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Business Loan Insurance क्यों है जरूरी? कहीं आपकी एक चूक परिवार और संपत्ति को संकट में न डाल दे!

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एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बिजनेस लोन के साथ इंश्योरेंस लेना कानूनी जरूरी नहीं, पर समझदारी है। यह अनहोनी की स्थिति में आपके परिवार और संपत्ति को कर्ज के बोझ से बचाता है

Last Updated- March 04, 2026 | 3:27 PM IST
Insurance Ind AS
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

किसी भी उद्योगपति-व्यापारी के लिए बिजनेस खड़ा करना एक सपने को सच करने जैसा होता है। कई बार इस सपने को पूरा करने के लिए अक्सर बैंक से मोटा ‘बिजनेस लोन’ लिया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कल बिजनेस ओनर को कुछ हो जाए, तो उस करोड़ों के कर्ज का क्या होगा? क्या बैंक परिवार के घर और निजी संपत्ति को कुर्क कर देगा? या फिर बिजनेस रातों-रात बंद हो जाएगा?

भारत में इन अनिश्चितताओं से बचने के लिए ‘बिजनेस लोन इंश्योरेंस’ एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। हालांकि, इसे लेकर अधिकतर लोगों को जानकारी का अभाव है। यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंश्योरेंस की चीफ टेक्निकल ऑफिसर आरती मुलिक और आनंद राठी इंश्योरेंस ब्रोकर्स के हेड (एम्प्लॉई बेनिफिट्स) मिलिंद तायडे ने इस विषय के हर पहलू पर विस्तार से रोशनी डाली है।

बिजनेस लोन इंश्योरेंस: एक सुरक्षा कवच या महज औपचारिकता?

बिजनेस लोन इंश्योरेंस (जिसे अक्सर लोन प्रोटेक्शन इंश्योरेंस भी कहा जाता है) को अक्सर लोग बैंक की एक जबरन थोपी गई शर्त मानते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स की नजर में यह एक अनिवार्य ‘रिस्क मैनेजमेंट टूल’ है।

आरती मुलिक के अनुसार, बिजनेस लोन के लिया गया इंश्योरेंस बेहद जरूरी है क्योंकि यह आपको अप्रत्याशित घटनाओं से बचाता है। वे कहती हैं, “मौत, विकलांगता, आग लगना या प्राकृतिक आपदाएं (AOG perils) जैसे घटनाक्रम बिजनेस के कैश फ्लो को पूरी तरह से रोक सकते हैं और आर्थिक दबाव पैदा कर सकते हैं। ऐसे में यह इंश्योरेंस सुनिश्चित करता है कि दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बावजूद बिजनेस की निरंतरता (Business Continuity) बनी रहे। यह न केवल आपके बिजनेस को बचाता है, बल्कि आपकी निजी संपत्तियों के लिए एक ‘शील्ड’ की तरह काम करता है और बाजार में आपकी साख (Credit Worthiness) को भी बढ़ाता है।”

वहीं मिलिंद तायडे कहते हैं, यह इंश्योरेंस एक तरह का “सुरक्षा कवच” है। अगर अचानक कोई बड़ा झटका लग जाए, जैसे मालिक को कुछ हो जाए या बिजनेस पर संकट आ जाए, तो सारा आर्थिक बोझ परिवार या साझेदारों पर नहीं आता। इससे बिजनेस ओनर को भी तसल्ली रहती है कि मुश्किल वक्त में लोन चुकाने की चिंता कम होगी और वे बिना डर के अपने काम और बिजनेस की तरक्की पर फोकस कर सकते हैं।

Also Read: इंश्योरेंस होगा सस्ता: एजेंटों के कमीशन ढांचे में बदलाव की सिफारिश, घट सकता है प्रीमियम का बोझ

क्या भारत में यह इंश्योरेंस लेना कानूनी रूप से जरूरी है?

अक्सर लोन लेते समय बैंक मैनेजर ग्राहकों को यह महसूस कराते हैं कि इंश्योरेंस लेना अनिवार्य है। लेकिन यहां नियमों की जानकारी होना बहुत जरूरी है।

तायडे साफ कहते हैं कि कानून के तहत बिजनेस लोन के साथ इंश्योरेंस लेना जरूरी नहीं है। बैंक या वित्तीय संस्थान आपको लोन मंजूर करने की शर्त के रूप में इंश्योरेंस खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) भी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि ग्राहकों पर ऐसी शर्त नहीं थोपी जा सकती। यानी फैसला पूरी तरह ग्राहक का है कि वह इंश्योरेंस ले, न ले या अपनी पसंद की किसी भी कंपनी से ले।

हालांकि, मुलिक का कहना है कि भले ही इसे लेने का कोई कानूनी आदेश न हो, लेकिन ज्यादातर लेंडर इसकी जोरदार सिफारिश करते हैं। उनके मुताबिक, यह इंश्योरेंस लेने से उधार लेने वाले और कर्ज देने वाले दोनों का जोखिम कम होता है और किसी अनहोनी की स्थिति में आर्थिक झटके को संभालना आसान हो जाता है।

लोन प्रोटेक्शन इंश्योरेंस बनाम की-मैन इंश्योरेंस: फर्क समझना जरूरी

ज्यादातर बिजनेस ओनर इन दोनों पॉलिसियों के बीच अंतर नहीं कर पाते, जबकि दोनों का उद्देश्य अलग-अलग है।

आरती मुलिक के अनुसार, लोन प्रोटेक्शन इंश्योरेंस आमतौर पर कर्ज लेने वाला व्यक्ति इसलिए लेता है ताकि उसके ऊपर लिया गया लोन सुरक्षित रहे। अगर बीमाधारक की मौत हो जाती है या वह गंभीर रूप से विकलांग हो जाता है, तो इंश्योरेंस कंपनी बकाया रकम सीधे बैंक को चुका देती है। आसान शब्दों में कहें तो इसका मकसद कर्ज को सुरक्षित रखना है।

वहीं, की-मैन इंश्योरेंस ऐसी पॉलिसी है जिसे कंपनी अपने किसी बेहद अहम व्यक्ति के लिए लेती है। अगर उस खास व्यक्ति को कुछ हो जाता है और उसकी वजह से बिजनेस को आर्थिक नुकसान होता है, तो इंश्योरेंस कंपनी उसकी भरपाई करती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उस व्यक्ति की कमी के बावजूद बिजनेस चलता रहे।

तायडे इसे और सरल भाषा में समझाते हैं कि लोन प्रोटेक्शन इंश्योरेंस कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी संभालता है, जबकि की-मैन इंश्योरेंस उस अहम व्यक्ति की अनुपस्थिति से होने वाले कामकाजी नुकसान की भरपाई करता है, जिसकी कमी से बिजनेस पर सीधा असर पड़ सकता है।

मौत के बाद रिकवरी का क्या होता है? क्या EMI रुक जाती है?

यह सबसे अहम और भावनात्मक सवाल है। अगर बिजनेस ओनर की मौत हो जाए, तो क्या बैंक इंसानियत के आधार पर किस्तें रोक देता है?

मिलिंद तायडे साफ कहते हैं कि ऐसा नहीं होता कि मौत के बाद बैंक खुद ही किस्तें रोक दे। आम तौर पर EMI चलती रहती है। जब तक इंश्योरेंस का क्लेम पास नहीं हो जाता या कोई पॉलिसी ठीक तरह से बैंक के नाम नहीं की जाती, तब तक बैंक अपनी वसूली जारी रखता है और किस्त भरने की जिम्मेदारी बनी रहती है।

आरती मुलिक के मुताबिक, अगर मालिक ने पहले से इंश्योरेंस ले रखा है तो उसके मौत की खबर और जरूरी कागज जमा करते ही पॉलिसी लागू हो जाती है। इसके बाद इंश्योरेंस कंपनी बकाया लोन की रकम चुका देती है या तो परिवार को या सीधे बैंक को। इससे लोन का बोझ खत्म हो जाता है और परिवार पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता।

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बैंक से बीमा लें या स्वतंत्र पॉलिसी? कहां है ज्यादा फायदा?

अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि क्या बैंक से ही इंश्योरेंस लेना सही रहता है। आरती मुलिक कहती हैं कि आप पॉलिसी सीधे किसी इंश्योरेंस कंपनी से लें या बैंक के जरिए, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। असली बात यह है कि पॉलिसी आपके पूरे लोन को ठीक से कवर करे और उसमें मौत, विकलांगता, आग या प्राकृतिक आपदा जैसे जोखिम शामिल हों।

वहीं, तायडे थोड़ा सतर्क रहने की सलाह देते हैं। उनके मुताबिक, उधार लेने वाला अपनी पसंद की पॉलिसी खुद भी चुन सकता है और उसे बैंक के नाम कर सकता है। कई बार लोग बैंक के कहने पर ऐसे निवेश वाले प्लान ले लेते हैं, जैसे ULIP, जिनमें सुरक्षा कम और रिटर्न का लालच ज्यादा दिखाया जाता है। इससे इंश्योरेंस लेने का असली मकसद ही पीछे छूट जाता है।

बिजनेस ओनर द्वारा की जाने वाली 4 बड़ी गलतियां:

दोनों एक्सपर्ट्स ने उन गलतियों पर बात की है जो अक्सर भारी पड़ती हैं:

इंश्योरेंस को सिर्फ औपचारिकता समझना: मुलिक कहती हैं कि कई लोग इंश्योरेंस को बस कागजी प्रक्रिया मान लेते हैं। वे यह नहीं देखते कि पॉलिसी में क्या-क्या कवर है, क्या बाहर है और कवर की रकम लोन के लिए पर्याप्त है या नहीं।

सिर्फ प्रीमियम पर ध्यान देना: केवल सस्ता प्रीमियम देखकर फैसला करना सही नहीं है। लोग अक्सर कम कीमत के चक्कर में कवरेज की अहम शर्तों और बारीकियों को नजरअंदाज कर देते हैं।

पॉलिसी अपडेट न करना: अगर आपने लोन की रकम बढ़ा ली है, तो इंश्योरेंस कवर भी बढ़ाना जरूरी है। कई लोग टॉप-अप लेने के बाद पॉलिसी अपडेट करना भूल जाते हैं, जिससे बाद में कमी रह सकती है।

जानकारी छुपाना: स्वास्थ्य या जोखिम से जुड़ी जानकारी छुपाना भारी पड़ सकता है। मिलिंद तायडे के मुताबिक, गलत या अधूरी जानकारी देने से क्लेम के समय परेशानी खड़ी हो सकती है।

अंत में दोनों एक्सपर्ट्स इस बात पर सहमत दिखते हैं कि बिजनेस लोन इंश्योरेंस कोई कानूनी मजबूरी नहीं है, बल्कि समझदारी से लिया गया फैसला है। यह सुनिश्चित करता है कि आपकी गैरमौजूदगी में परिवार पर कर्ज का बोझ न आए और आपका खड़ा किया हुआ बिजनेस सुरक्षित बना रहे।

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First Published - March 4, 2026 | 2:02 PM IST

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