एचडीएफसी बैंक कोई साधारण सूचीबद्ध कंपनी नहीं है। वह देश का सबसे बड़ा निजी बैंक और व्यवस्थागत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण संस्थान है। भले ही पिछले कुछ दिनों में इसके शेयरों के दाम गिरे हों लेकिन यह देश की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी भी है। इसमें विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 48 फीसदी है जबकि भारतीय संस्थागत निवेशक इसमें 37 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में इसके चेयरमैन के अचानक इस्तीफे को किसी अन्य साधारण घटना की तरह नहीं देखा जा सकता है। गत सप्ताह पूर्व अफसरशाह अतनु चक्रवर्ती ने अंशकालिक चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशक के पद से त्यागपत्र दे दिया।
उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफा दिया था कि बैंक के कुछ खास दस्तूर उनके निजी मूल्यों और नैतिकताओं के अनुरूप नहीं हैं। जो कुछ दांव पर लगा है उसे देखते हुए यह व्याख्या अस्पष्ट है और बैंक के संचालन को लेकर चिंता पैदा करती है। इससे जुड़े कई सवाल उठते हैं जिन्हें चक्रवर्ती, बैंक और नियामक को तत्काल हल करना होगा।
बैंकिंग स्वभाव से ही अस्थिर व्यवसाय है, जिसमें अल्पकालिक देनदारियां और दीर्घकालिक परिसंपत्तियां होती हैं। यदि बड़ी संख्या में जमाकर्ता अपनी जमा राशि निकालना शुरू कर दें, तो कोई भी बैंक अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं कर पाएगा। आज की आपस में जुड़ी हुई दुनिया में यह बैंकिंग के तय समय के बाहर भी हो सकता है। इसलिए किसी बैंकिंग संस्था में जनता का विश्वास हर समय सक्रिय रूप से बनाए रखना आवश्यक है। शीर्ष स्तर पर अचानक निष्कासन, साथ ही संभावित संचालन संबंधी चिंताएं, अफवाहों को हवा दे सकती हैं जिनके प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं।
चूंकि लाखों जमाकर्ताओं और निवेशकों के हित जुड़े हुए हैं, इसलिए यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि बैंक की कौन-सी प्रथाएं अध्यक्ष के नैतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं थीं। आगे यह भी जानना जरूरी होगा कि क्या उन्होंने उन मुद्दों को बैंक बोर्ड के भीतर उठाया था? यदि हां, तो कैसे, और बोर्ड की प्रतिक्रिया क्या थी? यह भी जानना आवश्यक होगा कि क्या उन्होंने कभी भी भारतीय रिजर्व बैंक से संपर्क किया था।
इसके अतिरिक्त अगर दो साल से हालात उनके मनोनुकूल नहीं थे तो इस समय इस्तीफा देने की क्या वजह हो सकती है जबकि न केवल देश बल्कि वित्तीय बाजार भी एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं? शेयर बाजार ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न अनिश्चितताओं के चलते दबाव में हैं। उदाहरण के लिए मार्च में अब तक बेंचमार्क बीएसई सेंसेक्स में 8 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। बाजार के लिहाज से देखें तो यह समय देश की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में से एक में संचालन संबंधी समस्याएं सामने आने का बिल्कुल नहीं है।
इसके अलावा चूंकि निजी क्षेत्र के बैंकों की प्रमुख नियुक्तियों में रिजर्व बैंक की भूमिका होती है तो अचानक होने वाले इस्तीफे रोकने में भी उसकी भूमिका होनी ही चाहिए। क्या नियामक को बैंक में हो रही घटनाओं की जानकारी थी? बैंक ने अपनी ओर से अच्छा किया कि उसने तुरंत केकी मिस्त्री को अंतरिम अंशकालिक अध्यक्ष नियुक्त किया और नियामक तथा निवेशकों को जानकारी दी। मिस्त्री ने कहा कि यदि यह जिम्मेदारी उनके सिद्धांतों और बैंक से अपेक्षित ईमानदारी के स्तर के अनुरूप नहीं होती, तो वे इसे स्वीकार नहीं करते।
फिर भी, सवाल उठाए गए हैं और बैंक को आगे की जांच के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना होगा। उसे हितधारकों को यह बताना चाहिए कि किस प्रकार की चिंताएं उठाई गई थीं और प्रबंधन तथा बोर्ड ने उनके बारे में क्या किया। पिछले सप्ताह के अंत में, बैंक ने तीन वरिष्ठ अधिकारियों से पद छोड़ने को कहा, हालांकि यह स्पष्ट नहीं था कि यह चक्रवर्ती के इस्तीफे का परिणाम था या नहीं।
वर्तमान स्थिति में, अगर नियामक पहले से नहीं कर रहा है तो उसे इस मामले की तत्काल जांच करनी चाहिए। साथ ही उसे अपनी जांच के निष्कर्षों को जल्द से जल्द सार्वजनिक करना चाहिए, साथ ही यदि कोई कमी थी तो नियामक और बैंक द्वारा उठाए गए कदमों को भी साझा करना चाहिए। रिजर्व बैंक को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में इस तरह का अचानक इस्तीफा फिर न हो।