facebookmetapixel
Advertisement
ITR File करने जा रहे हैं? भूलकर भी न करें ये बड़ी गलतियां, वरना घर आ सकता है टैक्स नोटिसअभी तक नहीं किया ITR File? Paytm ने अपने ऐप पर शुरू की फाइलिंग की सुविधा, जानें स्टेप-बाय-स्टेप तरीकाखरीफ फसलों की बोआई और सुधरी, रकबा में कमी अब 5 फीसदी से नीचेबंगाल में कर्मचारियों के लिए खुशखबरी! सरकार 7वें वेतन आयोग लागू करने की तैयारी में, DA-DR में होगी बढ़ोतरीडॉलर की कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से संभली भारतीय मुद्रा, 95.92 पर हुआ बंदसरकार ने संसद में ‘एंटी-पेपर लीक बिल’ किया पेश, 10 साल तक जेल और ₹10 करोड़ तक जुर्माने का प्रस्तावCryptocurrency में करते हैं लेन-देन? CBDT ने जारी की नई ट्रांजैक्शन-एक्सचेंज गाइडलाइन, जानें क्या बदलाNPS New Tools: NPS में पैसा लगा रहे हैं? PFRDA का नया टूल बताएगा किस फंड ने दिया सबसे बेहतर रिटर्नQ1 Results: PN गाडगिल ज्वेलर्स का मुनाफा 52% बढ़ा, शेयर में आई 8% की जोरदार तेजीग्रेड-ए मॉल स्पेस की किल्लत, सप्लाई से 4.5 गुना ज्यादा लीजिंग; क्या डेवलपर्स के लिए है मौका?

Editorial: अमेरिकी शुल्क के नए दांव से व्यापार समझौते पर बढ़ेगी अनिश्चितता

Advertisement

यह प्रस्ताव उस जांच के बाद आया जिसमें देखा गया कि क्या भारत सहित 60 अर्थव्यवस्थाओं में बंधुआ मजदूरी से उत्पादित सामग्री के आयात के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं

Last Updated- June 03, 2026 | 11:56 PM IST
India-US trade

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने भारत से आयात पर 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम के सेक्शन 301 के तहत अतिरिक्त 12.5 फीसदी शुल्क लगाने का जो प्रस्ताव रखा है वह आयात पर कुल प्रतिबंधों को बढ़ाने का प्रयास ही है। यह प्रस्ताव उस जांच के बाद आया जिसमें देखा गया कि क्या भारत सहित 60 अर्थव्यवस्थाओं में बंधुआ मजदूरी से उत्पादित सामग्री के आयात के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं।

यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि सभी 60 अर्थव्यवस्थाएं इस मामले में कमतर हैं। कनाडा, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर अतिरिक्त 10 फीसदी शुल्क लगाया जा सकता है जबकि भारत और कई अन्य देशों पर 12.5 फीसदी। निष्कर्षों का इस कदर व्यापक होना इस कवायद के उद्देश्य पर ही सवाल उठाता है। बंधुआ मजदूरी एक जायज चिंता है लेकिन ऐसी जांच जो अमेरिका के कुल आयात के लगभग 99 फीसदी हिस्से को कवर करती है और हर एक में कमी पाती है वह लक्षित प्रवर्तन कम और नए शुल्कों के लिए कानूनी औचित्य खोजने जैसी अधिक नजर आती है।

भारत के लिए इसके निहितार्थ केवल समग्र शुल्क दर तक सीमित नहीं हैं। यूएसटीआर की रिपोर्ट ने एल्युमीनियम, कपास, इलेक्ट्रॉनिक्स, लीथियम-ऑयन बैटरियों और चावल जैसे क्षेत्रों में जोखिम की पहचान की है। साथ ही कपास, मछली, पाम ऑयल, कॉफी, कोको और निकल आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े उत्पादों के निर्यात को भी चिह्नित किया है।

स्पष्ट है कि यूएसटीआर की सिफारिश को पिछले वर्ष अमेरिकी व्यापार नीतियों के विकास से अलग नहीं किया जा सकता। जब अदालतों ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए जवाबी शुल्क को खारिज कर दिया तब अमेरिका ने वैकल्पिक कानूनी रास्तों की ओर रुख किया। व्यापार अधिनियम के सेक्शन 122 के तहत अस्थायी शुल्क लगाए गए जो जल्द ही समाप्त होने वाले हैं।

शुल्क ट्रंप के आर्थिक एजेंडे का केंद्रीय हिस्सा हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि दुनिया अमेरिका के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं कर रही है जो व्यापार घाटे में नजर आ रहा है। यह भी विश्वास है कि शुल्क आयात को कम करेंगे और घरेलू उत्पादन बढ़ाएंगे। इससे रोजगार तैयार होगा। इसी कारण मार्च में यूएसटीआर ने सेक्शन 301 के तहत दो बड़ी जांच शुरू कीं।

एक बंधुआ मजदूरी पर थीं और दूसरी उस पर जिसे यूएसटीआर ‘संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता’ कहता है और जो भारत सहित 16 अर्थव्यवस्थाओं के विनिर्माण क्षेत्रों में फैली हुई है। जांच में सौर मॉड्यूल, वस्त्र, स्वास्थ्य उद्योग, ऑटोमोबाइल वस्तुओं, पेट्रोकेमिकल्स, इस्पात और निर्माण सामग्री जैसे उद्योगों को शामिल किया गया। हालांकि ऐसी चिंताएं अक्सर चीन के राज्य-प्रेरित औद्योगिक मॉडल से जुड़ी होती हैं लेकिन भारत को भी इसके दायरे में लाया गया है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

बुधवार को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि भारत, अमेरिका के साथ सेक्शन 301 के तहत चल रही परामर्श प्रक्रिया में संलग्न रहेगा। इसके साथ ही इस वर्ष की शुरुआत में घोषित प्रारूप व्यापार समझौते को भी आगे बढ़ाएगा। यूएसटीआर का प्रस्ताव स्पष्ट रूप से चल रही व्यापार वार्ताओं को और कठिन बना रहा है।

रिपोर्टों में कहा गया कि यदि दोनों पक्ष समझौते पर पहुंच जाते हैं तो भारत पर सेक्शन 301 के तहत शुल्क नहीं लगाया जाएगा। यह भी बताया गया कि समझौता 99 फीसदी तक पूरा हो चुका था। नई अनिश्चितता को देखते हुए, सरकार को अमेरिकी वार्ताकारों के सामने अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखना होगा। हालांकि अमेरिका की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था की समस्या यह है कि किसी भी बात को निश्चित नहीं माना जा सकता।

अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि अमेरिका किसी समझौते के बाद भी नई शर्तें लगा सकता है। इस प्रकार, परिस्थितियां कुछ समय तक अनिश्चित बनी रहने की आशंका है और यह अनिश्चितता केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिकी प्रशासन अपने सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को निशाना बना रहा है। इससे वैश्विक अनिश्चितता और बढ़ सकती है तथा आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं।

Advertisement
First Published - June 3, 2026 | 11:56 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement