हम चाहे जितना खोजें, हमें दुनिया में कहीं और ऐसा एक-दूसरे से जुड़ा क्षेत्र नहीं मिलेगा जहां दो अरब लोग निरंतर मतदान करते हों और लोकतंत्र की कद्र करते हों। अमेरिका, अफ्रीका में ऐसा कोई इलाका नहीं है। यूरोप की तो इतनी आबादी ही नहीं है और पूर्वी एशिया में चीन की 1.4 अरब की आबादी का दबदबा है।
तो कुछ तो बात है जो भारतीय उपमहाद्वीप को अलग बनाती है। इसके सभी देशों यानी मालदीव से लेकर श्रीलंका, भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान तक हर जगह नियमित चुनाव होते हैं। यकीनन लोकतंत्र का स्तर अलग-अलग है। मसलन पाकिस्तान के लोकतंत्र को सबसे कमजोर माना जा सकता है हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि भारत का लोकतंत्र हर तरह से परिपूर्ण है।
लोकतंत्रों को रेटिंग देना जोखिम भरा है। मैं केवल एक साधारण मानक का इस्तेमाल कर रहा हूं कि कहां सबसे शांतिपूर्ण, स्थिर, सामान्य राजनीतिक बदलाव निरंतरता के साथ हुए। भारत इस आकलन में अव्वल है। यहां केवल आपातकाल के चलते एक बार चुनावों में एक वर्ष की देरी हुई।
पाकिस्तान को हम सबसे नीचे आंकते हैं क्योंकि उस देश के बनने के 25 साल बाद चुनाव हुए। उसके बाद भी वहां किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। वहां की सेना का दखल हमेशा रहा और उसने अपनी एक अलग व्यवस्था कायम की। वहां जनरल परवेज मुशर्रफ की तरह कई बार लंबी अवधि की सैन्य सत्ता भी रही। इसके बावजूद लोग मतदान करते हैं।
दूसरी जगहों पर नजर डालें तो भूटान जैसे छोटे से हिमालयी राजतंत्र वाले देश में भी राजा इतना दूरदर्शी रहा है कि उसने नियमित चुनाव करवाए और अधिकांश अधिकार प्रधानमंत्री और चुनी हुई सरकार को सौंप दिए। बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव सभी में चुनाव होते हैं और उनके यहां शांतिपूर्ण और निरंतरता वाली व्यवस्था कायम है। इनमें से किसी भी देश में सेना का वैसा खौफ नहीं दिखा। यहां तक कि बांग्लादेश में दो सैन्य तानाशाही रह चुकी हैं, लेकिन वहां भी तीन दशकों से सेना का कोई खौफ नहीं रहा। इस तरह इस उपमहाद्वीप में निवासरत पूरी दुनिया की इंसानी आबादी के चौथे हिस्से ने निर्वाचित लोकतंत्र को लेकर प्रतिबद्धता जताई है।
पाकिस्तान के अलावा हर देश में सेना बेहतरी वाली ताकत साबित हुई। उसने नए चुनावों और परिवर्तन तक ठहराव देने का प्रयास किया। यहां तक कि तब भी जब एक स्थापित सरकार को प्रदर्शनकारियों के कारण नाटकीय ढंग से हटना पड़ा।
पिछले चार वर्षों में हमने तीन पड़ोसी देशों में इस तरह के घटनाक्रम देखे हैं। श्रीलंका के महिंदा राजपक्षे पहले सत्ता से हटाए गए, फिर बांग्लादेश में शेख हसीना वाजेद, और उसके बाद नेपाल में खड्ग प्रसाद शर्मा ओली। इन तीन देशों में तख्तापलट तो हुआ लेकिन ये देश अराजकता की गिरफ्त में नहीं फंसे. वे फिर से अपने पैरों पर उठ खड़े हुए और साफ-सुथरे, शांतिपूर्ण चुनाव करवाए और लोकप्रिय नेताओं को बड़े बहुमत से सत्ता सौंप दी।
इनमें से दो, श्रीलंका और नेपाल, इस प्रक्रिया में नई राजनीतिक पार्टियों की खोज भी कर पाए। ‘व्यवस्था’ के प्रति गुस्सा था।
नेपाल सबसे नवीनतम उदाहरण है। 8 और 9 सितंबर 2025 को दो दिनों के नाटकीय घटनाक्रम में ओली सरकार गिरी और सेना की गतिविधियों को लेकर अटकल लगाई जाने लगी। लेकिन सेना ने कुछ नहीं किया। उसने केवल व्यवस्था बनाए रखी ताकि एक अंतरिम सरकार का गठन हो सके। इस प्रक्रिया का नेतृत्व पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने किया और इकलौता एजेंडा था शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करवाना।
कार्की ने छह महीने के अंदर सभी दलों को स्वतंत्र चुनाव लड़ने का मौका उपलब्ध कराया। चुनाव नतीजों ने उन सबको खारिज कर दिया जिन्होंने 2008 में राजशाही की जगह लोकतंत्र की स्थापना और एक गणतांत्रिक संविधान को लागू किए जाने के बाद नेपाल को 14 प्रधानमंत्री दिए थे। इसने माओवादी सत्ता का भी समापन कर दिया। अब वे प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने गए 165 सदस्यों वाले सदन में 10 फीसदी भी नहीं रह गए हैं और लोकतांत्रिक इतिहास के कूड़े के ढेर में समेट दिए गए हैं।
नए नेता बालेन शाह केवल 35 वर्ष के हैं। वे पहले कभी राजनीति में नहीं रहे। कर्नाटक में बेलगावी के विश्वेश्वरैया टेक्नॉलजिकल यूनिवर्सिटी यानी वीटीयू से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एमटेक कर चुके बालेन शाह एक रैपर थे जो भ्रष्टाचार, कुशासन, लोगों के पलायन और जीवन स्तर के खिलाफ लोगों के आक्रोश को आवाज देने वाले अपने गानों के बूते काफी लोकप्रिय हस्ती बन गए थे। वे जिस राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुए उसकी स्थापना पत्रकार रवि लमिछाने ने 2022 में की थी, जिसने दो तिहाई बहुमत से महज एक कम सीटें जीती है। फिलहाल तो वह विचारधारा-मुक्त दिखती है, हालांकि वह खुद को मध्यमार्गी कहती है।
बांग्लादेश में मामला अलग रहा। वहां मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार ने पूर्ण जनादेश वाली सरकार की तरह काम करना शुरू कर दिया और नीतिगत बदलाव आरंभ कर दिए। वहां के सेना प्रमुख ने यूनुस को हकीकत का एहसास कराया। वहां के चुनाव भी आदर्श से कोसों दूर रहे क्योंकि अवामी लीग के रूप में प्रमुख दल पर चुनाव लड़ने से रोक थी। हालांकि शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न हुए और तारिक रहमान को दो-तिहाई बहुमत हासिल हुआ। वहां तत्काल भारत विरोधी माहौल पर अंकुश लगा है। बातचीत बहाल हुई है और नई सरकार बांग्लादेश के भविष्य को ध्यान में रखकर काम कर रही है। अवामी लीग पर प्रतिबंध रूपी धब्बे के बावजूद बांग्लादेश का लोकतंत्र मजबूत बनकर उभरा है।
उससे पहले श्रीलंका में एक लंबी लेकिन शांतिपूर्ण प्रक्रिया रही। शुरू में जब राजपक्षे का बाकी परिवार देश छोड़कर चला गया, राष्ट्रपति के रूप में गोटाबाया ने यूएनपी (यूनाइटेड नैशनल पार्टी) के पुराने नेता राणिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया।
दो महीने बाद एक जनवादी प्रदर्शन के बीच गोटाबाया को भी हटा दिया गया और विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति बनाया गया। यह तब जबकि उनके दल के पास केवल एक सांसद था। राष्ट्रीय संसद में गुप्त मतदान के बाद उन्हें पद पर बनाए रखा गया क्योंकि उन्हें अपने संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्रीय हित को लेकर प्रतिबद्धता पर भरोसा था। नवंबर 2024 में पूरी तरह शांतिपूर्ण चुनाव हुआ जिसने प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट और जनता विमुक्ति पेरुमना (जेवीपी) के पूर्व नेता, 57 वर्षीय अनुरा कुमार दिसानायके को सत्ता सौंप दी।
कभी एक आतंकवादी संगठन मानी गई जेवीपी को हिंसक तरीके से दबा दिया गया था। लेकिन इस पार्टी ने चुनाव में सभी स्थापित दलों को किनारे लगाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया।
मालदीव में भी 2008 से शांतिपूर्ण, चुनावी सत्ता परिवर्तन होते रहे हैं, हालांकि कभी-कभी नया नेता अपने पूर्ववर्ती को जेल में डाल देता है। लेकिन हमने पहले ही कहा था कि परिपूर्ण लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं होती। शुरुआत में हमने पाकिस्तान को भी इन लोकतंत्रों में शामिल किया था और इसका कारण केवल यह है कि देश अब तक अपने सबसे लंबे निरंतर निर्वाचित सरकारों के दौर से गुजर रहा है, भले ही वे कैसी भी हों। लेकिन अपने मिश्रित राजनीतिक इतिहास में, वर्तमान व्यवस्था ने सबसे कमजोर सरकार पैदा की है और उसने सेना के साथ मिलकर संविधान को विकृत किया है।
सवाल यह है कि जब उपमहाद्वीप के अन्य सभी देशों में लोकतंत्र परिपक्व और मजबूत हुआ है, तब पाकिस्तान क्यों पिछड़ गया?
कई लोग कहते हैं कि इसका उत्तर इस बात में है कि प्रत्येक देश ने अपने राष्ट्रवाद की कल्पना कैसे की। पाकिस्तान असाधारण है क्योंकि वह अब भी दो-राष्ट्र सिद्धांत को सही साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है। यही जुनून किसी भी संस्था को, सेना को छोड़कर, नैतिक प्रतिष्ठा बनाने की अनुमति नहीं देता। यह तब होता है जब आप खुद को वैचारिक रूप से एक राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य के रूप में परिभाषित करते हैं। पाकिस्तान का संकट एक अस्तित्ववादी संकट है। यह अस्तित्ववादी संकट आज के चालू अर्थ में नहीं बल्कि दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्र वाले लगभग मूल अर्थ में है, कि आखिर मैं हूं तो क्यों हूं? और मेरा अस्तित्व कैसे कायम है? उसके और दो अरब की आबादी वाले इस उपमहाद्वीप के लोकतंत्र के स्तर का फर्क भी इसी में निहित है।