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Editorial: ईरान-इजरायल युद्ध के चलते बढ़ती अनिश्चितता और बिगड़ता भारत का आर्थिक समीकरण

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पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। महंगे तेल और विदेशी निवेश की निकासी ने सरकारी खजाने की चिंता बढ़ा दी है

Last Updated- March 09, 2026 | 9:45 PM IST
Tehran Oil Depot Attack
तेहरान के एक तेल फैक्ट्री पर हमले के बाद उठता धुंआ

ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले हाल के दिनों में तेज हो गए हैं और फिलहाल इनके जल्द खत्म होने के कोई संकेत भी नहीं दिख रहे हैं। इस युद्ध का उद्देश्य भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इसका परिणाम क्या होगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। इस वजह से अनिश्चितता का माहौल बन गया है, खासतौर पर भारत जैसे देशों के लिए। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं या इसकी आपूर्ति में बाधा आती है तो इससे भारत की व्यापक आर्थिक व्यवस्था का प्रबंधन मुश्किल हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर, ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें सोमवार को थोड़ी देर के लिए बढ़कर लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। हालांकि भारत की आर्थिक बुनियाद अभी स्थिर है लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तब इससे देश के बाह्य खातों और सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति के संदर्भ में यह भी याद रखना जरूरी है कि ईरान से जुड़े इस युद्ध ने वैश्विक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

वर्ष 2025 में अमेरिका ने भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाए थे। इसके बाद फरवरी में भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमति बनी थी। लेकिन हाल ही में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कब तक अंतिम रूप ले पाएगा।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा पिछले सप्ताह जारी किए गए वित्त वर्ष 2025 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) के भुगतान संतुलन (बीओपी) के आंकड़ों से पता चलता है कि इस अवधि में भारत को 24 अरब डॉलर से अधिक का बीओपी घाटा झेलना पड़ा। इससे पहले वाली तिमाही में यह घाटा लगभग 10.9 अरब डॉलर था। आमतौर पर भारत में चालू खाता घाटा बना रहता है जिसकी भरपाई पूंजी खाते से आने वाले निवेश से हो जाती है। लेकिन अगर लंबे समय तक चालू खाता और पूंजी खाता दोनों में ही घाटा रहने लगे तब बाहरी आर्थिक स्थिति को संभालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने जनवरी 2025 से अब तक भारतीय शेयर बाजार में 22 अरब डॉलर से अधिक के शेयर बेच दिए हैं। एफपीआई के भारत से धन निकालने की एक बड़ी वजह वैश्विक अनिश्चितता भी है। अगर ईरान से जुड़ा युद्ध लंबे समय तक चलता है तब स्थिति और कठिन हो सकती है।

इसका असर शेयर बाजार पर भी दिख रहा है और सोमवार को बीएसई सेंसेक्स में 1.7 फीसदी से अधिक की गिरावट देखी गई। ऐसे में अब आगे की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि युद्ध कब खत्म होता है और उसके परिणाम क्या होते हैं। अगर इस युद्ध से क्षेत्र में स्थायी शांति के बजाय अधिक अस्थिरता बढ़ती है तब परिस्थितियां और खराब हो सकती हैं। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में भारत का चालू खाता घाटा, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1 फीसदी रहेगा, जो वर्ष 2026–27 में बढ़कर करीब 1.5 फीसदी हो सकता है।

हालांकि युद्ध कितने समय तक चलता है और उसके नतीजे क्या होते हैं, इसके आधार पर ये अनुमान बदल भी सकते हैं। भले ही चालू खाता घाटा अनुमानित स्तर पर रहे लेकिन अगर वैश्विक अनिश्चितता बनी रहती है तब इसके लिए वित्तीय संसाधन जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अहम बात यह है कि व्यापार के मोर्चे पर आई बाधाओं के बावजूद भारत ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया। भारत ने लगातार अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखी और यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता भी पूरा किया। लेकिन मौजूदा हालात में भारत इन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है। हालांकि भारत के पास 728 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है जो मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद करेगा। लेकिन अगर पूंजी खाते में लंबे समय तक घाटा बना रहता है तब इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का असर सरकारी वित्त पर भी पड़ेगा।

तेल कंपनियों के लिए बढ़ी हुई लागत का भार सीधे उपभोक्ताओं पर डालना मुश्किल हो सकता है क्योंकि अब पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें पहले की तरह नियमित रूप से संशोधित नहीं की जातीं। ऐसी स्थिति में सरकार के पास दो ही विकल्प रह जाते हैं कि या तो वह करों में कटौती करे या फिर तेल कंपनियों के घाटे की भरपाई सीधे बजट से करे। ऐसे में भले ही बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जाए, सरकारी खजाने पर दबाव पड़ना तय है। इसके अलावा सरकार को उर्वरक सब्सिडी के लिए भी अधिक राशि आवंटित करनी पड़ सकती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक कई मंत्रालयों में खर्च की रफ्तार धीमी है।

ऐसे में चालू वित्त वर्ष में कुल सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ समायोजन किए जा सकते हैं। अगले वित्त वर्ष की स्थिति भी काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया में आगे क्या होता है।

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First Published - March 9, 2026 | 9:45 PM IST

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