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कमियां बरकरार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 9:31 AM IST

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत को पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। मौजूदा सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक इस योजना में फरवरी 2020 में आमूलचूल बदलाव भी किया गया लेकिन अभी भी कई गड़बडिय़ां बरकरार हैं। योजना में कई ढांचागत और प्रक्रियागत कमियां हैं और कई विशिष्ट गुण होने के बावजूद ये कमियां किसानों के लिए इसकी उपयोगिता को प्रभावित करती हैं। इसकी विशिष्टताओं में सबसे प्रमुख है जोखिम का व्यापक कवरेज। फसल बुआई के पहले से लेकर फसल कटने के बाद उपज के नुकसान तक की कवरेज रबी के लिए कुल बीमित राशि के 1.5 फीसदी प्रीमियम पर तथा खरीफ की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम पर की जाती है। प्रीमियम की शेष राशि का भार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में वहन किया जाता है। दुनिया में दूसरी कोई ऐसी फसल बीमा योजना नहीं है जो इस मामले में पीएमएफबीवाई का मुकाबला कर सके। इस योजना को किसान कल्याण की अनिवार्य योजना के रूप में पीएम-किसान (इस योजना में हर भूधारक को तीन किस्तों में 6,000 रुपये मिलते हैं) के समकक्ष बताने के बावजूद किसान इसे लेकर आकर्षित नहीं हुए।
बहरहाल इन चिंताओं में भी काफी दम है कि पीएमएफबीवाई योजना के तहत मिलने वाला हर्जाना आमतौर पर बहुत कम होता है और बहुत देर से मिलता है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि राज्य योजना को चलाने के क्रम में अपने दायित्व पूरे करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। वे अक्सर प्रीमियम सब्सिडी में अपना हिस्सा काफी देरी से और किस्तों में जारी करते हैं। इससे बीमा कंपनियों को किसानों को समय पर भुगतान करने में दिक्कत होती है। फसल कटाई प्रयोग के जरिये उत्पादन नुकसान के आंकड़े तैयार करना और रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजिंग तकनीक के जरिये किया जाने वाला प्रमाणन भी राज्य का दायित्व है और इसमें भी असंगत तरीके से देरी होती है। इससे दावे निपटाने में दिक्कत आती है। बीमा कंपनियों को पीएमएफबीवाई के बदले हुए स्वरूप के तहत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित आकलन के आधार पर दावों के निपटान की इजाजत है लेकिन यह व्यापक तौर पर अमल में नहीं लाया जा रहा है। इसके अलावा किसानों को 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनियों को नुकसान की जानकारी देनी होती है। आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के बाद यही वह समय होता है जब किसानों को अपने खेतों में समय बिताना होता है ताकि वे फसल बचाने के लिए हरसंभव कदम उठा सकें। इसके अलावा किसानों को हर वर्ष अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग बीमा कंपनी से निपटना होता है। इससे बीमाकर्ताओं और उनके ग्राहकों के बीच ताल्लुकात नहीं बन पाते बल्कि एक तरह का अविश्वास उत्पन्न होता है जो बीमा कंपनियों के लिए नुकसानदेह होता है।
प्रथम दृष्ट्या ये बहुत छोटी बातें प्रतीत होती हैं लेकिन ये बीमा कंपनियों और किसानों दोनों के कामकाज में असहजता की वजह बनती हैं। कई कंपनियां जिन्होंने पहले भारी सरकारी सब्सिडी से आकर्षित होकर इस योजना के क्रियान्वयन में भागीदारी का विकल्प चुना था वे अब इससे दूरी बना चुकी हैं। इन मसलों को हल करना आवश्यक है ताकि इस योजना को किसानों के लिए एक ऐसी आकर्षक योजना के रूप में पेश किया जा सके जो सक्षम और किफायती ढंग से उनके जोखिम का संरक्षण करती है। इस हकीकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारकों के कारण जहां भारतीय कृषि धीरे-धीरे संकटपूर्ण होती जा रही है, वहीं जोत का आकार घटने के साथ किसानों की जोखिम उठाने की क्षमता भी कम हो रही है। ऐसे में सही मायनों में किसानों के अनुरूप पीएमएफबीवाई उनके लिए वरदान साबित होगी।

First Published : January 20, 2021 | 8:46 PM IST