जब मैंने मुख्यधारा के एक समाचार पत्र में एक खास किस्म का लेख पढ़ा तो ग्राहकों के हितों को उठाने वाले और उसी अनुरूप व्यवहार करने वाले एक व्यक्ति के रूप में मुझे काफी खुशी हुई। इस लेख में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों से आग्रह किया गया था कि वे अपने कार्यालयों से बाहर निकल कर ‘ग्रामीणों के जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव करें और उनकी समस्याओं को आमने-सामने समझें’ भले ही उनके पास डिजिटल डेटा और दूरस्थ निगरानी की निरंतर व्यवस्था उपलब्ध हैं। (‘वाॅक विद द पीपल, वुड यू, कलेक्टर साहब ?’ टाइम्स ऑफ इंडिया, 27 मार्च, 2026)।
यह सलाह कारोबार जगत के लिए भी उपयोगी है जहां सरकारी व्यवस्था की तरह ही जीवंत और गतिशील डेटा, डैशबोर्ड और आकर्षक विश्लेषणात्मक उपकरण ग्राहकों को जानने का भ्रम पैदा करते हैं और उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़ने की जरूरत खत्म कर देते हैं। अक्सर यह बात नजरअंदाज कर दी जाती है कि डेटा और डैशबोर्ड ग्राहकों के परिणामों के बजाय कंपनी के प्रयासों का आपूर्ति पक्ष से जुड़े विवरण होते हैं।
सहस्राब्दी के आरंभ में सत्ता में आए तकनीकी रूप से एक अत्यंत कुशल मुख्यमंत्री की उनकी आधुनिकता और डेटा-आधारित कार्य शैली के लिए प्रशंसा की जाती थी। अक्सर मजाक में कहा जाता था कि वह नरीमन पॉइंट के वोट न डालने वाले अभिजात वर्ग के चहेते हैं। उन्होंने जिन कंपनियों की सेवाएं ली थी उनमें एक के सलाहकार ने गर्व से कहा कि उनकी मदद से मुख्यमंत्री राज्य में स्वास्थ्य समस्याओं से संबंधित मामलों के डेटा की समीक्षा प्रत्येक गुरुवार सुबह करते थे और एक बार में केवल एक जिले से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जाता था। जब वह दोबारा निर्वाचित नहीं हुए तो कंपनी जगत के उनके प्रशंसकों ने इस बात पर बहस छेड़ दी कि क्या भारतीय इतने विकसित और कुशल शासन के लिए तैयार हैं।
टीवी चैनलों पर चुनाव के बाद हुए जनमत सर्वेक्षणों और जमीनी स्तर से रिपोर्टिंग करने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि अगर उन्होंने जनता के बीच अधिक समय बिताया होता तो उनका प्रदर्शन कहीं बेहतर होता। इससे उन्हें जनता की चिंताओं को समझने में मौजूद कमियों को दूर करने में मदद मिलती साथ ही जनता की नजरों में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता जो उनकी बात सुनता है।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) की अपार क्षमताओं और एआई-केंद्रित व्यवसायों के संभावित मूल्य को लेकर उत्साह के बीच स्टार्टअप से जुड़ी योजनाएं मेरे पास मूल्यांकन के लिए भेजी जाती हैं। ये योजनाएं बाजार अनुसंधान अध्ययनों में मानव उत्तरदाताओं की जगह कृत्रिम उत्तरदाताओं के इस्तेमाल से अनुसंधान पर होने वाले खर्च बचाने और बाजार में उत्पाद लाने में लगने वाले समय को कम करने से संबंधित हैं।
कंपनी के स्वामित्व वाले और सार्वजनिक डेटा से प्रशिक्षित ये स्टार्टअप नए प्रस्तावों की स्वीकृति का पूर्वानुमान लगाने, विज्ञापन परीक्षण करने, मूल्य-व्यवहार मॉडलिंग करने या व्यापक उपयोग के लिए इनका उपयोग प्रस्तावित करते हैं ताकि मानव उत्तरदाताओं पर आधारित बाजार अनुसंधान की आवश्यकता ही न पड़े। उन्हें और अधिक पढ़ने और उपभोक्ता-आंतरिक कारणों और उपभोक्ता व्यवहार के बाहरी कारकों पर विचार करने के लिए राजी करने में बहुत प्रयास और धैर्य की जरूरत होती है।
इनके बाद यह आकलन करना होता है कि किस सीमा तक और किन परिस्थितियों में पिछले डेटा या प्रतिस्पर्द्धी आपूर्ति के किसी निश्चित मॉडल पर प्रशिक्षित मॉडल का उपयोग करना सुरक्षित है और उसके आधार पर यह तय करना होता है कि निर्णय लेने से जुड़ी किन समस्याओं के लिए वास्तविक लोगों से नई अंतर्दृष्टि की आवश्यकता हो सकती है या कृत्रिम उत्तरदाताओं को अधिक बहुमुखी बनाने के लिए वास्तविक लोगों के विचारों पर निरंतर नजर रखने की आवश्यकता है। (चैटजीपीटी इससे सहमत है!)
एल्गोरिद्म आधारित परफॉर्मेंस मार्केटिंग की यह कहते हुए आलोचना होती है कि इसमें ग्राहक अंतर्दृष्टि को कम महत्त्व दिया जाता है और उपभोक्ताओं के विचारों, उनकी भावनाओं और निर्णय लेने के तरीकों के बारे में प्रबंधकीय समझ कमजोर और कुंद हो जाती है जिससे नवाचार करने, बाजार को बाधित करने या बिल्कुल नए रुझानों पर दांव लगाने की क्षमता कम हो जाती है।
कंपनियों को अपने आधिकारिक लक्ष्यों पर अमल करने की जरूरत है। उनके लिए ग्राहकों को प्रसन्न करने के अपने संकल्प को बताना या ग्राहक-केंद्रित होने की घोषणा करना अनिवार्य है। पहला कदम यह समझना है कि ये सभी कथन ‘हम’ (कंपनी) के बारे में हैं न कि ‘उन’ (ग्राहकों) के बारे में और जो कमी है वह यह है कि कंपनी अपने ग्राहकों को प्रसन्न करने के लिए क्या करने का प्रयास करती है और वह इसे कैसे प्राप्त करती है। अक्सर कंपनियां ग्राहकों से जुड़ी अपनी प्राथिमकताओं को ग्राहक खर्च का 360 डिग्री आकलन, अधिक क्रॉस-सेलिंग, टिकट साइज या उपभोग की आवृत्ति में वृद्धि और ‘जुड़ाव’ में सुधार के रूप में परिभाषित करती हैं न कि ग्राहक समस्याओं को हल करने या उनके जीवन में ग्राहक-अनुभूत मूल्य बढ़ाने के संदर्भ में।
कानून के अनुसार यह सालाना परिचालन योजनाओं को बोर्ड द्वारा अनुमोदित किए जाने का समय है। हम सभी जानते हैं कि अधिकांश योजनाएं इस तर्क पर आधारित होती हैं कि ‘उद्योग में एक निश्चित प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है और इसी आधार पर हमारी वृद्धि दर किसी खास स्तर पर होगी’। शायद बोर्ड को भी ग्राहक-केंद्रितता को बढ़ावा देने में अपना योगदान देना चाहिए, खासकर अगर कंपनी बाजार में अग्रणी है तो समझने की कोशिश की जानी चाहिए कि उद्योग की वृद्धि वास्तव में कैसे होती है और इस पूर्वानुमान के पीछे ग्राहक-संबंधी कौन सी मान्यताएं हैं।
उन्हें विकास योजनाओं को मूल्य-आधारित वृद्धि, मिश्रण (या पोर्टफोलियो)-आधारित वृद्धि और मात्रा-आधारित वृद्धि के घटकों में विभाजित करने के लिए भी कहना चाहिए और फिर यह पूछना चाहिए कि यह वृद्धि ‘किससे’ (भौगोलिक क्षेत्र) और ‘उत्पाद’ से नहीं बल्कि ‘किससे’ और क्यों आएगी और इस प्रक्रिया को ग्राहक व्यवहार के बारे में प्रबंधन की दूरदर्शिता तक ले जाना चाहिए। जी हां, यह सभी प्रकार के व्यवसायों पर लागू होता है चाहे वे व्यवसाय-से-ग्राहक हों व्यवसाय-से-व्यवसाय हों या प्रत्यक्ष-उपभोक्ता तक हों!