महाराष्ट्र सरकार ने पिछले सप्ताह, राज्य विधान सभा में बजट पेश करते समय अपने एक चुनावी वादे को पूरा किया। सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में सरकार की सराहना की जाती है लेकिन इस बार मामला थोड़ा जटिल है। यह वादा किसानों के कृषि ऋण माफी से जुड़ा है। पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर किसान ऋण माफी योजना के नाम से शुरू की जा रही योजना राज्य के इतिहास में कोई नई बात नहीं है। दरअसल पिछले दस वर्षों में महाराष्ट्र की सरकारें, किसानों के लिए यह तीसरी ऋण माफी योजना ला रही हैं।
इस योजना के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक जिन किसानों के फसल ऋण बकाया हैं, उनके अधिकतम 2 लाख रुपये तक के ऋण माफ किए जाएंगे। इसके अलावा जो किसान नियमित रूप से अपने ऋण की किस्तें चुकाते रहे हैं, उन्हें भी अधिकतम 50 हजार रुपये तक की सहायता दी जाएगी। हालांकि महाराष्ट्र का ऋण, उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का लगभग 19 फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत से कम है ऐसे में राज्य को इस तरह के लोकलुभावन कदमों से बचना चाहिए। राज्य में महिलाओं के लिए नकद राशि का वितरण करने की एक लोकप्रिय योजना भी पहले से चल रही है।
भारत में कृषि ऋण माफी का लंबा इतिहास रहा है। ऐसी योजनाएं सरकार के राजकोषीय संतुलन को काफी हद तक बिगाड़ देती हैं लेकिन लंबे समय में कृषि क्षेत्र की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं कर पातीं। इसके अलावा इसके कारण नैतिक जोखिम वाली समस्या भी होती है।
जब किसानों या किसी अन्य समूह को यह उम्मीद होने लगे कि वे सरकार पर दबाव बनाकर ऋण माफी हासिल कर सकते हैं तो उनमें समय पर ऋण चुकाने को लेकर दबाव कम हो जाता है। इस बार राज्य सरकार ने इस समस्या को कम करने के लिए उन किसानों को भी भुगतान देने की बात कही है जिन्होंने नियमित रूप से अपने ऋण चुकाए हैं। लेकिन जब तक ऐसे किसानों को उनकी चुकाई गई पूरी राशि वापस नहीं मिलती तब तक यह समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।
इसके अलावा इससे ऋण माफी की दूसरी बड़ी समस्या और बढ़ जाती है, यानी सरकारी खजाने पर पड़ने वाला भारी बोझ। महाराष्ट्र के अपने इतिहास से भी अंदाजा मिलता है कि सवाल सिर्फ व्यक्तिगत स्तर के नैतिक जोखिम का नहीं है बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र में ऐसा माहौल बन जाता है जिसमें कर्ज लेकर विस्तार करने की प्रवृत्ति बढ़ती है क्योंकि यह मान लिया जाता है कि भविष्य में सरकार किसी न किसी रूप में सहायता देकर जोखिम अपने ऊपर ले लेगी। भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को देखते हुए यह भी संभव है कि ऐसी मांगें अन्य राज्यों में भी उठने लगें।
देश के बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस समस्या को लेकर पहले ही चेतावनी दी है। उसका कहना है कि राजनीतिक चक्र में बार-बार की जाने वाली कृषि ऋण माफी योजनाओं ने कृषि क्षेत्र में ऋण की संस्कृति को कमजोर कर दिया है। दरअसल, इसका असर उसी वर्ग पर पड़ता है जिसकी मदद करने का दावा सरकार करती है। बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान किसानों को कर्ज देने में हिचकिचाने लगते हैं क्योंकि उन्हें यह आशंका रहती है कि किसान ऋण चुकाने के बजाय कर्ज में चूक कर सकते हैं। इस तरह आखिरकार किसानों तक ऋण के प्रवाह पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आरबीआई ने इन ऋण माफी योजनाओं के राजनीतिक संबंध को भी स्पष्ट किया था। आरबीआई ने 2019 में बताया कि पिछले पांच वर्षों में घोषित 10 कृषि ऋण माफी योजनाओं में से आठ योजनाएं, चुनाव से 90 दिनों के भीतर घोषित की गई थीं। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी योजनाओं का लाभ आखिरकार सबसे कमजोर किसानों को नहीं मिल पाता है।
अधिक से अधिक ये योजनाएं, पात्र लाभार्थियों के लगभग आधे हिस्से तक ही पहुंचती हैं और अक्सर इससे भी कम लोगों को लाभ मिलता है। इनमें भी आमतौर पर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले किसान ही लाभान्वित होते हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि ऐसी कृषि सुधार नीतियां, जिनसे किसानों को सीधे आमदनी से जुड़ी सहायता मिल सके, उन्हें अभी तक गंभीरता से क्यों नहीं लागू किया गया।
जब तक केंद्र सरकार के स्तर पर कृषि सब्सिडी की व्यवस्था में विकृतियां बनी रहेंगी तब तक राज्यों की राजनीति ऐसे ही वित्तीय रूप से गैर-जिम्मेदार कदमों के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी। इसके अलावा यह सवाल पूछना लाजिमी है कि यदि पिछली ऋण माफी योजनाएं, कृषि क्षेत्र की मूल संरचनात्मक समस्याओं का हल नहीं निकाल सकीं तब नई योजना इन समस्याओं को किस हद तक सुलझा पाएगी।