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ईरान युद्ध और ऊंची तेल कीमतों के बीच स्थिरता जरूरी

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वित्त मंत्री ने भारत को पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक स्थिरीकरण कोष बनाने की घोषणा की थी

Last Updated- March 16, 2026 | 10:08 PM IST
iran israel war
प्रतीकात्मक तस्वीर

अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान युद्ध कब समाप्त होगा। अनिश्चितता की सबसे बड़ी वजह है युद्ध के लक्ष्यों को लेकर अस्पष्टता। ईरान इस युद्ध की लागत बढ़ा रहा है। न केवल अमेरिका बल्कि इस क्षेत्र में अमेरिका के साझेदारों सहित पूरे विश्व को यह युद्ध भारी पड़ रहा है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल एवं गैस की कमी हो गई है और कीमतों में इजाफा हो रहा है। ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें गत सप्ताह 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचने के बाद अब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है इसलिए भारत के लिए हालात विकट हैं। निरंतर ऊंची तेल कीमतें वैश्विक वित्तीय तंत्र में जोखिम से परहेज को जन्म देती हैं और वे अन्य कमजोरियों को भी सामने ला सकती हैं।

गत सप्ताह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत को पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक स्थिरीकरण कोष बनाने की घोषणा की थी। इसके लिए आवश्यक धन मौजूदा विनियोग और अतिरिक्त आवंटन से आएगा। हालांकि सरकार से उम्मीद है कि वह चालू वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.4 फीसदी के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा करेगी, किंतु संकट में संसाधनों का नए सिरे से नियोजन एक समझदारी भरा नीतिगत विकल्प है। हालांकि इस संदर्भ में कुछ बिंदु उल्लेखनीय हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि के बावजूद, सरकार पंप कीमतों को समायोजित करने में अनिच्छुक हो सकती है, जिससे राजकोषीय दबाव उत्पन्न होगा। इसका कारण यह है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें भले ही विनियमित न हों, लेकिन उन्हें नियमित रूप से बाजार की वास्तविकताओं के अनुरूप समायोजित नहीं किया जाता। अधिक उर्वरक सब्सिडी व्यय भी अतिरिक्त खर्च का कारण बनेगा।

सरकार उन निर्यातकों का भी सहयोग करना चाह सकती है जो चल रहे युद्ध से प्रभावित हुए हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि स्थिरीकरण कोष कैसे काम करेगा। यह भी अस्पष्ट है कि क्या यह एक स्थायी तंत्र होगा जिसमें हर वर्ष धन आवंटित किया जाएगा। यदि हां, तो सामान्य वर्ष में इस कोष का क्या होगा? इसलिए, अधिक परिचालन स्पष्टता की आवश्यकता है।

भारत के नीति प्रबंधन की एक बुनियादी समस्या यह है कि उच्च राजकोषीय घाटे के कारण अनिश्चितता से निपटने के लिए नीतिगत गुंजाइश का अभाव रहता है। सरकार ने कोविड महामारी वर्ष में तेज वृद्धि के बाद राजकोषीय घाटे को काफी कम किया है, लेकिन यह अभी भी ऊंचा है। खासतौर पर तब जब इसे अर्थव्यवस्था की वित्तीय क्षमता के संदर्भ में देखा जाए। राजकोषीय प्रबंधन में कठिनाई के अलावा युद्ध बाहरी खाते पर भी असर डालेगा। रुपया दबाव में है। तेल और गैस की ऊंची कीमतें आयात बिल बढ़ाएंगी और चालू खाते का घाटा यानी सीएडी बढ़ेगा।

अर्थशास्त्री अनुमान लगा रहे हैं कि चालू खाता घाटा जीडीपी का करीब 1.5 फीसदी होगा, जबकि वर्तमान वर्ष में यह लगभग 1 फीसदी है। यद्यपि यह काफी हद तक इस पर निर्भर करेगा कि युद्ध कब समाप्त होता है और आने वाले महीनों में तेल की कीमतें किस दिशा में जाती हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता इस घाटे की भरपाई को कठिन बना सकती है। भारत पूंजी बहिर्गमन का सामना कर रहा है। संकट लंबा खिंचने पर ये हालात जल्दी उलट नहीं सकते।

उदाहरण के लिए, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने जनवरी 2025 से अब तक भारत के शेयरों में 25 अरब डॉलर से अधिक की बिक्री की है। अनिवासी भारतीयों से जमा राशि को प्रोत्साहित करने के सुझाव भी दिए जा रहे हैं। बाहरी मोर्चे पर दबाव होने के बावजूद, भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार का स्वस्थ स्तर है, जिसका उपयोग विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को कुछ हद तक कम करने के लिए किया जा सकता है।

हालांकि इसका उपयोग मुद्रा की रक्षा करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में, रुपये के अवमूल्यन की उम्मीद की जाएगी और इसे व्यवस्थित तरीके से अवमूल्यित होने दिया जाना चाहिए।

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First Published - March 16, 2026 | 10:02 PM IST

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