पिछले कुछ वर्षों से उपभोक्ता सामान की बड़ी कंपनियां ग्राहकों को सीधे (डी2सी), खासकर ऑनलाइन माध्यम से सामान बेचने वाले सफल ब्रांडों को खरीद रही हैं या उनमें निवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, पिछले साल हिंदुस्तान यूनिलीवर ने लगभग 3,000 करोड़ रुपये में स्किनकेयर ब्रांड मिनिमलिस्ट का अधिग्रहण किया, स्वदेशी फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स कंपनी मैरिको ने पुरुषों के ग्रूमिंग ब्रांड बियर्डो और हर्बल ब्यूटी लाइन जस्ट हर्ब्स का अधिग्रहण किया, कोलकाता की इमामी ने द मैन कंपनी में हिस्सेदारी ली और सिगरेट से लेकर आटे तक का कारोबार करने वाली आईटीसी ने मां और बच्चे की देखभाल के ब्रांड मदर स्पर्श और मायलो में रणनीतिक हिस्सेदारी हासिल की। इसी तरह पिछले दिनों विप्रो कंज्यूमर केयर ऐंड लाइटिंग ने प्रीमियम फार्मेसी स्किनकेयर डी2सी ब्रांड डर्माटच का अधिग्रहण किया।
ऑनलाइन खरीदारी करने वाले ग्राहकों की बहुत बड़ी संख्या (अनुमान के अनुसार 15 करोड़ से 25 करोड़) होने के कारण, खाद्य एवं पेय पदार्थ, परिधान एवं फैशन, सौंदर्य एवं व्यक्तिगत देखभाल, घरेलू एवं जीवनशैली और छोटे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स एवं टिकाऊ वस्तुओं सहित विभिन्न श्रेणियों में 11,000 से अधिक डी2सी ब्रांड कारोबार में हैं। डी2सी बाजार का आकार लगभग 1 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
एचयूएल, आईटीसी या मैरिको जैसी बड़ी उपभोक्ता कंपनियों द्वारा इन ब्रांडों में नियंत्रक या रणनीतिक हिस्सेदारी खरीदने का तर्क स्पष्ट है-उन क्षेत्रों में विस्तार करना जहां मौजूदा उत्पाद मुख्य रूप से ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस या क्विक कॉमर्स साइटों पर ऑनलाइन खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा नहीं करते हैं। डी2सी ब्रांडों के लिए भी, एक मजबूत और स्थापित कंपनी के साथ साझेदारी करना लाभकारी होता है, जिससे उन्हें पारंपरिक, ऑफलाइन बाजारों में अपने ब्रांडों का विस्तार करने में मदद मिलती है।
लेकिन न्यूयॉर्क की 20 अरब डॉलर वाली कंपनी कोलगेट-पामोलिव ने पिछले दिनों जो घोषणा की, वह कॉरपोरेट-स्टार्टअप गठबंधन की दुनिया में अनोखी थी। वर्ष 2018 में अमेरिकी कंपनी की इस भारतीय शाखा ने डी2सी ब्रांड बॉम्बे शेविंग में 14 फीसदी की अल्प हिस्सेदारी खरीदी थी।
हाल ही में उसने घोषणा की कि वह अपने मुख्य पामोलिव पर्सनल केयर ब्रांड के डी2सी और ई-कॉमर्स कारोबार को बॉम्बे शेविंग कंपनी (बीएससी) को सौंप रही है। इस नए समझौते के तहत, बीएससी पामोलिव के सभी डी2सी और ई-कॉमर्स विज्ञापन और ग्राहक संबंधों को संभालेगी, जबकि कोलगेट-पामोलिव इंडिया (सीपीआई) सामान्य और आधुनिक खुदरा क्षेत्र में ब्रांड का प्रबंधन करेगी।
रिपोर्टों के अनुसार, डी2सी मार्केटिंग की बारीकियों में एक बड़ी उपभोक्ता कंपनी की अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए, कोलगेट-पामोलिव की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी प्रभा नरसिम्हन ने कहा, ‘हमने इसे स्वयं आजमाया था, और ईमानदारी से कहूं तो, मुझे नहीं लगता कि हम इसमें सर्वश्रेष्ठ हैं।’
यह कहना गलत नहीं होगा कि उपभोक्ता व्यवसायों में आउटसोर्सिंग कोई नई बात नहीं है। नाइकी और ऐपल ने एक भी कारखाना स्थापित किए बिना अपने-अपने बाजारों और श्रेणियों में दबदबा कायम किया है। उन्होंने अपने व्यवसाय के मूल तत्त्वों-अनुसंधान एवं विकास, डिजाइन और ब्रांड प्रबंधन-पर ध्यान केंद्रित किया और विनिर्माण कार्य को विश्व भर के साझेदारों को आउटसोर्स कर दिया।
इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट टूर्नामेंट के शुरुआती वर्षों में, माइक्रोमैक्स, कार्बन और इंटेक्स जैसे कई ब्रांडों ने अपना पूरा विनिर्माण कार्य विदेशी साझेदारों, मुख्य रूप से चीन को आउटसोर्स कर दिया और आईपीएल की विज्ञापन पहुंच का लाभ उठाकर और खुदरा चैनलों का प्रबंधन करके अपने ब्रांड और व्यवसाय को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित किया।
अधिग्रहण-भर्ती काफी आम हो गई है, जिसमें कंपनियां दूसरी कंपनियों को उनके ब्रांड या उत्पाद के लिए नहीं बल्कि अपनी खुद की कंपनी चलाने को प्रतिभा हासिल करने के लिए खरीदती हैं। गूगल के डीपमाइंड और कैरेक्टर डॉट एआई के अधिग्रहण से लेकर देश में फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा द्वारा क्रेडिट कार्ड प्रबंधन फर्म क्रेड में रणनीतिक हिस्सेदारी लेने और उसके संस्थापक कुणाल शाह को व्हाट्सऐप में अपने प्रमुख व्यवसायों में से एक का वैश्विक प्रमुख बनाने तक के उदाहरण भी मौजूद हैं।
कोलगेट-पामोलिव और बॉम्बे शेविंग के बीच हुए समझौते की अनूठी बात यह है कि इसमें एक बड़ी कंपनी के मुख्य ब्रांड के सबसे तेजी से बढ़ते चैनलों-डी2सी और ई-कॉमर्स-में एक महत्त्वपूर्ण विपणन कार्य को एक ऐसे साझेदार द्वारा वस्तुतः अपने हाथ में ले लिया गया है जिसमें इसमें महारत है। कोलगेट-पामोलिव-बॉम्बे शेविंग समझौते की घोषणा पिछले पखवाड़े ही हुई थी और हमें देखना होगा कि इसके तहत पामोलिव कैसा प्रदर्शन करता है, लेकिन व्यापार जगत के लिए इसमें एक नया विचार छिपा हो सकता है।
जिस तरह ऐपल की आउटसोर्सिंग ने ताइवान की फॉक्सकॉन से लेकर भारत की टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स तक, वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर के कारोबार को जन्म देने में मदद की,यदि कोलगेट-पामोलिव की तरह और भी बड़ी कंपनियां अपने मुख्य कार्यों पर पुनर्विचार या पुनर्परिभाषित करने का विकल्प चुनती हैं, तो क्या यहां भी एक बड़ा अवसर हो सकता है?
कोलगेट-पामोलिव और बॉम्बे शेविंग के बीच हुए व्यापारिक समझौते की रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं है, और शायद यह अवसर विनिर्माण को आउटसोर्स करने जितना बड़ा न हो, फिर भी इस सौदे से कॉरपोरेट जगत में शीर्ष पर सिहरन जरूर दौड़ गई होगी।
खासकर जिस साहस के साथ एक प्रमुख परिचालन को अलग करके एक ऐसी बाहरी संस्था को सौंप दिया गया, जिसके पास ऐसी विशेषज्ञता और सोच थी जिसे कंपनी के भीतर अपर्याप्त और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, अविकसित माना जाता था। आज यह कोलगेट-पामोलिव के एक ब्रांड की बात है, और यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो कल भारत की कंपनियों के लिए सैकड़ों ब्रांड हो सकते हैं। बल्कि, विश्व की कंपनियों के लिए लाखों ब्रांड हो सकते हैं!