क्रिप्टोकरंसी और डिजिटल एसेट्स के इस्तेमाल करने वालों और इनसे जुड़े कारोबारियों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज यानी CBDT ने क्रिप्टो-एसेट रिपोर्टिंग को लेकर 198 पन्नों का एक नया गाइडेंस नोट जारी किया है। इस कदम का सीधा असर यह होगा कि अगले साल से दुनियाभर में क्रिप्टो लेनदेन की जानकारी साझा करना आसान हो जाएगा।
इस नोट को ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD)’ के तैयार किए गए क्रिप्टो एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (CARF) के तहत लाया गया है। इसके बाद अब क्रिप्टो एक्सचेंजों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है, क्योंकि उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर होने वाले ट्रांजैक्शंस की पूरी जानकारी टैक्स डिपार्टमेंट को देनी होगी।
CBDT के मुताबिक, यह गाइडेंस नोट रिपोर्टिंग क्रिप्टो-एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (RCASPs) के लिए तैयार किया गया है। इसका मकसद उन्हें इनकम टैक्स एक्ट और इनकम टैक्स रूल्स के तहत अपनी रिपोर्टिंग जिम्मेदारियों को ठीक से समझने में मदद करना है।
अधिकारियों ने साफ किया है कि इस गाइडेंस नोट या इससे जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (FAQs) का देश में क्रिप्टो-एसेट्स की वेलिडिटी या उनको लेकर नियमों से कोई लेना-देना नहीं है। इसका मतलब है कि यह गाइडेंस नोट केवल टैक्स और रिपोर्टिंग से जुड़े पहलुओं तक सीमित है। इसका उद्देश्य न तो क्रिप्टो-एसेट्स को कानूनी मान्यता देना है और न ही उन पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ा है।
CBDT के चेयरमैन रवि अग्रवाल ने नोट में कहा है कि डिजिटल एसेट्स का दायरा और इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे टैक्स चोरी पर लगाम लगाने और देश के राजस्व की सुरक्षा करने की चुनौती भी बढ़ी है। उनके मुताबिक, यह गाइडेंस नोट सर्विस प्रोवाइडर्स के नियमों को मानने के लिए और स्पष्ट दिशा-निर्देश देगा।
वहीं, CBDT के मेंबर (लेजिस्लेशन) प्रसेनजित सिंह ने कहा कि अब तक क्रिप्टो-एसेट्स पारंपरिक फाइनेंशियल रिपोर्टिंग, जैसे FATCA और CRS, के दायरे से बाहर रह जाते थे। इसकी वजह से दुनिया भर में टैक्स संबंधी जानकारी के आदान-प्रदान में एक बड़ी कमी बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि इसी खामी को दूर करने के लिए CARF को लागू किया गया है।
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CARF के तहत ‘क्रिप्टो-एसेट्स’ को ऐसे डिजिटल एसेज के रूप में बताया गया है, जो सुरक्षित डिजिटल लेजर (ब्लॉकचेन या इसी तरह की तकनीक) पर आधारित होते हैं और जिनके लेनदेन को सुरक्षित तरीके से रिकॉर्ड और वेरिफाई किया जाता है। इसके दायरे में सभी तरह की क्रिप्टोकरेंसी और क्रिप्टो से जुड़े टोकन शामिल हैं।
इस फ्रेमवर्क के लागू होने से क्रिप्टो सेक्टर में टैक्स ट्रांसपेरेंसी बढ़ेगी। इसके साथ ही, क्रिप्टो लेनदेन से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने वाले रिपोर्टिंग क्रिप्टो-एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (RCASPs) की जिम्मेदारियां भी बढ़ जाएंगी। CARF के तहत इन सर्विस प्रोवाइडर्स को अपने यूजर्स की पहचान करनी होगी और लेनदेन की जानकारी हर साल रिपोर्ट करनी होगी।
जब यह जानकारी टैक्स अधिकारियों के पास पहुंच जाएगी, तो अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत इसे ऑटोमैटिक उस देश के टैक्स डिपार्टमेंट के साथ शेयर किया जाएगा, जहां संबंधित क्रिप्टो यूजर टैक्स रेजिडेंट है। इसी तरह के ऑटोमैटिक डेटा एक्सचेंज सिस्टम को डेवल करने की जिम्मेदारी G20 देशों ने OECD को सौंपी थी।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस गाइडेंस नोट के आने के बाद आम टैक्सपेयर्स के लिए कोई नया नियम नहीं जुड़ा है, लेकिन अब सटीक रिकॉर्ड रखना और सही जानकारी देना बहुत जरूरी हो गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि टैक्स डिपार्टमेंट के पास अब सीधे ट्रांजैक्शन लेवल तक की जानकारी पहुंच जाएगी।
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टैक्सपेयर्स को इनकम टैक्स एक्ट के मौजूदा नियमों के मुताबिक, अपनी क्रिप्टो इनकम की सही जानकारी देनी चाहिए। साथ ही, उन्हें क्रिप्टो की खरीद, बिक्री, ट्रांसफर और वॉलेट मूवमेंट से जुड़े सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए। एक्सचेंजों के स्टेटमेंट और दूसरे जरूरी डॉक्यूमेंट्स को संभालकर रखना भी जरूरी है, ताकि इनमक टैक्स रिटर्न में दी गई जानकारी एक्सचेंजों के पास मौजूद डेटा से पूरी तरह मेल खा सके।
गाइडेंस नोट के मुताबिक, हर RCASP के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि वह अपने सभी रिपोर्टेबल यूजर्स की पहचान करे।
गाइडेंस नोट के मुताबिक, सर्विस प्रोवाइडर्स को अपने ग्राहकों की पहचान और टैक्स रेजिडेंसी की जांच (ड्यू डिलिजेंस) करनी होगी तथा तय नियमों का पालन सुनिश्चित करना होगा। पहचान की पुष्टि होने के बाद उन्हें यूजर्स की जानकारी के साथ उनके निर्धारित क्रिप्टो लेनदेन का पूरा ब्योरा टैक्स अधिकारियों को देना होगा।
इसके अलावा, गाइडेंस नोट में ‘रिपोर्टेबल रिटेल पेमेंट ट्रांजैक्शन’ के बारे में विस्तार से बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार की खरीद के लिए क्रिप्टो-एसेट का इस्तेमाल करता है और उस लेनदेन का मूल्य 50,000 डॉलर से अधिक है, तो वह भी इस रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क के दायरे में आएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य देश और विदेश में होने वाले डिजिटल एसेट्स के लेनदेन में अधिक पारदर्शिता और प्रभावी टैक्स रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है।