वैश्विक व्यापार में आ रहे बदलावों को समझने का एक तरीका है गुरुत्व मॉडल जो कहता है कि दो देशों के बीच होने वाला द्विपक्षीय व्यापार उनके आर्थिक आकार के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य में प्रकाशित एक अध्ययन दिखाता है कि सेवाओं के मामले में यह तर्क कमजोर हो रहा है, और हाल के दशकों में सेवाओं का निर्यात वस्तुओं की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है।
2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में, दूरी में 1 फीसदी की वृद्धि से सेवाओं के व्यापार में 0.63 फीसदी की कमी आती थी, ठीक वैसे ही जैसे वस्तुओं के व्यापार में। लेकिन 2022–23 तक यह प्रभाव घटकर 0.52 फीसदी रह गया। सरल शब्दों में कहें तो सेवाओं के लिए भौगोलिक दूरी का महत्त्व कम हो गया है। वर्ष2008 के वित्तीय संकट और ‘स्लोबलाइजेशन’ (वैश्वीकरण की धीमी होती प्रक्रिया) के बाद भी, सेवाओं का व्यापार वैश्विक वृद्धि का एक मजबूत वाहक बनता जा रहा है।
इस बदलाव को दो शक्तियां आगे बढ़ा रही हैं। पहली, सेवाओं की प्रकृति खुद बदल गई है। पहले सेवाओं के व्यापार में परिवहन और यात्रा का वर्चस्व था, जो लोगों और वस्तुओं की आवाजाही पर निर्भर करते थे और 2000 में सेवाओं के व्यापार का लगभग 70 फीसदी हिस्सा थे। लेकिन 2023 तक ऐसी सेवाओं का हिस्सा घटकर 40 फीसदी से भी कम हो गया। उनकी जगह आधुनिक सेवाएं मसलन सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और व्यापार सेवाएं आदि आ गई हैं, जिन्हें बिना भौतिक निकटता के सीमाओं के पार पहुंचाना आसान है।
दूसरा, तकनीक ने व्यापार के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क ने कई सेवाओं को व्यापार योग्य बना दिया है। फिर भी, अनेक अवसर अब भी दोहन करने के लिए हैं। वैश्विक स्तर पर सेवाओं का व्यापार मुख्य रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित है। साथ ही, बाधाओं की प्रकृति भी बदल रही है। वस्तुओं के व्यापार में जहां शुल्क प्रमुख हैं, वहीं सेवाओं को नियामक और संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे डेटा स्थानीयकरण नियम, लाइसेंसिंग आवश्यकताएं, विदेशी स्वामित्व पर प्रतिबंध और अनुपालन मानक।
बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव इन बाधाओं को और मजबूत कर रहे हैं, जिससे बाजार तक पहुंच अधिक जटिल हो रही है। भारत का सेवाओं का निर्यात कुछ ही बाजारों, विशेषकर अमेरिका और यूरोप पर निर्भर है, जिससे यह नियामक जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत का सेवाओं का व्यापार समग्र व्यापार प्रदर्शन का केंद्र बन गया है। वैश्विक सेवाओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2005 में 1.9 फीसदी से बढ़कर 2023 में 4.3 फीसदी हो गई। वित्त वर्ष 25 में सेवाओं का निर्यात रिकॉर्ड 387.5 अरब डॉलर तक जा पहुंचा जो 13.6 फीसदी की वृद्धि है, जबकि सेवाओं का व्यापार अधिशेष 188.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह भी रिकॉर्ड है और वस्तु व्यापार घाटे के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करता है।
स्टैनफर्ड आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) इंडेक्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, एआई कौशल की पहुंच में भारत, अमेरिका के ठीक पीछे दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इसका एक प्रमुख कारण वैश्विक क्षमता केंद्रों का उदय रहा है, जो वित्त वर्ष 20 से वित्त वर्ष 25 के बीच लगभग 7 फीसदी वार्षिक दर से बढ़े, और जिन्हें प्रतिभा उपलब्धता तथा लागत लाभ ने सहारा दिया।
जैसे-जैसे दूरी का महत्त्व कम होता जा रहा है और डिजिटल व्यापार बढ़ रहा है, भारत के पास एक स्पष्ट अवसर दिख रहा है। ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों या गहरे द्विपक्षीय और क्षेत्रीय एकीकरण ढांचों के माध्यम से आसान बनाना होगा जो सीमाओं के पार प्रवाह को सक्षम करें।
सेवाओं का निर्माण क्षेत्र के साथ गहरा एकीकरण भी महत्त्वपूर्ण होगा ताकि विकसित हो रही वैश्विक सेवाओं की अर्थव्यवस्था से पूर्ण लाभ उठाया जा सके। हालांकि भारत के पास सेवाओं के निर्यात को बढ़ाने की क्षमता है और उसे नए बाजारों और क्षेत्रों की तलाश करनी चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सेवाओं में अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन के बावजूद नीतिगत ध्यान माल व्यापार से नहीं हटाना चाहिए। अधिक वस्तु निर्यात बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में मदद करेगा।