स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन बनाने के लक्ष्य के साथ करीब 4 दशक से अधिक समय पहले शुरू की गई योजना अब मूर्त रूप में सामने आई है। देश के पहले स्वदेशी 350 किलोग्राम थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन का सफल विकास और डिलिवरी एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि के रूप में उभरी है।
बेंगलूरु में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक प्रमुख प्रयोगशाला, गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) द्वारा डिजाइन और विकसित, पहले स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन का निर्माण और डिलीवरी हैदराबाद स्थित आजाद इंजीनियरिंग ने किया है। एकल मिशन में इस्तेमाल के लिए एक एक्सपेंडेबल, अल्पकालिक टर्बोजेट इंजन सामरिक क्रूज मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों और लंबी दूरी के लोइटरिंग म्यूनिशंस को शक्ति प्रदान कर सकता है। स्वदेशी तकनीक महत्त्वपूर्ण एयरोस्पेस प्रोपल्सन सिस्टम्स के लिए विदेशी निर्भरता को कम करेगी।
हालांकि नए विकसित इंजन को लड़ाकू विमानों को शक्ति प्रदान करने के लिए नहीं बनाया गया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह गैस टर्बाइन इंजनों की जटिल तकनीक में महारत हासिल करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक माने जाने वाले इंजन प्रौद्योगिकी ने भारत को विमान डिजाइन में महत्त्वपूर्ण प्रगति के बावजूद विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रखा है।
पहले के स्वदेशी प्रोपल्शन प्रयासों के विपरीत नए इंजन का निर्माण आजाद इंजीनियरिंग द्वारा किया गया है, जो एक ऐसी कंपनी है जो विश्व स्तर पर जीई एयरोस्पेस, हनीवेल, रॉल्स-रॉयस, मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज और सीमेंस एनर्जी जैसे एयरोस्पेस दिग्गजों के लिए सटीक रोटेटिंग कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जानी जाती है।
रक्षा विश्लेषकों ने कहा कि टरबाइन ब्लेड और सटीक कंपोनेंट्स के निर्माण से लेकर एक संपूर्ण स्वदेशी इंजन के उत्पादन तक यह परिवर्तन भारत के निजी रक्षा उद्योग के एक महत्त्वपूर्ण विकास का प्रतीक है।
एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) और सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर ऐंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज के पूर्व महानिदेशक अनिल गोलानी ने कहा, ‘भारतीय उद्योग अब एयरोस्पेस-ग्रेड मानकों के अनुसार पूर्ण प्रोपल्शन सिस्टम का निर्माण करने में सक्षम है।’