मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधारों से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के साथ ही नियमन एवं अनुपालन में खर्च होने वाली मानवीय ऊर्जा को बचाया जाए तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन, यदि ऐसा कुछ भी हो जो छोटे कारोबार की वृद्धि की इच्छा या क्षमता को रोकने वाला हो तब यह चिंताजनक है।
एमएसएमई को मजबूत और परिस्थितियों के अनुकूल अधिक लचीला बनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित और सक्षम किया जाना चाहिए ताकि वे तेजी से अपना राजस्व बढ़ा सकें और निवेश के लिए जरूरी अधिशेष और कर्ज जुटा सकें। इसके अलावा बाजार में इनकी पहुंच का दायरा बेहतर करने और सक्षम लोगों की नियुक्ति करने पर भी जोर देने की जरूरत है। यह विशेष रूप से उन सूक्ष्म कंपनियों के लिए सच है जो एमएसएमई का अधिकांश हिस्सा हैं और जिनका छोटा आकार और ऋण लेने में कठिनाई वास्तव में उन्हें छोटे झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
हम अपने अनुभव से जानते हैं कि चाहे वह वित्तीय या किसी और अन्य तरह का प्रोत्साहन हो, उसने कंपनियों को छोटे बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया है, बजाय इसके कि उन्हें अवसरों का लाभ उठाकर विकास और समृद्धि के लिए प्रेरित किया जाए। भारत की लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रतिष्ठा और डिजिटल दौर में आसानी से सुलभ पेशेवर संसाधन, वे सभी अवसर देते हैं। आज का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि हम तेजी से बढ़ते हुए लाभ उठाएं न कि अपने दायरे को छोटा बनाए रखें। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक लाभ बढ़ाना होना चाहिए, न कि तात्कालिक चुनौतियों को कम करना। उदाहरण के तौर पर, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) से बाहर रहना वास्तव में बड़ी कंपनियों के लिए आपूर्तिकर्ता बनने की संभावना कम कर देता है क्योंकि वे कंपनियां खरीद पर दिए गए जीएसटी का समायोजन चाहती हैं।
समिति का जोर अनुपालन की मुश्किलों को कम करने और प्रक्रियाओं को सरल और सुव्यवस्थित बनाने पर है। उम्मीद है कि आगे चलकर हर सरकार और नियामक संस्था इसे अपना मुख्य उद्देश्य बनाएगी ताकि आकार की परवाह किए बिना सभी को लाभ मिल सके। उम्मीद है कि इससे एक नई डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का एक तरह का ‘अनुपालन ढांचा’ तैयार होगा, जिससे सभी फॉर्म और रिटर्न आसानी से भरे जा सकें। इसमें डेटा दर्ज करने के कई विकल्प हों ताकि अनुपालन स्वयं (डीआईवाई) किया जा सके।
अनुपालन लागत को कम करना, कंपनी केंद्रित होने के बजाय नियामक-केंद्रित प्रयास होना चाहिए। केवल छूट देकर मानकों को कम करना उचित नहीं है क्योंकि इससे सुशासन कमजोर हो सकता है और लेखांकन की सख्ती घट सकती है। ऐसे में ऑडिट आवश्यकताओं में पूरी तरह ढील देने के बजाय, ऑडिट के दायरे को सीमित और स्पष्ट करना अधिक उपयोगी हो सकता है। साथ ही उम्मीद है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उत्पाद भविष्य में ऑडिट की लागत को काफी कम कर देंगे। साल में एक बार बोर्ड बैठक करने के बजाय चार बार बैठक करना कहीं अधिक बेहतर है, खासतौर पर स्टार्टअप्स और उद्यमियों द्वारा संचालित संगठनों के लिए। यदि छोटी कंपनियों को निजी बाजारों से भी सार्वजनिक पूंजी तक पहुंच बनानी है तब उनके शासन-प्रबंधन स्तर को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है।
बोर्ड बैठकों और उनमें होने वाली अनुपालन समीक्षा का एक सकारात्मक दबाव होता है। ये बैठकें कारोबारों को नियमित रूप से अपने आंतरिक प्रबंधन, वित्तीय स्थिति और रिकॉर्ड रखने पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे वे समय पर वित्तीय विशेषज्ञों की मदद ले पाते हैं और ‘बाद में दुरुस्त करने’ जैसी सोच के साथ नियमों की सीमाएं लांघने के प्रलोभन से बचते हैं। आज के समय में बोर्ड बैठकें ऑनलाइन भी की जा सकती हैं इसलिए इनकी लागत बहुत कम हो गई है। साथ ही, कई सक्षम और ईमानदार लोग बोर्ड सदस्य के रूप में योगदान देने को तैयार रहते हैं। कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) ऐसे योग्य स्वयंसेवी बोर्ड सदस्यों का एक डेटाबेस भी बना सकता है।
अच्छा शासन शुरुआत से ही साफ-सुथरे और मजबूत व्यवसाय की नींव रखता है। खराब प्रचलन को बाद में बदलना कठिन होता है ऐसे में शुरुआत से ही सही चलन अपनाना बेहतर है। अब स्टार्टअप यह समझ चुकी हैं कि निदेशक मंडल का मजबूत प्रशासन कंपनियों की रफ्तार नहीं रोकता बल्कि उनके जोखिम को कम करता है। जब रणनीतिक या वित्तीय मामलों में अनावश्यक साहसिक कदम उठाए जाते हैं तब निदेशक मंडल समय पर चेतावनी देकर संस्थापकों को संभावित गलतियों से बचा सकता है।
इसी तरह, यदि एमएसएमई क्षेत्र को तेजी से आगे बढ़ने और विस्तार के लिए तैयार करना है तब उसकी नींव भी सख्त अनुपालन और अच्छे शासन पर ही रखनी होगी। यह मानसिकता और उसी के आधार पर बना कानूनी ढांचा, फिर से विचार करने योग्य है कि स्टार्टअप और एमएसएमई अलग-अलग श्रेणियां हैं। यह सोच कि स्टार्टअप्स को बड़े सपने देखने, तेजी से बढ़ने और बाहरी पूंजी जुटाने का अधिकार है जबकि एमएसएमई को छोटा ही रहने, सीमित दायरे में काम करने और कम अपेक्षाओं के साथ चलने के लिए कहा जाए, यह एक तरह की वर्ग व्यवस्था है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।
आज के समय में हर कारोबार के पास एक मजबूत डिजिटल केंद्रीय तंत्र और आधुनिक नियम व प्रक्रियाएं होनी चाहिए ताकि वे आधुनिक दुनिया में प्रतिस्पर्धा कर सकें। केवल व्यावसायिक समझ ही पर्याप्त नहीं है, हालांकि छोटे भारतीय व्यवसायों ने अपनी समझ और क्षमता का भरपूर प्रदर्शन किया है। दरअसल, उपभोक्ता को सीधे सेवाएं या उत्पाद देने वाले (बी2सी) छोटे कारोबारों का एक बड़ा वर्ग है जो दो महत्त्वपूर्ण आर्थिक नीतिगत क्षेत्रों के मेल के आधार पर मौजूद है। मसलन घरेलू खपत को बढ़ावा देना और एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करना। बड़ी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के भाषणों में भी इनका जिक्र एक मजबूत प्रतिस्पर्धा के रूप में किया गया है।
इन छोटे कारोबार ने बेहतर ग्राहक संबंध, सूझबूझ वाले नवाचार और कम कीमतों के सहारे पहले ही बाजार का अच्छा-खासा हिस्सा हासिल कर लिया है। वे अब विस्तार के लिए तैयार हैं। उन्हें छूट नहीं बल्कि प्रोत्साहन चाहिए, उन्हें वित्तीय सहायता और सरल, सुव्यवस्थित अनुपालन प्रक्रियाएं चाहिए न कि शासन संबंधी ढील।