों के लिए सही होगा। भारत अभी भी असंगठित क्षेत्र से बदलाव की प्रक्रिया में है। काम के घंटों पर संगठित क्षेत्र की कठोर सीमाएं सीमांत नियोक्ताओं और कर्मचारियों को असंगठित बने रहने पर विवश कर सकती हैं। भारत के बड़े श्रम संगठन जो वैश्विक संस्था की शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं वे स्वयं कई नियमों के दायरे में नहीं आते। आईएलओ त्रिपक्षीय सिद्धांतों पर आधारित है। श्रम संगठन भी पक्ष हैं जिनके अधिकारों की रक्षा कई संधियों के जरिये होती है। लेकिन यही संगठन जवाबदेह नहीं हैं और इसलिए आईएलओ उन्हें कुछ नहीं कह सकता। यानी यह एकतरफा मंच है जहां सरकारें स्वेच्छा से अपने ही कानूनों पर नियंत्रण सीमित करती हैं।

भारत वैश्विक बाजारों में उन देशों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है जिन्होंने आईएलओ संधि को मान्यता नहीं दी है। जैसे अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देश जिन्हें कार्य समय व्यवस्थाओं को समायोजित करने की कहीं अधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। वहां श्रमिक अधिक मेहनत वाले महीनों में चार-दिवसीय सप्ताह, संक्षिप्त शिफ्टें, और लचीले नियमित घंटे जैसे चयन कर सकते हैं। अगर हम आईएलओ की प्रतिबद्धताओं में बंधे रहते हैं तो भारत के लिए संभव नहीं है। यहां तक कि दीवाली जैसी बुनियादी मांग वृद्धि को भी औपचारिक विनिर्माण क्षेत्र कुशलतापूर्वक पूरा नहीं कर पाता, जिससे उपभोक्ता गुणवत्तापूर्ण उत्पादों से वंचित रह जाते हैं और श्रमिक अतिरिक्त आय के अवसर खो देते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम मूल श्रम अधिकारों से मुंह मोड़ लें। भारत के पास अपने स्वयं के कानून हैं जो श्रमिकों की रक्षा करते हैं। इसके अलावा, भारत पहले ही आईएलओ के 10 मौलिक समझौतों में से छह को अनुमोदित कर चुका है, जिनमें बंधुआ श्रम, समान पारिश्रमिक, भेदभाव-निषेध और बाल श्रम से संबंधित समझौते शामिल हैं। इनमें से कुछ, जैसे बाल श्रम संधि (सी182), अब आईएलओ के सभी 187 सदस्य देशों द्वारा अनुमोदित किए जा चुके हैं और वास्तव में एक वैश्विक न्यूनतम मानक को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, हमें घरेलू स्तर पर मजबूत सामाजिक संवाद करने से कोई नहीं रोकता। वास्तव में, यह अधिक स्वस्थ होगा यदि भारतीय श्रमिक, नियोक्ता और सरकारें इन प्रश्नों पर भारतीय मंचों में बहस करें और घरेलू सीमाओं को ध्यान में रखें।

(लेखक क्रमश: सीएसईपी के अध्यक्ष और प्रॉस्पैरिटी की सीईओ हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

Advertisement
First Published - May 14, 2026 | 9:54 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement