दिल्ली में जून के महीने में हुईं भीषण आग की दो घटनाओं में एक अजीब समानता है। 13 जून, 1997 को ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा हॉल अग्निकांड में 59 लोग दम घुटने से मर गए। इस सिनेमा हॉल में मुनाफे के लिए गैर-कानूनी तौर पर बदलाव किए गए थे। वहीं, 3 जून, 2026 को कुछ ही किलोमीटर दूर हौज रानी में, फ्लरिश स्टे बेड-ऐंड-ब्रेकफास्ट में 21 लोगों की मौत हो गई।
इस इमारत में सिर्फ छह कमरों की अनुमति के बावजूद 26 कमरे चल रहे थे और इसे अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र भी प्राप्त नहीं था। इन दोनों त्रासदियों के बीच 29 साल का अंतर है, फिर भी इनसे मिलने वाले सबक कहीं नजर नहीं आते। यह समानता मेरे लिए बहुत ही व्यक्तिगत है। मेरी बुआ रेखा मेहरा, और मेरे रिश्ते के भाई वेदांत मेहरा, उपहार सिनेमा हॉल में मरने वाले 59 लोगों में शामिल थे, और इस जून में यह दुख ऐसे लौट आया मानो इतने साल बीते ही न हों।
हौज रानी में मारे गए लोग शहर की छिपी हुई अर्थव्यवस्था की एक झलक थे: कामगार और ऐसे मरीज जो इलाज के लिए महाद्वीप पार करके आए थे क्योंकि उनके अपने देश में इलाज का खर्च वहन करना संभव नहीं था। मृतकों में से 11 विदेशी नागरिक थे। इसके बाद की प्रशासनिक प्रक्रिया जानी-पहचानी सी रही। एक रसोइये को हिरासत में लिया गया, मालिक को गिरफ्तार किया गया और अनधिकृत अतिथि गृहों पर कार्रवाई की घोषणा की गई। सजा देने में जो दक्षता होती है, वह रोकथाम में नहीं दिखती, जो भ्रष्टाचार से लथपथ अफसरशाही की दलदल में दबी पड़ी है।
इस आग से जुड़ा सबसे कठिन सवाल यह है कि भारत में विकास और शहरीकरण का क्या अर्थ है। हमने एक ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित कर ली है जो आईफोन से लेकर बिरयानी तक सब कुछ 10 मिनट में घर तक पहुंचा सकती है, लेकिन एक गली के जरिये दमकल गाड़ी को 20 मिनट में नहीं पहुंचा सकती।
आज हमारे शहरीकरण का अधिकांश हिस्सा अधिकतम किराये के लिए जमीन हथियाने, तय सीमा से अधिक ऊंची इमारतें बनाने और अस्पतालों का इस बात की परवाह किए बिना विस्तार करने से जुड़ा है कि वहां आने वाले मरीजों के सोने की व्यवस्था कहां होगी। सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर विकास को मापना प्रगति माना जा सकता है, लेकिन यह पूरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है।
यह सिर्फ आग लगने की घटना नहीं है, राष्ट्रीय राजधानी में बुनियादी ढांचे की विफलता एक आम समस्या है। जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के बाढ़ग्रस्त बेसमेंट में तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की डूबने से मौत हो गई, जबकि वहां पुस्तकालय होना ही नहीं चाहिए था। इसी साल फरवरी में जनकपुरी में कमल ध्यानी अपनी मोटरसाइकल लेकर जल बोर्ड के एक ऐसे 14 फुट गहरे गड्ढे में जा गिरे, जिस पर कोई निशान या चेतावनी नहीं लगी थी।
एक अनुमान के अनुसार, 2019 से राजधानी में आग लगने की घटनाओं में 500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। समाजशास्त्री चार्ल्स पेरो ने उत्पन्न आपदाओं का वर्णन करने के लिए ‘सामान्य दुर्घटनाएं’ शब्द का प्रयोग किया, जो किसी व्यक्ति की गलती के बजाय जटिल सिस्टम की वजह से होती हैं।
हमारे शहरों ने इस अवधारणा को और भी पुख्ता किया है: ये मौतें सामान्य हैं, दुर्घटनाएं नहीं। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो लिए गए, टाले गए या जिनसे पैसे कमाने की कोशिश की गई। देश में ऐसे स्थान क्यों मौजूद हैं? भारत के टियर-1 शहरों में, अनौपचारिकता शायद ही कभी नियोजन की कमी होती है, बल्कि यह स्वयं नियोजन का एक तरीका है।
ये स्थान इसलिए बनते और सहन किए जाते हैं क्योंकि ये उपयोगी हैं। हर अस्पताल, मॉल और ऑफिस टावर सस्ते कमरों और लचीले श्रम की मांग पैदा करता है, जो किसी स्वीकृत योजना में उपलब्ध नहीं होते, इसलिए अनधिकृत बस्तियां इनकी पूर्ति करती हैं। जिसे हम अवैध निर्माण कहते हैं, वह शहर द्वारा अपनी आवास समस्या को गरीबों पर थोपने जैसा है। हौज रानी के गेस्ट हाउस नियोजन की अवहेलना करते हुए नहीं बने, वे इसलिए बने क्योंकि नियोजन ने एक खालीपन छोड़ दिया और किराये ने उसे भर दिया।
किसी शहर की प्रगति का एक उचित मापदंड यह है कि वह अपने सबसे कमजोर निवासियों को कितने अच्छे विकल्प प्रदान करता है। इस मापदंड के अनुसार, एक महानगर जो किफायती आवास और सुरक्षित आवास के बीच चयन करने के लिए मजबूर करता है, वह विकसित नहीं हो रहा है, बल्कि केवल विस्तार कर रहा है। संस्थागत भ्रष्टाचार के नीचे एक ऐसी चीज छिपी है जिसके खिलाफ कानून बनाना कहीं अधिक कठिन है, एक नैतिक पतन जो रोजमर्रा के नागरिक जीवन में समा चुका है। यह नागरिकों के रूप में हमारी चुप्पी में भी झलकता है।
हममें से कुछ ही लोग यह सोचने के लिए रुकते हैं कि जिस इमारत में हम सोते हैं उसे किसने मंजूरी दी थी या उसका आपातकालीन निकास कहां जाता है। हम, भारत के नागरिक सवाल पूछना और जीवन की उस गुणवत्ता पर जोर देना भूल गए हैं जो मायने रखती है।
हमने मात्रा को ही प्राथमिकता दी है, ज्यादा मंजिलें, ज्यादा वर्ग फुट, तेज डिलिवरी, जबकि एक सुरक्षित कमरा या पैदल चलने योग्य सड़क जैसी बुनियादी गरिमा हमारी सामूहिक कल्पना से ओझल हो गई है। जो समाज बेहतर की मांग नहीं करता, उस पर निश्चित रूप से वही लोग शासन करेंगे जो उसे प्रदान नहीं करते। अंततः, यह नैतिकता का मामला है, जो हर स्तर पर खो गई है।
उपहार के पीड़ितों के परिवार, जिनमें मेरा परिवार भी शामिल है, उन्होंने अगली आगजनी को रोकने के लिए दो दशकों से अधिक समय अदालतों में बिताया। फिर भी, उसी महीने, उसी शहर में, उन लोगों के साथ आगजनी हुई जिनके पास जवाब मांगने की शक्ति और भी कम थी। हौज रानी में लगी पीली टेप कुछ ही दिनों में हट जाएगी और गली फिर से गुलजार हो जाएगी, क्योंकि जरूरत सुधार का इंतजार नहीं करती।
उन 21 मृतकों के लिए एकमात्र स्मारक एक ऐसा शहर हो सकता है जहां वे सुरक्षित होते, जहां अस्पताल के पास का कमरा पाने के लिए जान जोखिम में न डालनी पड़े, और जहां अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र किसी इमारत का विवरण हो, न कि केवल एक फाइल को सजाने के लिए। इससे कम कुछ भी हो, तो मान लीजिए कि हम मृतकों का शोक नहीं मना रहे, बल्कि अगली बार ऐसी ही घटना के लिए पूर्वाभ्यास कर रहे हैं।
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ कम्पेटिटिवनेस के अध्यक्ष हैं)