अनिश्चितता के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की शुरुआत विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत है। हालांकि होर्मुज स्ट्रेट का भविष्य अभी भी अस्पष्ट है लेकिन अब तक की प्रगति के परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में कमी आई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें मई की शुरुआत के उच्च स्तर से 30 फीसदी से अधिक गिर गई हैं और वर्तमान में लगभग 78 डॉलर प्रति बैरल पर बनी हुई हैं।
संघर्ष के कारण ऊंची कच्चे तेल की कीमतों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव डाला था जो रुपये के मूल्य में भी दिखाई दिया। पहले से अधिक भुगतान संतुलन घाटे का सामना करते हुए मार्च से मई के बीच रुपये में 5 फीसदी से अधिक की गिरावट आई। हालांकि तेल की कीमतों में गिरावट से रुपये की स्थिति सुधरी है। मई के निचले स्तर की तुलना में रुपये ने लगभग 1 फीसदी की बढ़त दर्ज की है।
रुपये की बढ़त सीमित रहने के आसार हैं। जैसा कि इस समाचार पत्र ने पिछले सप्ताह रिपोर्ट भी किया था, भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से बढ़ाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप करता हुआ प्रतीत होता है। यह सही कदम है। भारत को पिछले वर्ष भी भुगतान संतुलन घाटे का सामना करना पड़ा था और रिजर्व बैंक ने हाजिर बाजार में शुद्ध 53.13 अरब डॉलर बेचे थे। संभव है कि उसने चालू वित्तीय वर्ष में भी ऐसा करना जारी रखा हो।
इसके अलावा बताया जाता है कि उसके पास बड़े पैमाने पर शॉर्ट पोजीशन हैं। सरकार और रिजर्व बैंक दोनों ने पूंजी प्रवाह में सुधार के लिए कई कदमों की घोषणा की है। इनमें बाह्य वाणिज्यिक ऋण (ईसीबी) के लिए प्रोत्साहन और विदेशी मुद्रा अनिवासी (एफसीएनआर-बी) जमा के माध्यम से प्रवासी भारतीयों से जमा राशि जुटाना शामिल है। बैंक एफसीएनआर-बी के लिए आक्रामक रूप से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और कुछ बैंक रिटर्न बढ़ाने के लिए ऋण भी दे रहे हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार एफसीएनआर-बी से 100 अरब डॉलर तक का प्रवाह आकर्षित हो सकता है।
कुछ बाजार प्रतिभागी उम्मीद करते हैं कि रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) बढ़ा सकता है ताकि तरलता को नियंत्रित किया जा सके। रिजर्व बैंक ने बैंकों से ऐसे जमा और रियायती योजना के तहत जुटाए गए ईसीबी पर दैनिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। केंद्रीय बैंक के लिए यह उचित होगा कि वह समय-समय पर यह जानकारी सार्वजनिक करे। जैसे-जैसे हालात सुधरते हैं यानी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है और पूंजी प्रवाह की संभावित वापसी होती है, रुपये को मजबूत होने देने की मांग उठ सकती है। रिजर्व बैंक के लिए विभिन्न कारणों से ऐसी मांगों का विरोध करना उचित होगा।
पहला, शिथिल नियमों के तहत आने वाले अधिकांश प्रवाह ऋण के रूप में होंगे और मध्यम अवधि में विदेशी मुद्रा में चुकाने होंगे। इसलिए यह तय करना महत्त्वपूर्ण होगा कि इन प्रवाहों को कैसे संभाला जाए। इन्हें रुपये को गति देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। दूसरा, विकसित देशों के कई हिस्सों में ऊंची मुद्रास्फीति दरों को देखते हुए मौद्रिक नीति अधिक सख्त हो सकती है जिससे वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां कड़ी होंगी और पूंजी प्रवाह पर असर पड़ेगा।
यूरोपीय केंद्रीय बैंक और बैंक ऑफ जापान ने हाल के सप्ताहों में नीतिगत ब्याज दरें बढ़ाई हैं और साथ ही बाजार अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दर वृद्धि की संभावना को भी ध्यान में रख रहा है। तीसरा, अमेरिका में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आधारित निवेश लगातार जोखिम पूंजी को आकर्षित कर सकता है जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा। यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत ने पिछले 18 महीनों में शेयर बाजारों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा भारी बिकवाली देखी है। चौथा, भारत ने पिछले कुछ महीनों में एक बड़ा बाहरी झटका झेला है और मुद्रा का अवमूल्यन का एक दौर सुधार की प्रक्रिया में मदद करेगा।
अब जबकि अमेरिका और ईरान ने बातचीत शुरू कर दी है तो गतिरोध और प्रतिकूल परिणामों की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए आने वाले सप्ताहों और महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना विवेकपूर्ण होगा।