अखिल भारतीय उपभोक्ता उत्पाद वितरण महासंघ ने हाल ही में विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे परिचालन मॉडलों की वैधता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि वह दखल दे और विसंगतियों को दूर करे। यद्यपि व्यापारियों के संगठन का यह दावा कि विदेशी कंपनियों ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति का उल्लंघन किया है, कुछ हद तक उचित हो सकता है लेकिन अब समय आ गया है कि खुदरा क्षेत्र (ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों) को जकड़े हुए जटिल नियमों के व्यापक मुद्दे की समीक्षा की जाए।
जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी में हो रही तरक्की नियामक बहसों से आगे निकल रही है वैसे-वैसे नियमावली में स्पष्टता, पारदर्शिता और चुस्ती लाने की आवश्यकता है ताकि कोई भी खुदरा व्यवसाय आसानी से उसका पालन कर सके। सरल नियमों से उद्योग द्वारा अनुपालन स्तर में वृद्धि हो सकती है और साथ ही निवेशकों को आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी।
ई-कॉमर्स का आकार वर्तमान 90-100 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक लगभग 250 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। उसके लिए एक व्यापक और स्पष्ट नीति के एकल संदर्भ केंद्र की आवश्यकता है ताकि हितधारकों को विभिन्न प्रकार की अनुमति और स्पष्टीकरण के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग तक दौड़ना न पड़े। आमतौर पर एक ई-कॉमर्स कंपनी और खासकर विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी को अलग-अलग आवश्यकताओं के लिए कम से कम आठ से नौ मंत्रालयों या विभागों से जुड़ना पड़ता है। वर्षों से बन रही देश की ई-कॉमर्स नीति को व्यापार सुगमता में मदद करनी चाहिए।
खुदरा क्षेत्र का आकार पिछले वर्ष 1 लाख करोड़ डॉलर से अधिक था और इसके 2030 तक 2 लाख करोड़ डॉलर पार करने का अनुमान है। इस क्षेत्र की नीतियां कई दशकों से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही हैं और सरकार किसी भी दल की हो, फर्क नहीं पड़ता। इससे खुदरा क्षेत्र को कई नामकरणों और दिशानिर्देशों में परतदार बना दिया गया है। अन्य देशों में ऐसा मॉडल देखने को नहीं मिलता।
बहु-ब्रांड खुदरा में एफडीआई 2012 में नीति अधिसूचित होने के बाद भी स्थगित है। इसमें 51 फीसदी तक विदेशी निवेश की अनुमति दी गई थी। किराना दुकानों या छोटे खुदरा विक्रेताओं की रक्षा करना वॉलमार्ट जैसे विदेशी बहु-ब्रांड कारोबारियों का विरोध करने का प्रमुख कारण रहा है। ध्यान रहे यह एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मतदाता वर्ग है। बहु-ब्रांड के विपरीत एकल-ब्रांड खुदरा में एफडीआई काम कर पाया है। इनमें 100 फीसदी तक विदेशी निवेश की अनुमति है।
ऐपल, आइकिया और एचऐंडएम जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ब्रांड ने वर्षों की बातचीत के बाद 100 फीसदी एफडीआई मार्ग से भारत में प्रवेश किया। फ्रैंचाइजी मार्ग विदेशी ब्रांडों के लिए एक अन्य प्रारूप है जिसके लिए फिर अलग-अलग नियम हैं। वॉलमार्ट और कारफू जैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों ने अपने बहु-ब्रांड महत्त्वाकांक्षाओं के भारत में असफल होने के बाद बिजनेस-टु-बिजनेस लेनदेन के लिए कैश-ऐंड-कैरी प्रारूप का प्रयोग किया।
ई-कॉमर्स ने हलचल मचा दिया और अंतरराष्ट्रीय प्रमुख ब्रांड इस क्षेत्र में आए। हाल ही में उन्होंने क्विक कॉमर्स खंड में भी प्रवेश किया। वॉलमार्ट (फ्लिपकार्ट में बहुसंख्यक हिस्सेदारी के रूप में) और एमेजॉन दोनों ही ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में अपने निवेश बढ़ा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे पारंपरिक खुदरा नियमों में होता है, ई-कॉमर्स के लिए दिशानिर्देश कंपनी द्वारा अपनाए गए प्रारूप पर निर्भर करते हैं।
इसलिए ऑनलाइन प्रारूपों की एक खिचड़ी है जिसमें एफडीआई नियमों की एक पूरी श्रृंखला है। इसमें इन्वेंटरी-आधारित, मार्केटप्लेस, भारत में निर्मित खाद्य पदार्थ, अंतरराष्ट्रीय खाद्य ब्रांड आदि शामिल हैं। निर्यात के लिए भी एक अलग श्रेणी आ सकती है। व्यापारियों के संगठन की हालिया शिकायत इन्वेंट्री-आधारित और मार्केटप्लेस प्रारूपों के बीच अंतर से उत्पन्न होती है।
ई-कॉमर्स एफडीआई के नियमों के अनुसार विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स कंपनियां इन्वेंट्री का स्वामित्व नहीं रख सकतीं लेकिन वे गोदाम अधोसंरचना स्थापित करने में मदद कर सकती हैं। ऐसा अंतर न केवल निवेशकों को आकर्षित करने में बाधा डालता है बल्कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर समान अवसर की धारणा के विरुद्ध भी माना जा सकता है।