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सड़क हादसों में मुआवजा क्यों फंस जाता है? देरी, दस्तावेज और सबूत की कमी से बिगड़ता पूरा केस

अपनी आय या चोट को बढ़ा-चढ़ाकर बताने, झूठा आरोप लगाने अथवा नोटिस को नजरअंदाज करने से मोटर दुर्घटना दावा खारिज हो सकते हैं

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संजीव सिन्हा   
Last Updated- November 30, 2025 | 9:24 PM IST

कर्नाटक उच्च न्यायालय के हाल के एक फैसले से सड़क दुर्घटना मुआवजे का एक अहम पहलू सामने आया है। आवेदन में थोड़ी भी देर हो, दस्तावेज पूरे न हों या सबूत नहीं हों तो पीड़ित को उसके मुआवजे से हाथ धोना पड़ सकता है। न्यायालय के समक्ष जो मामला आया था उसमें शिकायत 24 दिन बाद दर्ज कराई गई थी और दुर्घटना उसी वाहन से होने की बात साबित भी नहीं हो पाई थी। इसीलिए मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) ने याचिका खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले पर मुहर लगा दी।

इस फैसले से यह समझने का मौका मिलता है कि मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल कैसे काम करता है, उसकी कार्यवाही मायने क्यों रखती है और दुर्घटना के शिकार लोगों को तकनीकी चूक के कारण मुआवजा गंवाने से बचने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

कैसे काम करता है ट्रिब्यूनल

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 165 के तहत स्थापित ट्रिब्यूनल मोटर वाहन दुर्घटना से संबंधित मुआवजे के दावे निपटाता है। इनमें दुर्घटना के कारण मृत्यु, चोट या तीसरे पक्ष की संपत्ति का नुकसान शामिल है।

विवाद समाधान फर्म करंजावाला ऐंड कंपनी की पार्टनर मनमीत कौर बताती हैं, ‘दीवानी अदालतों के उलट इसमें तेजी से काम होता है और कार्यवाही भी ज्यादा पेचीदा या लंबी नहीं होती। आवेदन दाखिल होने के बाद ट्रिब्यूनल धारा 168 के तहत मामले की जांच करता है और दावे पर फैसला करता है।’

कैसे दायर करें मामला

दावा करने के लिए तय प्रारूप में आवेदन जमा करना होता है, जिसमें दुर्घटना की परिस्थिति, चोट या नुकसान का ब्योरा और मुआवजे की मांग लिखनी होती है। एक्विलॉ के पार्टनर सोमेन मोहंती कहते हैं, ‘पीड़ित, मृतक का कानूनी प्रतिनिधि, क्षतिग्रस्त संपत्ति का मालिक अथवा दावा करने वाले का अधिकृत प्रतिनिधि अर्जी डाल सकता है।’ दावा उस इलाके के मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल में दायर किया जा सकता है जहां दावेदार या प्रतिवादी रहता है या काम करता है। मोहंती बताते हैं कि दुर्घटना की तारीख से छह महीने के भीतर दावा किया जा सकता है। वह बताते हैं कि इस मियाद को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। उस पर फैसला होने तक किसी दावे को मियाद के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

कैसे तय होगा मुआवजा

ट्रिब्यूनल देखता है कि दुर्घटना का पीड़ित की जिंदगी पर कुल कितना और कैसा असर पड़ेगा। इसमें उम्र, आय और कमाने की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है। भविष्य की आय को होने वाला नुकसान पता करने के लिए कई तथ्यों का इस्तेमाल किया जाता है। बीएमआर लीगल के पार्टनर शेंकी अग्रवाल समझाते हैं, ‘ट्रिब्यूनल मेडिकल सबूत, विकलांगता प्रमाणपत्र, अस्पताल के बिल और लंबे अरसे के लिए इलाज की जरूरत जैसी बातों पर गौर करता है। यदि किसी की मौत हो गई है तो उसके आश्रितों की संख्या और उनकी आर्थिक निर्भरता देखी जाती है। दर्द, कष्ट और साथी छूटने जैसे नुकसान पर भी विचार किया जाता है। ट्रिब्यूनल को विश्वसनीय दस्तावेजों और उपयुक्त सबूतों पर निर्भर रहना चाहिए।’

जहां पीड़ित का भी थोड़ा बहुत दोष पाया जाता है वहां उसकी गलती के हिसाब से ही मुआवजा कम कर दिया जाता है। अग्रवाल उदाहरण देते हैं, ‘हेलमेट नहीं पहनने या लापरवाही से सड़क पार करने वालों की जितनी अधिक लापरवाही साबित हो जाती है उनका मुआवजा उतना ही कम किया जा सकता है। ट्रिब्यूनल का आकलन सबूतों पर हो धारणा पर नहीं।’

कैसे पाएं मुआवजा

अपना पक्ष मजबूत करने के लिए पीड़ित को फौरन प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करानी चाहिए। किंग स्टब ऐंड कासिवा एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज की पार्टनर स्मिता पालीवाल कहती हैं, ‘उन्हें दुर्घटना स्थल से सबूत भी ले लेने चाहिए, फौरन इलाज कराना चाहिए, उसके सभी बिल और रिकॉर्ड संभालकर रखने चाहिए तथा और मेडिको-लीगल केस भी दायर करना चाहिए।’

अग्रवाल कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले की नजीर देते हुए आगाह करते हैं कि देर करने, दस्तावेज खो देने और बात बदलने से मामला कमजोर पड़ सकता है और अंत में खारिज भी हो सकता है।

क्यों खारिज होते हैं दावे

अदालतें अक्सर एफआईआर दर्ज करने में बेवजह देर होने, दोषी वाहन से दुर्घटना होने की बात साबित नहीं होने, विश्वसनीय मेडिकल सबूत नहीं होने, बढ़ा-चढ़ाकर दावा करने या झूठा आरोप लगाने पर दावे खारिज कर देती हैं। पालीवाल बताते हैं, ‘कई बार दावा करने वाले चोट का लिखित ब्योरा नहीं देने, मौखिक बयान के ही सहारे रहने, बढ़ा-चढ़ाकर दावा करने या जरूरी कार्यवाही को नजरअंदाज करने से खुद ही अपना मामला कमजोर कर लेते हैं।’

इन गलतियों से बचें

पीड़ितों को एफआईआर में देर करने या केवल मौखिक बयानों पर निर्भर रहने से बचना चाहिए। उन्हें इलाज के दस्तावेज और सबूत संभालकर रखने चाहिए और आय या चोट बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बतानी चाहिए। अग्रवाल चेताते हैं कि सुनवाई में नहीं पहुंचने या नोटिस का जवाब नहीं देने से भी मामला कमजोर हो सकता है। मुआवजा पाना है तो समय पर कार्रवाई करना और सही कागज संभालकर रखना जरूरी है।

First Published : November 30, 2025 | 9:24 PM IST