बिहार में पांचवीं कक्षा तक चलने वाला एक स्कूल केवल दो कमरों में चल रहा है। उत्तराखंड के एक स्कूल में छत ही नहीं है, जिससे बारिश के मौसम में पूरा स्कूल परिसर गीला हो जाता है। हरियाणा के एक स्कूल में सभी दरवाजे टूटे हुए हैं, यहां तक कि शौचालयों के दरवाजे भी खराब हैं। वहीं, राजस्थान के एक स्कूल में पानी की गुणवत्ता इतनी खराब है कि स्कूल के अधिकारी भी उसे पीने से बचते हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं उन जांचों के, जो कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्यों और स्वयंसेवकों ने 15 अगस्त से शुरू किए गए ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत केवल एक सप्ताह के दौरान की हैं। यह सीजेपी का दूसरा बड़ा जन अभियान है। इससे पहले पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर से छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया था।
सीजेपी ने अपने आगामी कार्यक्रमों की घोषणा या योजना बनाने से पहले ही आज की स्कूल जाने वाली पीढ़ी यानी जेन अल्फा ने अपने स्कूलों में बुनियादी ढांचे, साफ-सफाई और शिक्षकों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया था। सीजेपी की कानून मामलों की प्रमुख और प्रवक्ता रत्ना सिंह कहती हैं, ‘हमें अगले अभियान का कुछ अंदाजा था, क्योंकि जंतर-मंतर पर आए छात्रों और अभिभावकों ने सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के प्राथमिक स्कूलों से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया था।’ लेकिन वास्तव में जेन अल्फा के विरोध प्रदर्शनों की लहर ने सीजेपी को यह समझने में मदद की कि प्राथमिक शिक्षा को लेकर लोगों में असंतोष कितना गहरा है?
उन्होंने कहा, ‘छात्र बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे और उन्होंने इसके लिए किसी नेता के आगे आने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने खुद वीडियो बनाए और उन्हें ऑनलाइन साझा किया। इसी से हमें स्वयंसेवकों के जरिए स्कूलों का ऑडिट करने वाले अभियान की योजना बनाने का विचार मिला।’
रत्ना सिंह के अनुसार, जमीनी स्तर पर बच्चे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और कुछ अन्य प्रमुख सदस्यों को पहचानने लगे हैं। वह कहती हैं, ‘कई इलाकों में इंटरनेट की सीमित पहुंच होने के बावजूद बच्चों को पता है कि छात्रों के लिए एक आंदोलन हुआ था। वे उस आंदोलन से जुड़े कुछ नामों और चेहरों को पहचानते हैं।’ सीजेपी ने इस अभियान की योजना दो महीने के लिए बनाई थी, लेकिन अब इसकी अवधि को लेकर वह निश्चित नहीं है। सिंह कहती हैं, ‘अभियान को उम्मीद से कहीं ज्यादा समर्थन मिल रहा है। लोग लगातार इससे जुड़ रहे हैं, इसलिए यह अभियान कितनी दूर तक जाएगा, यह लोगों की भागीदारी पर निर्भर करेगा।’
अब कई स्कूलों का ऑडिट ऐसे लोग भी कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर सीजेपी से जुड़े हुए नहीं हैं। समूह इसे अपनी सफलता का हिस्सा मानता है। रत्ना कहती हैं, ‘हर स्कूल तक पहुंचना और फिर दोबारा जाकर उसकी स्थिति की जांच करना हमारे लिए संभव नहीं होगा। अगर लोग सीजेपी के नाम के बिना भी इसे एक दबाव समूह के रूप में कर रहे हैं, तो हम इसे अपनी जीत मानते हैं।’
प्रदर्शन शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही इंस्टाग्राम पर डाले गए एक वीडियो को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है। इंस्टाग्राम पर इन पोस्ट की एंगेजमेंट दर 600 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है। हर पोस्ट पर हजारों लाइक और री-शेयर किए जा रहे हैं। इसके अलावा स्कूल ठीक करो हैशटैग के साथ स्वतंत्र रूप से डाली गई पोस्ट भी सोशल मीडिया एल्गोरिदम में तेजी से आगे बढ़ रही हैं।