यह बात सभी जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय से ही हमने देखा है कि कई देशों ने बढ़ते निवेश और निर्यात के दम पर खूब प्रगति की। जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और कुछ हद तक थाईलैंड और मलेशिया इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे निर्यात आर्थिक बदलाव का वाहक बनता है। यह बात एकदम स्पष्ट है कि मजबूत निर्यात विकास के लिए जरूरी है। इन देशों ने बहुत जल्दी यह समझ लिया था कि जरूरी नहीं कि उत्पादन के लिए आवश्यक सभी वस्तुएं घरेलू बाजार में सस्ती मिलें। इसलिए उन्होंने कच्चा माल आयात करने के लिए उदार कारोबारी व्यवस्था कायम की। हमारे आयात का बड़ा हिस्सा यानी करीब 32 फीसदी भाग कच्चा माल होता है। ऐंटी डंपिंग शुल्क में से 70 फीसदी ऐसी ही वस्तुओं पर लगता है। इसका डाउनस्ट्रीम उद्योगों (तेल परिशोधन, विपणन आदि कारोबार) कीमत पर काफी असर पड़ता है। भारत को शुल्क नहीं बढ़ाना चाहिए या ऐसे कच्चे माल पर गैर शुल्क गतिरोध नहीं खड़े करने चाहिए। इसलिए कि भारत आने वाली वस्तुएं निर्यात के लिए तैयार होने वाले सामान में इस्तेमाल होती हैं। यदि ऐसी वस्तुओं की लागत में जरा भी इजाफा हुआ तो उत्पादन लागत बढ़ेगी और निर्यात प्रभावित होगा। इन अहम कच्चे माल की कीमत बढ़ाने से हमारी प्रतिस्पर्धी क्षमता और कमजोर होगी जबकि वह पहले ही लॉजिस्टिक्स, ऋण और बिजली की उच्च लागत से दो-चार है। इन एशियाई देशों का अनुभव बताता है कि आयात और निर्यात साथ-साथ बढ़ते हैं। वाहन उद्योग का उदाहरण लेते हैं। हमने 6.1 अरब डॉलर मूल्य के वाहन कलपुर्जे आयात किए लेकिन इनका उपयोग करके वाहन उद्योग ने 18 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात किए। यह बात व्यापक स्तर पर भी सही है। उदाहरण के लिए 2001 और 2010 के बीच हमारा व्यापार जीडीपी अनुपात करीब दोगुना होकर 26 फीसदी से 49 फीसदी पहुंच गया। इस अवधि में आयात और निर्यात दोनों बढ़े। सांकेतिक अर्थों में इस दशक में आयात और निर्यात दोनों करीब 20 फीसदी की दर से बढ़े। चीन के अनुभव का विश्लेषण भी दर्शाता है कि आयात और निर्यात समान गति से बढ़े। ज्यादा गहराई से विश्लेषण करने पर पता चला कि चीन के आयात का करीब आधा हिस्सा ऐसी ही मध्यवर्ती वस्तुओं का था जो निर्यात बढ़ाने के लिए जरूरी थीं।
एशियाई देशों का एक अहम सबक यह भी है कि निर्यात से अपेक्षाकृत उच्च मुनाफा कमाने के लिए प्रोत्साहन वाला ढांचा तैयार किया गया। इसमें बैंकों से रियायती ऋण, निर्यात लक्ष्य से संबद्ध दीर्घावधि का ऋण, निर्यात सब्सिडी और शोध एवं विकास के लिए प्रोत्साहन शामिल था। एक अहम सबक यह है कि आयात प्रतिस्थापन को धीरे-धीरे समाप्त किया गया। दूसरा अहम सबक यह था कि इन देशों ने श्रम आधारित उद्योगों में अपनी क्षमता विकसित की और विनिर्माण मूल्य शृंखला में आगे बढ़े। बुनियादी क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश के जरिये लॉजिस्टिक्स की लागत कम करना एक और अहम नीतिगत हस्तक्षेप है। चूंकि निर्यात प्रोत्साहन व्यापक और प्रयोजनमूलक थे, यह बात ध्यान देने लायक है कि कई नीतिगत क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए चिह्नित किया गया। एशिया के अनुभव से मिला सबक बताता है कि आयात प्रतिस्थापन नहीं बल्कि निर्यात को बढ़ावा देना विकास के लिए अहम है।
फिर भी भारत निर्यात और निवेश आधारित वृद्धि के इस मॉडल का अनुकरण करने में नाकाम रहा। विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक वैश्विक कारोबार में भारत की हिस्सेदारी दो फीसदी रही जबकि उसके पास ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता है। हमने सेवा क्षेत्र में बढिय़ा प्रदर्शन किया लेकिन अन्य एशियाई देशों की तरह विनिर्माण और निर्यात वृद्धि व्यापक नहीं रही है। नतीजा एकदम स्पष्ट है। सन 1990 से 2020 के बीच जीडीपी और रोजगार में विनिर्माण की हिस्सेदारी स्थिर रही। निर्यात में इजाफा हुआ है लेकिन आकार में हम चीन से काफी कमतर हैं। खाद्य प्रसंस्करण जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में जहां हमारा कच्चा माल बहुत अधिक है वहां भी वैश्विक निर्यात में हमारी हिस्सेदारी केवल दो फीसदी है। इसे कई कारकों से समझ सकते हैं। हम निजी क्षेत्र को ऋण उपलब्धता के मामले में पीछे हैं। निजी क्षेत्र के लिए घरेलू ऋण जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 50 फीसदी है जबकि चीन में यह 165 फीसदी और अन्य उच्च तथा मध्य आय वाले देशों में 123 प्रतिशत। हमारा निजी ऋण जीडीपी अनुपात भी काफी कम है और विनिर्माण और निर्यात के लिए इसे बढ़ाने की काफी संभावना है। बिजली की क्रॉस सब्सिडी, लॉजिस्टिक्स की उच्च लागत और श्रम कानून अन्य बाधाएं हैं। इसी प्रकार देश के निर्यात घटकों में अहम बदलाव की जरूरत है। हमारे निर्यात में आधुनिक उत्पाद नहीं हैं।
जरूरत इस बात की है कि हमारे घरेलू विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा दिया जाए ताकि निर्यात मजबूत हो और वृद्धि को बल मिले। बीते कुछ वर्षों में इस दिशा में कई अहम नीतिगत कदम लिए गए हैं। सबसे पहले, सभी फर्म के लिए कॉर्पोरेट कर दर को घटाकर 22 फीसदी करना और नई विनिर्माण इकाइयों के लिए 15 फीसदी करना। इससे घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा। कई अहम क्षेत्रों में उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने पहली बार कच्चे माल के बजाय उत्पादन को बढ़ावा दिया है। करीब 29 श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेटा गया है। एमएसएमई की परिभाषा को भी सुधारा गया है ताकि उनका आकार बढ़ सके और इस बीच उन्हें एमएसएमई का लाभ मिलता रहे। इन कदमों से घरेलू उद्योग का आकार बढ़ाने में मदद मिलनी चाहिए।
दुनिया भर में मांग बढ़ रही है क्योंकि नकदी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अमेरिका में विभिन्न प्रोत्साहन पैकेज उसके जीडीपी के 27 फीसदी के बराबर हो चुके हैं। ताजातरीन पैकेज 1.9 लाख करोड़ डॉलर का है। विश्व बैंक का अनुमान है कि इस वर्ष विश्व अर्थव्यवस्था 5.6 फीसदी की दर से बढ़ेगी। यह 80 वर्ष में मंदी के बाद सबसे तेज सुधार होगा। मॉर्गन स्टैनली ने 2021 के वैश्विक पूर्वानुमान में कहा है कि विश्व अर्थव्यवस्था 6.4 फीसदी की दर से बढ़ सकती है जबकि अमेरिका 5.9 फीसदी की दर से बढ़ेगा। यूरो क्षेत्र 5 फीसदी और यूके 5.3 फीसदी की दर से विकसित होगा। 2022 में भी यही सिलसिला होगा। इन प्रोत्साहन पैकेज के चलते ही भारत का निर्यात बढ़ रहा है। जनवरी से मई 2021 के बीच मासिक निर्यात 152 अरब डॉलर रहा। यह अब तक का उच्चतम है। इसे और गति देने का वक्त आ गया है।
अर्थव्यवस्था में तेज सुधार की संभावना तभी हकीकत में बदलेगी जब निर्यात पर ध्यान दिया जाए। भारत वैश्विक मूल्य शृंखला से एकाकार होने का अवसर गंवा नहीं सकता। सरकार के हर स्तर से मजबूत और समन्वित नीतिगत कदमों की आवश्यकता है ताकि इस अवसर का लाभ लिया जा सके। राजकोषीय गुंजाइश सीमित है। निजी निवेश और खपत का भी यही हाल है। निकट भविष्य में वृद्धि निर्यात के बल पर ही संभव है।
(लेखक नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)