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ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयला से गैस बनाना भारत की नई राष्ट्रीय प्राथमिकता

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भारत अब कोयले को सिर्फ जलाने के बजाय गैसीकरण तकनीक के जरिए उर्वरक, स्टील और स्वच्छ ईंधन में बदलकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है

Last Updated- May 19, 2026 | 9:40 PM IST
Coal
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

दशकों तक भारत में कोयले की एक ही भूमिका रही कि इसे जलाकर बिजली बनाई जाए। आज वही कोयला उर्वरक, इस्पात के कच्चे माल, परिवहन ईंधन और हाइड्रोजन में बदल सकता है। इसे अब सिर्फ ऊर्जा स्रोत के रूप में नहीं बल्कि एक रणनीतिक औद्योगिक कच्चे माल के रूप में देखा जा रहा है। यह बदलाव कोयले से गैस बनाने के कारण ही संभव हुआ है और यह प्रक्रिया अब केवल प्रयोगात्मक नहीं रही बल्कि यह राष्ट्रीय प्राथमिकता भी बनती जा रही है।

गैस बनाने की मूल प्रक्रिया रासायनिक है न कि उष्मीय। इसमें कोयले को 700-1,500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में गर्म किया जाता है, जिससे सिंथेसिस गैस बनती है जो हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड का मिश्रण होती है। यही मध्यवर्ती उत्पाद एक पूरी मूल्य श्रृंखला को तैयार करता है जैसे कि अमोनिया, यूरिया, मेथनॉल, सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल कच्चे माल। किसी सीमित संसाधन वाली अर्थव्यवस्था में यह सिर्फ तकनीक में विविधता नहीं बल्कि मूल्य को उच्चतम सीमा तक ले जाने का माध्यम भी है।

भारत के हाल के कदम स्पष्ट संकेत देते हैं कि अब हिचकिचाहट नहीं बल्कि ठोस इरादा है। भूमिगत कोयले से गैस बनाने का प्रायोगिक परीक्षण झारखंड में चल रहा है, जिसमें कोयले का खनन किए बिना ही उसे रूपांतरित किया जाता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) ने भारत के अधिक राख वाले कोयले के लिए उपयुक्त देसी गैस बनाने वाली तकनीक विकसित की है, जिससे अधिक मूल्य वाले मेथनॉल का उत्पादन संभव हो। साथ ही, निजी क्षेत्र भी अब इस क्षेत्र में पूरी गंभीरता से शामिल हो रहा है।

 भारत ने वित्त वर्ष 2025 में 104.7 करोड़ टन से अधिक कोयला उत्पादन किया। देश के पास लगभग 199 अरब टन प्रमाणित भंडार और 401 अरब टन कुल भूवैज्ञानिक भंडार हैं जो वैश्विक स्तर पर इसे विश्व के सबसे बड़े कोयला संपन्न देशों में से एक बनाते हैं। फिर भी, लगभग 80 फीसदी कोयला अब भी बिजली के लिए जलाया जा रहा है। यह हमारे प्राकृतिक संसाधन का क्षमता से कम उपयोग है। आयात पर अधिक निर्भरता की वजह से आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। हर भू-राजनीतिक संकट, चाहे वह होर्मुज स्ट्रेट हो या टैरिफ नीतियां, सीधे महंगाई में बदल जाता है। इस तरह की परिस्थितियों के बीच कोयला से गैस बनाना वास्तव में एक घरेलू रणनीतिक सुरक्षा उपाय करना है।

अनुमान हैं कि यदि गैस बनाने की योजना का पैमाना बढ़ाया जाए तब यह आयात में सालाना 15 अरब डॉलर की बचत कर सकता है और घरेलू उर्वरक व रासायनिक उत्पादन के माध्यम से 60,000 से 90,000 करोड़ रुपये की बचत संभव है। यह सिर्फ ऊर्जा बदलाव ही नहीं बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था में स्थिरता का भी साधन है। नीति और निवेश की गति भी इस बदलाव को दर्शाती है। करीब 8,500 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर से जुड़ी फंडिंग योजना (2024) वर्ष 2030 तक 10 करोड़ टन गैस बनाने की क्षमता के लक्ष्य से जुड़ा है जिसमें 4,050 करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र के लिए और 4,450 करोड़ रुपये निजी खिलाड़ियों के लिए हैं।

बुधवार को मंत्रिमंडल ने 37,500 करोड़ रुपये की एकीकृत प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी, जिसमें हरेक परियोजना के लिए अधिकतम समर्थन 3,000 करोड़ रुपये है जिसका लक्ष्य तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) यूरिया, अमोनिया, मेथनॉल और डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन में आत्मनिर्भरता है। इसके साथ ही 50,000 करोड़ रुपये की योजना भी प्रस्तावित है ताकि 20,000 मेगावॉट की निष्क्रिय गैस आधारित क्षमता को फिर से उभारा जा सके। महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में पहले से ही 64,000 करोड़ रुपये की सात बड़ी गैस बनाने वाली परियोजनाएं चल रही हैं।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2026 और 2030 के बीच 15-20 बड़े कॉम्प्लेक्स की आवश्यकता होगी ताकि 10 करोड़ टन का लक्ष्य हासिल किया जा सके। परियोजना पाइपलाइन वास्तव में एक ठोस पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाती है जिसमें नीति, तकनीक, पूंजी और क्रियान्वयन एक साथ आ रहे हैं।

इसके तहत प्रमुख गतिविधियां कुछ इस तरह की हैं-मसलन कोल इंडिया लिमिटेड और बीएचईएल का संयुक्त उद्यम (11,782 करोड़ रुपये की लागत वाला) ओडिशा के लखनपुर में, कोल इंडिया और गेल (इंडिया) का पश्चिम बंगाल के सोनपुर बाजारी में संयुक्त उद्यम (13,052 करोड़ रुपये), दुर्गापुर स्टील संयंत्र में सीआईएल-स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड का संयुक्त उद्यम जो वित्त वर्ष 2029 में शुरू होने वाला है। इसके अलावा ओडिशा में 13,000 करोड़ रुपये की तलचर उर्वरक परियोजना जो भारत की पहली कोयले से गैस पर आधारित यूरिया परियोजना है जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 12.7 लाख टन है।

यह गेल, कोल इंडिया, राष्ट्रीय केमिकल्स ऐंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड और फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड का संयुक्त उद्यम है और इसका उद्घाटन सितंबर 2018 में प्रधानमंत्री ने किया था।

निजी क्षेत्र की पहल भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं जैसे जिंदल स्टील का अंगुल संयंत्र काम कर रहा है जो दुनिया के सबसे बड़े सिंथेसिस गैस आधारित इस्पात संयंत्रों में से एक है। इसके अलावा महाराष्ट्र के रायगढ़ में नई परियोजनाएं शुरू हो रही हैं। न्यू एरा क्लीनटेक का 2.5 अरब डॉलर का कोयले से एथनॉल बनाने की प्रक्रिया में निवेश और एनएलसी इंडिया की लिग्नाइट से मेथनॉल बनाने वाली परियोजना इस पारिस्थितिकी तंत्र में और भी विस्तार कर रही हैं। हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि इंजीनियरिंग और क्रियान्वयन क्षमता भी गहराई से बढ़ रही है।

कुल परियोजना पाइपलाइन अब 85,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। मौजूदा समय को पांच अनुकूल परिस्थितियां विशेष बनाती हैं, जैसे कि घरेलू कोयले की प्रचुर आपूर्ति, भारत के अनुकूल तकनीक, मजबूत नीति समर्थन, बढ़ती निजी भागीदारी और ऐसा भू-राजनीतिक माहौल जो आयात पर निर्भरता को हतोत्साहित करता है। इसके आर्थिक तर्क भी मजबूत हैं। घरेलू कोयले से मिली सिंथेसिस गैस आयातित एलएनजी का विकल्प बन सकती है, किसानों को घर में तैयार यूरिया उपलब्ध करा सकती है, इस्पात क्षेत्र में कोकिंग कोल के आयात को कम कर सकती है और हाइड्रोजन पर आधारित अर्थव्यवस्था में बदलाव के लिए सेतु का काम कर सकती है। लेकिन यहीं सावधानी की आवश्यकता भी है।

गैस बनाने की परियोजनाओं में काफी पूंजी की दरकार होती है, ये तकनीकी रूप से जटिल और वैश्विक मूल्य चक्रों के प्रति संवेदनशील होती हैं। भारत इससे पहले भी इस चुनौती का सामना कर चुका है। जब पहले तेल की कीमतें कम थीं तब गैस बनाने में दिलचस्पी कम हो जाती थी। हालांकि चीन ने इसे बरकरार रखा। दोनों देशों ने एक साथ इस पर पहल की। हालांकि इसके विपरीत, चीन ने इसे रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में अपनाया और धैर्यपूर्वक पूंजी निवेश किया। आज चीन सालाना 8 करोड़ टन से अधिक गैस बनाता है और यह कोयले से मिले सिंथेसिस गैस के माध्यम से वैश्विक मेथनॉल और अमोनिया उत्पादन में प्रमुख है। भारत का उत्पादन इस पैमाने का केवल 3 से 5 फीसदी है।

भारत अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। कोयले पर बहस अक्सर इसे जारी रखने और बदलाव के बीच सीमित हो जाती है। गैस बनाने की प्रक्रिया इसे पूरी तरह से नया रूप देता है। कोयले को जलाने के बजाय उसका सही इस्तेमाल किया जाए, तो यह सिर्फ ईंधन नहीं बल्कि काम का कच्चा माल बन सकता है, बड़े अवसर तैयार कर सकता है और स्वच्छ ऊर्जा में भी तब्दील हो सकता है और हमारे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक नीति और आर्थिक एवं पर्यावरणीय लचीलेपन को फिर से परिभाषित कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि यह बदलाव दशकों तक क्यों रुका रहा।

(लेखक बुनियादी ढांचे के विशेषज्ञ हैं और इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक तथा प्रबंध न्यासी हैं। शोध में डॉ. मुतुम चाओबिसाना का भी योगदान है)  

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First Published - May 19, 2026 | 9:33 PM IST

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