दिल्ली सरकार ने 2026-27 के लिए इसी हफ्ते लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया। इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 13,034 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो चालू वित्त वर्ष के आवंटन से लगभग 1 प्रतिशत अधिक है। सरकार की अस्पतालों का निर्माण पूरा करने, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का विस्तार करने और एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं की स्थापना करने पर ध्यान देने की योजना है।
किंतु भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा हाल ही में जारी 2016-17 से 2021-22 तक की ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में बड़ी कमियां हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख कमियां हैं – 21 प्रतिशत से भी ज्यादा कर्मचारियों की कमी, आवश्यक दवाओं की अनुपलब्धता, अस्पतालों में अत्यधिक भीड़ और धन का इस्तेमाल नहीं होना। प्रति 1,000 लोगों पर अस्पताल के केवल 0.7 बिस्तर होना, सर्जरी के लिए लंबा इंतजार करना और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में देर होना शासन एवं क्षमता संबंधी गंभीर समस्याओं की ओर इशारा करते हैं।
लेकिन दिल्ली अपवाद नहीं है। ये समस्याएं पूरे देश में हैं और इनसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में बड़ी बुनियादी खामी का पता चलता है। स्वास्थ्य पर भारत का सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.8 प्रतिशत ही है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी कम है। परिवारों को अब भी स्वास्थ्य सेवा पर 39 प्रतिशत खर्च अपनी जेब से ही करना पड़ता है, जिसमें बड़ा खर्च दवाओं पर होता है। इस कारण स्वास्थ्य सेवा हासिल करना कई परिवारों के वश में ही नहीं रह जाता।
प्राथमिक बुनियादी ढांचे में कमियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जहां कई स्वास्थ्य केंद्र निर्धारित संख्या से कहीं बड़ी आबादी को सेवाएं प्रदान करते हैं। इस कारण भीड़भाड़ बढ़ती है और सेवा की गुणवत्ता कम होती है। भारत में भी प्रति 1,000 लोगों पर अस्पताल के केवल 1.4 बिस्तर उपलब्ध हैं, जो 3.5 के वैश्विक औसत से काफी कम है।
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मानव संसाधन की कमी बड़ी बाधा है। भारत में प्रति 1,263 लोगों पर एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति 1,000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी ज्यादा है, जहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों के लगभग 70 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।
वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को लगभग 1.06 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो पिछले वर्ष से 10 प्रतिशत अधिक है। इसका एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को दिया गया है और उसके बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान तथा मेडिकल कॉलेजों जैसे स्वायत्त संस्थानों को धनराशि आवंटित की गई है।
प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के लिए आवंटन बढ़ा है। लेकिन कई योजनाओं में धनराशि का कम उपयोग हुआ है, जो प्रशासनिक और कार्यान्वयन संबंधी बाधाओं को दर्शाता है। मोटे तौर पर यही लगता है कि भारत में स्वास्थ्य की चुनौती अधिक खर्च करने की ही नहीं है बल्कि बेहतर ढंग से खर्च करने की भी है।
धनराशि का कम उपयोग, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में देर, कर्मचारियों की किल्लत और दवा खरीद में विफलताएं ऐसे प्रशासनिक मुद्दे हैं जिन पर प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है।
बड़े अस्पतालों में भीड़ कम करने के लिए विकेंद्रीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करना, विशेष रूप से स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना बहुत जरूरी है। भारत में लगभग 1.8 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिर हैं, लेकिन ये कारगर तभी होंगे, जब इनमें पर्याप्त कर्मचारी तथा दवा होंगी।
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केंद्र-राज्य समन्वय बढ़ना भी जरूरी है। अंत में भारत की आर्थिक वृद्धि और जनसंख्या संबंधी लाभ उसके कार्यबल के स्वास्थ्य पर निर्भर करते हैं। इसलिए दिल्ली में हुए ऑडिट के निष्कर्षों को पूरे भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रशासन की प्रणालीगत कमजोरियों के बारे में एक चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है। अभी अधिक कुशल, जवाबदेह और सुलभ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली बनाने की जरूरत है।