देश के नीति निर्माता एक साथ कई लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बहुत हद तक बाजारों में हस्तक्षेप करने पर निर्भर रहे हैं। फिलहाल वे रुपये पर नकारात्मक धारणा को पलटना चाहते हैं। इसी बीच मुद्रास्फीति एवं वृद्धि को ईंधन की ऊंची कीमत तथा प्रतिकूल मौसम के असर से बचाने के लिए राजकोषीय नीति का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि सरकार की उधारी बढ़ती जा रही है। साथ ही वे चाहते हैं कि आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए ब्याज दरें भी कम ही रहें।
यह सब एक साथ करना चुनौतीपूर्ण है। विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) यानी एफसीएनआर (बी) जमा और विदेशी मुद्रा उधारी आकर्षित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की सब्सिडी वाली अदला-बदली (स्वैप) व्यवस्था और विदेशी मुद्रा में उधारी वह कीमत है, जो बाजार हस्तक्षेप के जरिये कई मकसद साधने के लिए चुकानी पड़ती है। वास्तव में इसके बजाय विकृतियां कम करने और बाजारों को अधिक स्वतंत्र करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
ज्यादा हस्तक्षेप की कीमत चुकानी पड़ती है। 2025 में उपभोक्ता मुद्रास्फीति दर औसतन 2 प्रतिशत थी और रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रीपो दर 125 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत कर दी। साथ ही जनवरी 2025 से मार्च 2026 के बीच रिजर्व बैंक ने बॉन्ड बाजारों से करीब 11.6 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की शुद्ध खरीद की, जो रिकॉर्ड है। बताया यही गया कि इसका उद्देश्य बैंकिंग में नकदी डालना, मौद्रिक नीति का लाभ नीचे तक पहुंचाना और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देना।
इस बीच वित्त वर्ष 26 में केंद्र और राज्य सरकार का कुल उधार रिकॉर्ड 27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। रिजर्व बैंक की भारी बॉन्ड खरीद का पैसा परोक्ष रूप से सरकारी उधारी में गया और यील्ड कम रखने में भी मदद मिली। नीति निर्माता अक्सर ब्याज दरों, पूंजी प्रवाह और विनिमय दरों को अलग-अलग मानते हैं, लेकिन बाजार ऐसा नहीं करते। एक बाजार में दखल दिया जाए तो दूसरों पर भी असर पड़ता है।
कम ब्याज दरों और 2023 में डेट फंड कराधान में बदलाव से बचतकर्ताओं का कर चुकाने के बाद स्थिर आय रिटर्न और घट गया। ज्यादातर सरकारी बॉन्ड बैंक, बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों के पास रहते हैं और उन पर दर का ज्यादा असर नहीं पड़ता मगर टिकाऊ ऋण वृद्धि के लिए जरूरी है कि स्थिर आय बाजारों को विवेकाधीन बचत का सहारा मिले। उस समय की दरों पर यह सहारा स्वैच्छिक बचत के बजाय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से मिल रहा था।
परिणामस्वरूप विवेकाधीन धन संभवतः ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ओडीआई) के माध्यम से विदेश चला गया, आयात में लग गया और शेयरों में पहुंच गया। समय के साथ लगातार बड़े देसी प्रवाह से शेयरों का मूल्यांकन ऊंचा रहा और विदेशी निवेशकों का भारतीय शेयरों में आकर्षण कम हो गया।
विदेशी पूंजी का शुद्ध प्रवाह घटा तो चालू खाते के मामूली घाटे की भरपाई भी चुनौती बन गई। रुपये और डॉलर में ब्याज दर का अंतर भी सबसे निचले स्तर पर आ गया, जिससे हेजर्स और सट्टेबाजों के लिए रुपये के बदले अग्रिम डॉलर खरीदना सस्ता हो गया। वित्त वर्ष 25 और वित्त वर्ष 26 के दौरान डॉलर की हेजिंग और सट्टा मांग 117 अरब डॉलर रहने का अनुमान था, जो चालू खाते के घाटे और शुद्ध निवेश से बाहर गए 75 अरब डॉलर से अधिक रहा।
इससे मुद्रा बाजार में रिजर्व बैंक के तगड़े हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की कमजोरी का सिलसिला चल पड़ा। रुपया दुनिया में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया, जिससे विनिमय दर को साधना ज्यादा जरूरी नीतिगत उद्देश्य बन गया। हाल ही में ऊर्जा की ऊंची कीमतों ने बाहरी तथा राजकोषीय संतुलन की संभावना खराब कर दी और अल नीनो की आशंका ने मुद्रास्फीति एवं ग्रामीण मांग के लिए जोखिम बढ़ा दिया है।
रिजर्व बैंक का स्वैप पैकेज इन हस्तक्षेपों की ही कीमत है। यदि इस योजना से बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को 50 अरब डॉलर की एफसीएनआर (बी) जमा तथा 20 अरब डॉलर की विदेशी उधारी मिल जाती है तो वर्तमान बाजार मूल्य पर रिजर्व बैंक की स्वैप पोजिशन पर 64,000 करोड़ रुपये तक मार्क टु मार्केट नुकसान हो सकता है। साथ ही रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट का जोखिम भी बढ़ेगा। यह अकाउंटिंग से जुड़ी कीमत ही नहीं है। सब्सिडी असली है और इसमें भाग लेने वाले अनिवासी भारतीय (एनआरआई), बैंक और उधारी लेने वाले इसे भुनाएंगे।
भारत के बड़े बैंक पांच वर्ष के लिए डॉलर में एफसीएनआर (बी) डॉलर जमा पर लगभग 6 प्रतिशत ब्याज दे रहे हैं। विदेशी बैंक इन्हीं जमाओं पर लगभग 5 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज देने को तैयार हैं। इसका इस्तेमाल कर संपन्न एनआरआई डॉलर में दो अंकों का प्रतिफल अर्जित कर सकते हैं।
भारतीय बैंक इन एफसीएनआर(बी) जमाओं को लगभग 6.4 प्रतिशत पर पांच वर्ष के लिए रुपये में बिना विनिमय दर जोखिम वाले वित्तीय संसाधनों में भी बदल सकते हैं। अगर परिस्थितियां अनुकूल न रहीं तो कई तरह के हस्तक्षेपों से नीति निर्माता एक के बाद दूसरी समस्या में उलझे रहेंगे। सोचिए, आगे क्या हो सकता है।
रिजर्व बैंक की सब्सिडी स्वैप विंडो से लगभग 6.6 लाख करोड़ रुपये की राशि जमा हो सकती है। विदेशी बॉन्ड निवेशकों के लिए हालिया कर बदलावों के बाद भारत के ब्लूमबर्ग एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने से और भी विदेशी रकम आ सकती है। अधिक सावधि जमा से कम ब्याज दर ज्यादा कर्ज दिया जा सकता है, जिससे और धन उत्पन्न होगा।
किंतु पुरानी समस्या फिर आ सकती है। स्थिर आय निवश पर कर चुकाने के बाद मिलने वाला रिटर्न विवेकाधीन बचत के लिए अनाकर्षक है और रुपया-डॉलर दर का अंतर कम बना हुआ है। ऐसे में कुछ धन फिर विदेश जा सकता है, आयात में लग सकता है या शेयरों में ज्यादा जा सकता है, जिससे बाहरी संतुलन और वित्तीय बाजारों पर दबाव बना रहेगा।
ऐसे में टिकाऊ समाधान क्या है? पहला, नीति-निर्माताओं को बचतकर्ताओं के लिए कर-पश्चात रिटर्न बढ़ाना होगा ताकि उनके हस्तक्षेप के बजाय बाजार ही ब्याज दर बनाए रखें। ब्याज दर बढ़ाए बगैर ऐसा करने का सीधा रास्ता स्थिर-आय पर कर बोझ कम करना ही है। इससे ज्याद रकम ओडीआई, आयात और शेयरों में नहीं जाएगी।
ऐसा करने पर ज्यादा राजकोषीय बोझ नहीं पड़ेगा। कर की दरों से प्रभावित होने वाले डेट फंड, एफडी और बॉन्ड में पहले ही कम विवेकाधीन बचत जा रही है। वास्तव में स्थिर-आय बचत को बढ़ावा देने पर होने वाला राजस्व का नुकसान एफसीएनआर (बी) स्वैप योजना में चुकाई जा रही कीमत के बराबर ही है। दूसरे नजरिये से देखें तो विदेशी बचत आकर्षित करने के लिए समय-समय पर बड़ी सब्सिडी देने के बजाय हम देसी स्थिर आय बचत को बढ़ावा देकर विकृतियां खत्म कर सकते हैं।
इसके बाद नीति-निर्माता ब्याज दरों और विनिमय दरों को भारी हस्तक्षेप के बजाय अधिक स्वतंत्र बाजार से तय होने दे सकते हैं। तब भारत का अविकसित स्थिर-आय बाजार गहरा होगा और शेयर बाजार कर के बजाय मूल्यांकन और जोखिम के हिसाब से चलेंगे।
(लेखक सेबी के पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)