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Editorial: अनिश्चित माहौल में मौद्रिक नीति समिति के सामने महंगाई व विकास दर को संभालने की बड़ी चुनौती

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कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अल नीनो के कारण मॉनसून में अनिश्चितता के बीच, आरबीआई मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रख सकता है

Last Updated- June 02, 2026 | 9:31 PM IST
Reserve Bank of India (RBI)
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी)  बेहद अनिश्चित माहौल के बीच अपनी तीन दिवसीय बैठक आज से शुरू करेगी। लगातार बदलती स्थितियों और परस्पर विरोधी उद्देश्यों के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि पश्चिम एशिया में तनाव कितने समय तक बना रहेगा। ऐसे में यह कहना कठिन है कि होर्मुज स्ट्रेट कब खुलेगा।

ध्यान रहे कि यहां से वैश्विक कच्चे तेल के 20 फीसदी की आवाजाही होती है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें अब भी संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग 40 फीसदी अधिक हैं। आर्थिक दृष्टि से तेल मूल्य का झटका मुद्रास्फीतिजनित मंदी की ओर ले जाता है जिसे संभालना कठिन होता है। चूंकि वैश्विक कीमतों का असर सीमित और विलंबित रहा है इसलिए यह अभी तक खुदरा मुद्रास्फीति दर में परिलक्षित नहीं हुआ है। अप्रैल में यह 3.5 फीसदी थी।

हालांकि, ऊंची तेल कीमतों ने थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर में तेज वृद्धि की और अप्रैल में यह 8.3 फीसदी तक पहुंच गई। हाल ही में ईंधन की पंप कीमतों में वृद्धि संभवतः थोक मूल्य सूचकांक और खुदरा मुद्रास्फीति दर दोनों को और ऊपर धकेलेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही अमेरिका और ईरान जल्द ही किसी समझौते पर पहुंच जाएं और होर्मुज स्ट्रेट खुल जाए लेकिन आपूर्ति को सामान्य स्तर पर लौटने में महीनों का वक्त लगेगा। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौता निश्चित रूप से तेल की कीमतों को कम करने में मदद करेगा। यद्यपि वे कुछ समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। लेकिन यदि युद्ध फिर से शुरू होता है तो स्थिति नाटकीय रूप से बदल सकती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। ऐसी तमाम आशंकाएं मौजूद हैं।

हालांकि तेल की कीमतें ही एकमात्र अनिश्चितता नहीं हैं जिनसे एमपीसी को निपटना है। इस वर्ष माॅनसून सामान्य से कम रहने की उम्मीद है क्योंकि अल नीनो प्रभाव के हावी रहने की स्थिति बन रही है और इसका प्रभाव तेल झटके जैसा हो सकता है। यानी ऊंची मुद्रास्फीति और कम वृद्धि। केंद्रीय बैंक आमतौर पर आपूर्ति झटकों को नजरअंदाज करते हैं लेकिन ऊंची दरें हमेशा अपेक्षाओं को प्रभावित करने का जोखिम रखती हैं जिससे द्वितीयक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। भारतीय नीति निर्माताओं के लिए जटिलता यह है कि उन्हें दो समानांतर झटकों से निपटना पड़ सकता है।

मौजूदा अनिश्चितता और कई बदलते कारकों को देखते हुए एमपीसी के लिए नीतिगत दर को अपरिवर्तित रखना और अधिक स्पष्टता का इंतजार करना समझदारी होगी, साथ ही आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई का विकल्प खुला रखना होगा। नीतिगत निर्णय के अलावा वित्तीय बाजार संशोधित मुद्रास्फीति और वृद्धि पूर्वानुमानों पर भी बारीकी से नजर रखेंगे।

इस संदर्भ में यह ध्यान देने योग्य है कि शुक्रवार को मौद्रिक नीति निर्णय की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय 2025-26 के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े और चौथी तिमाही के आंकड़े प्रकाशित करेगा। सूचना के अंतर को कम करने के लिए दोनों घोषणाओं में से किसी एक को समायोजित किया जा सकता था।

जो भी हो रिजर्व बैंक संभवतः 2026-27 के लिए अपने वृद्धि अनुमान को 6.9  फीसदी से कम रखेगा। नवीनतम माल एवं सेवा कर और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े गतिविधि में कुछ कमजोरी का संकेत देते हैं।

संशोधित मुद्रास्फीति अनुमान भविष्य की नीतिगत कार्रवाई पर स्पष्टता प्रदान करेंगे। यह ध्यान देने योग्य है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने से अन्य देशों में, जिनमें विकसित विश्व भी शामिल है,  मुद्रास्फीति दर ऊंची बनी रहेगी। विकसित बाजारों में ऊंची बॉन्ड यील्ड वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को सख्त बनाए रखेगी जिससे पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा।

उदाहरण के लिए 10-वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से लगभग 50 आधार अंक बढ़ गई है। अमेरिका में प्रस्तावित विशाल टेक प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भी पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। इन सबका प्रभाव रुपये पर दबाव बने रहने और मुद्रास्फीति परिणामों को प्रभावित करने में हो सकता है। मुद्रास्फीति अनुमान में संशोधन करते समय इन कारकों को भी ध्यान में रखना होगा।

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First Published - June 2, 2026 | 9:30 PM IST

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