बाढ़ आपको एशिया में ही नहीं, अफ्रीका और यूरोप में भी मिल जाएंगी। लेकिन जब वो हिंदुस्तानी धरती पर कदम रखती है , वो भी हिंदुस्तानी रूप में ही ढल जाती है।
मुल्क की जमीन पर इनके कदम रखने के साथ ही क्षेत्रीय पार्टियों और गुस्सैल राजनेताओं, मिमियाने वाले नौकरशाहों, आलसी इंजीनियरों और स्वयंभू नागरिक अधिकार संस्थाओं के बीच आरोप प्रत्यारोप का काम शुरू हो जाता है। इसके बाद उफनती नदियों पर काबू पाने के लिए आस-पड़ोस के मुल्कों में ऊंचे-ऊंचे बांध बनाने की बातें होने लगती है।
फिर चाहें वे बातें पर्यावरण के नजरिये से कितनी बड़ी बकवास ही क्यों न हो, उनका दौर नहीं थमता। आखिर में मुल्क की सभी नदियों को जोड़ने की दशकों पुरानी योजना को उठाकर बेचारगी और नाउम्मीदी का चक्र पूरा किया जाता है।
भारत की बाढ़ से निपटने की योजना राजनीति, कारोबार और तकनीकी मुद्दों की नजरअंदाजगी के साथ-साथ बाढ़ पीड़ितों के दुखों से बेरुखी का एक मिला-जुला रूप होता है। बिहार और असम में इस साल पूरे 50 लाख लोगों को बाढ़ की वजह से अपना घर-बार छोड़ना पड़ा।
लेकिन जब भी उफनती नदियां तटबंधों को तोड़, इंसानों की बस्तियों में घुसकर तबाही का तांडव करती हैं, तो बहानों और आरोपों का वही दौर वापस लौटकर आ जाता है। हालांकि, आज जलवायु परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक आपदाएं हमारे मुल्क पर कुछ ज्यादा कहर ढाने लगी है, लेकिन अब भी उनसे निपटने के मामले में सरकारी बाबुओं की नीति बदली नहीं है।
जब कोई बाढ़ राजनीति के खतरे के निशान को पार कर जाती है, तभी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और पार्टियों के नेता हवाई जहाजों के पंखों पर सवार होकर उन इलाकों के दौरों पर निकलते हैं। नदियों के बारे में थोड़ी सी जानकारी रखने वाला इंसान भी आपको यह बता सकता है कि उस ऊंचाई से विपदा का एक चिह्न भी दिखाई नहीं देता।
साधारण वक्त में भी इतनी ऊंचाई से नदियां केवल एक पानी की धार के रूप में नजर आती हैं, जो उसके नीचे आने वाली हर चीज को निगल जाती है। बाढ़ नियंत्रण की राजनीति तो असल में दिल्ली में बैठी सरकार के हाथों की कठपुतली है। कितने राहत का ऐलान कब किया जाए, यह बात पूरी तरीके से केंद्र सरकार के राजनीतिक गणित पर निर्भर करता है।
बाढ़ की विभीषिका सबसे ज्यादा तो इंसान और मवेशी झेलते हैं, लेकिन उनकी असल तादाद कोई मायने नहीं रखती है। असल में, राहत पैकेज को केवल कोरे अनुमानों के हिसाब से बांटा जाता है। 2004 में केंद्रीय जल आयोग ने दावा किया था कि उत्तर बिहार के जिलों में पानी के कब्जे में आधी से भी ज्यादा जमीन है।
बिहार सरकार ने राहत पैकेज के लिए इसी आंकड़े का इस्तेमाल किया, लेकिन इससे पहले न तो जल संसाधन मंत्रालय और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस बात की सुध ली थी। इस बार तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिहार को एक हजार करोड़ रुपये का राहत पैकेज देने के मामले में कुछ ज्यादा ही जल्दी दिखाई।
हालांकि, इससे उनके अपने ‘गृहराज्य’ असम में लोगों के बीच खासा रोष है। आखिर डॉ. सिंह वहीं से राज्यसभा के सदस्य जो हैं। असम के लोगों का मानना है कि डॉ. सिंह ने उनकी परेशानियों को बिहार के आगे कमतर आंका। कोढ़ में खाज का काम लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी के उस प्रस्ताव ने किया, जिसमें उन्होंने बिहार के बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए सांसदों से अपने-अपने क्षेत्रीय विकास योजना कोष से कम से कम 10 लाख रुपये देने को कहा था। क्या इस राहत अभियान से असम को अलग रखना चाहिए था?
संकट के वक्त बाढ़ पीड़ितों को राहत पैकेज पहुंचाने को काफी अहमियत दी जाती है। लेकिन आम समय में नदियों के प्रबंधन जैसे काफी अहम मुद्दों के बारे में आप कोई चर्चा नहीं सुन पाएंगे। तब इसे कोई प्राथमिकता ही नहीं देता है। ज्यादा से ज्यादा होता यही है कि समस्या पर अध्ययन करने के लिए एक कमिटी या टास्क फोर्स बिठा दी जाती है।
हालांकि, इससे पहले भी कई सरकारी रिपोर्ट कोसी नदी पर एक बैराज को बनाने की खातिर काफी वकालत कर चुकी हैं। अब 2004 में मनमोहन सिंह की एक घोषणा को ही ले लीजिए। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने तब बार-बार लौटकर आती बाढ़ों के बारे में जांच करने के लिए एक टास्क फोर्स गठित करने की घोषणा की थी।
उन्होंने तब कहा था कि,’हमें इस बड़ी मुसीबत का एक स्थायी हल ढूंढ़ना ही पड़ेगा। हमें जल ग्रहण इलाकों और मैदानी इलाकों के लिए अलग-अलग योजनाओं की जरूरत पड़ेगी।’ पीएम का यह ऐलान ऐसे वक्त आया था, जब बिहार अपने इतिहास के एक और ‘सबसे भंयकर बाढ़’ की चपेट में था। उस टास्क फोर्स ने तो अपनी रिपोर्ट छह महीनों में दे दी थी, लेकिन उसकी सिफारिशों के बारे में अब तक जनता अनजान है।
बाढ़ का कोई स्थायी हल हमें अब तक नहीं मिल पाया है तो इसकी एक वजह यह भी है कि हमारी नदियां हमारे पड़ोसी मुल्कों से भी होकर गुजरती हैं। मिसाल के तौर पर ब्रह्मपुत्र को ही ले लीजिए। 2906 किलोमीटर लंबी यह नदी दुनिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है। यह नदी गंगा में मिलने से पहले चीन के तिब्बत, भारत और बांग्लादेश से होकर गुजरती है। हर साल यह नदी अनगिनत गांवों और खेतों को अपने साथ बहाकर ले जाती है, जिससे जानमाल का भारी नुकसान होता है।
इस नदी पर ‘काबू’ पाने के सारे पुराने तरीके नाकामयाब साबित हुए हैं और नीति निर्धारकों को कोई नया तरीका ढूंढ़ने से पहले अब जमीन हकीकतों से दो-चार होना पड़ेगा। या फिर दुनिया की सबसे ज्यादा उफान वाली नदियों में से एक, कोसी को ही ले लीजिए। जब तक तटबंध राजनीति और कमाई का हिस्सा नहीं बने थे, तब बिहार का केवल 25 लाख हेक्टेयर के इलाके पर बाढ़ का खतरा था।
1974 तक कोसी के आजू-बाजू 2,192 किलोमीटर पर तटबंध बना दिए गए थे, लेकिन बाढ़ के खतरे में रहने वाले इलाकों का क्षेत्रफल 43 लाख हेक्टेयर हो चुका था। आज तटबंधों की लंबाई बढ़कर 3430 किलोमीटर हो चुकी है, लेकिन बाढ़ के खतरे वाले इलाकों का क्षेत्रफल भी 68.8 लाख हेक्टेयर हो चुका है।
चूंकि, तटबंधों ने बिहार के घावों को भरने के बजाए उन्हें कुरेद-कुरेद कर और गहरा कर दिया, इसलिए इस संकट से निपटने के लिए एक और टास्क फोर्स का गठन किया गया। हालांकि, इससे तटबंधों पर खर्च होने वाले पैसों में कोई कमी नहीं आई क्योंकि समय-समय पर उनकी मरम्मत जो की जाती है। हालांकि, इस सबके बावजूद बाढ़ के पानी से घिरे लाखों लोगों के लिए राहत की कोई किरण नजर नहीं आती है।