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1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों के 35 साल पूरे, क्या बदला और आगे की क्या बदलने की जरूरत है

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1991 के ऐतिहासिक बजट और आर्थिक सुधारों के 35 साल पूरे हो गए हैं। भारत ने बड़ी प्रगति की है, लेकिन विकसित राष्ट्र बनने के लिए अब बड़े सुधारों और नई नीतियों की जरूरत है

Last Updated- July 24, 2026 | 9:36 PM IST
Manmohan Singh
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह | फाइल फोटो

पैंतीस वर्ष पहले तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अपना पहला केंद्रीय बजट पेश किया था। वह स्वतंत्र भारत का शायद सर्वाधिक परिणामोन्मुखी बजट था। उसके बाद हुए आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आंतरिक और बाहरी प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया। तब से अब तक सभी सरकारों ने मोटे तौर पर आर्थिक वृद्धि के विचार को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई है। हालांकि उन्होंने ऐसा अपने-अपने तरीके से किया जिससे सुधारों की गति प्रभावित हुई।

दशकों तक लाइसेंस कोटा राज के तहत काम करने वाले देश के लिए सुधारों के प्रति गहरी राजनीतिक सहमति उम्मीद जगाती है। इसका अर्थ यह है कि परिणामों में सुधार लाने के लिए नीतियों में संशोधन किया जा सकता है। 35 वर्ष के सफर का पूरा होना हमें आगे की राह पर एक नजर डालने का अवसर देता है। 

साफ कहा जाए तो पिछले साढ़े तीन दशकों में बहुत कुछ हासिल किया गया है। आज भारत कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है। इसके कई क्षेत्र जैसे वाहन, संचार, विमानन और वित्तीय सेवाएं आदि अब पूरी तरह बदल चुके हैं। देश के पास दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजारों में से एक है।

पिछले एक दशक में लागू किए गए कुछ हालिया सुधारों ने इसकी संस्थागत संरचना को उल्लेखनीय रूप से मजबूत किया है। भारत के पास अब एक आधुनिक मौद्रिक नीति ढांचा है जो समय के साथ व्यापक आर्थिक स्थिरता को मजबूत करेगा और सतत विकास को सक्षम बनाएगा।  देश में अब एक आधुनिक दिवालियापन कानून भी है, हालांकि यह सुधार प्रक्रिया में बहुत बाद में आया और अभी भी विकसित हो रहा है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने से भारत एक एकल बाजार बन गया और यह स्पष्ट रूप से 1991 के बाद से सबसे बड़े सुधारों में से एक है। 

हालांकि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह संकेत देता है कि भारत की वृद्धि और अधिक हो सकती थी। उदाहरण के लिए, 1991 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों के अनुसार चालू डॉलर मूल्य में चीनी अर्थव्यवस्था भारतीय अर्थव्यवस्था से लगभग 1.5 गुना बड़ी थी। यह अंतर 2025 तक बढ़कर लगभग 4.6 गुना हो गया। यह सही है कि चीन ने जो कुछ किया है उसे भारत में न तो पूरी तरह दोहराया जा सकता है और न ही करना चाहिए लेकिन परिणाम फिर भी बेहतर हो सकते थे।

सरकार ने 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी तक भारत को एक विकसित देश बनाने का लक्ष्य तय किया है। विभिन्न अनुमानों से पता चलता है कि इसे हासिल करने के लिए भारत को 8 से 9 फीसदी की दर से वृद्धि करनी होगी। स्पष्ट है कि यह आसान नहीं होगा, लेकिन भारत को निश्चित रूप से इसका लक्ष्य रखना चाहिए।

कई अर्थशास्त्रियों और टिप्पणीकारों ने यह बताया है कि क्या किया जाना चाहिए और एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह है कि भारतीय राज्य कैसे काम करता है और व्यवसायों तथा नागरिकों के साथ कैसे संवाद करता है। इस मुद्दे की कई परतें हैं। फिर भी यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब भी अत्यधिक विनियमित है और अक्सर सूक्ष्म ढंग से प्रबंधित की जाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं एक डीरेगुलेशन यानी अविनियमन आयोग के बारे में बात कर चुके हैं। यद्यपि इस क्षेत्र में उच्च-स्तरीय समितियां काम कर रही हैं लेकिन शायद अब समय आ गया है कि सरकार और निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ एक औपचारिक, स्वतंत्र अविनियमन आयोग का गठन किया जाए।

इस आयोग को 12 से 18 महीने का कार्यकाल दिया जा सकता है ताकि वह सभी स्तरों पर राज्य और व्यवसायों के बीच वर्तमान संवाद की प्रकृति का अध्ययन करे और सिफारिशें प्रस्तुत करे। इसके बाद इसे लगभग एक वर्ष का समय दिया जा सकता है ताकि वह अपनी सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी करे और विभिन्न स्तरों पर सरकार को स्थिति रिपोर्ट सौंपे। इसके कामकाज के विवरण पर बहस हो सकती है लेकिन यह सुधारों की एक नई लहर का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह पर्याप्त न भी हो, तो भी एक अच्छा आरंभ होगा। 

दूसरा पहलू जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह है कि राज्य को स्वयं में कितना निवेश करना चाहिए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय अदालतों में लंबित मामलों का बोझ है। वर्तमान में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। यह न केवल जीवन की सुगमता को प्रभावित करता है बल्कि कारोबारी सुगमता को भी। निवेशकों को निश्चितता और ऐसा वातावरण चाहिए जहां अनुबंधों को आसानी से लागू किया जा सके। कानूनी उपायों में देरी अनजाने में इंस्पेक्टर राज को भी बढ़ावा देती है। 

न्याय प्रणाली का विस्तार करने के लिए समयबद्ध निवेश रणनीति यानी अधिक अदालतों की स्थापना और तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल व्यवसायों और नागरिकों, दोनों में विश्वास जगाएगा। यहां तक कि दिवालियापन कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे रहा है क्योंकि न्यायिक क्षमता सीमित है। विनियमन और न्यायिक क्षमता दोनों मुद्दों को अपेक्षाकृत जल्दी संबोधित किया जा सकता है। लेकिन अपर्याप्त निवेश उन कई क्षेत्रों में भी है जहां राज्य से शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है। 

राज्य क्षमता का निर्माण करने के लिए सरकारी वित्त प्रबंधन में बड़े पैमाने पर पुन: संयोजन की आवश्यकता होगी। अपने 1991 के बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने उच्च राजकोषीय घाटे और केंद्र सरकार के ऋण के बारे में बात की थी, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 55 फीसदी तक पहुंच गया था। वर्तमान वित्तीय वर्ष में ऋण स्तर लगभग उसी स्तर पर है।

न्यायसंगत रूप से कहा जाए तो महामारी के कारण ऋण का बोझ कुछ बढ़ा लेकिन इसे जल्दी कम करना आवश्यक है। उच्च ऋण और घाटा अधिक ब्याज भुगतान की ओर ले जाता है जो न केवल सरकारी खर्च प्राथमिकताओं को प्रभावित करता है बल्कि निजी निवेश को भी बाहर कर देता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमानों के अनुसार, 2025 में भारत का सामान्य सरकारी ऋण जीडीपी के 84 फीसदी से अधिक था। इसे तेजी से कम करने की आवश्यकता है। अधिक राजकोषीय गुंजाइश सरकार को राज्य क्षमता निर्माण में निवेश करने की अनुमति देगी। इसके लिए व्यय का पुनर्गठन और राजस्व में वृद्धि दोनों आवश्यक होंगे। राजस्व बढ़ाने का सबसे वांछनीय तरीका है वृद्धि को बढ़ावा देना।

भारत को सुधारों की एक नई लहर की आवश्यकता है। जैसा कि पिछले सप्ताह देखा भी गया सही वातावरण मिले तो हमारे निजी क्षेत्र के युवा भारतीय न केवल रॉकेट बनाकर उपग्रह प्रक्षेपित कर सकते हैं बल्कि इस प्रकार वे भारत को एक अलग स्तर पर भी ले जा सकते हैं।

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First Published - July 24, 2026 | 9:32 PM IST

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