विदेश में पैसा भेजने वालों के लिए एक जरूरी अपडेट सामने आया है। बैंक या अधिकृत फॉरेक्स डीलर के जरिए विदेश पैसा भेजना अपने आप में आयकर विभाग की जांच का कारण नहीं बनता। हालांकि, RBI के विदेशी मुद्रा नियमों का पालन करना और इनकम टैक्स नियमों के तहत पूरी तरह अनुपालन करना दो अलग-अलग बातें हैं।
इनकम टैक्स विभाग ने विदेश भेजे गए पैसों के आंकड़ों की जांच के बाद देशभर में एक नई वेरिफिकेशन एक्सरसाइज शुरू की है। विभाग के मुताबिक, करीब 394 संस्थाओं और 36 प्रोफेशनल्स की जांच की जा रही है। इस कार्रवाई में उन संस्थाओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है, जिन्होंने विदेशों में बड़ी रकम भेजी, लेकिन उनकी घोषित कारोबारी गतिविधियां या टर्नओवर इन रकम के मुकाबले बेहद कम नजर आए।
विभाग की यह कार्रवाई कुछ फर्जी चैरिटेबल ट्रस्टों से जुड़े सर्च ऑपरेशन के बाद सामने आई है। आरोप है कि इन ट्रस्टों के जरिए फर्जी डोनेशन और कॉन्ट्रिब्यूशन के बदले अकॉमोडेशन एंट्री दी जा रही थी।
जांच के दौरान विभाग को कुछ ऐसी संस्थाओं के बारे में जानकारी मिली, जिन्होंने बड़ी रकम विदेश भेजी थी। इनमें कुछ संस्थाएं ऐसी थीं जिन्होंने इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं किया था, जबकि कुछ ने बहुत कम टर्नओवर दिखाया था। विभाग को उनकी घोषित आय और विदेश भेजी गई रकम के बीच बड़ा अंतर नजर आया।
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विभाग ने कुछ मामलों में यह भी पाया कि विदेश भेजे गए पैसे का जो कारण बताया गया था, वह संबंधित कंपनी के वास्तविक कारोबार से मेल नहीं खाता था।
मसलन, कुछ रेमिटेंस को फ्रेट पेमेंट, सॉफ्टवेयर इंपोर्ट या कंसल्टिंग सर्विसेज के भुगतान के तौर पर बताया गया। लेकिन जांच में इन संस्थाओं की वास्तविक कारोबारी गतिविधियां इन दावों से अलग दिखाई दीं। कुछ संस्थाएं अपने घोषित पते पर चलती हुई भी नहीं मिलीं।
ऐसा नहीं है। आयकर विभाग ने 18 अगस्त को जारी अपनी प्रेस रिलीज में स्पष्ट किया है कि मौजूदा जांच का मुख्य फोकस संदिग्ध संस्थाओं और शेल कंपनियों पर है। इसका मतलब यह नहीं है कि विदेश पैसा भेजने वाला हर व्यक्ति आयकर विभाग की जांच के दायरे में आ गया है।
टैक्स एक्सपर्ट एडवोकेट बी. श्रवणथ शंकर के मुताबिक, सामान्य व्यक्तिगत रेमिटर जैसे विदेश में पढ़ने वाले छात्र, परिवार या निवेशक इस अभियान का घोषित निशाना नहीं हैं। हालांकि, बैंक और अधिकृत डीलर के जरिए होने वाले रेमिटेंस का डेटा जांच में इस्तेमाल हो रहा है, इसलिए व्यक्तिगत टैक्स रिटर्न में भी सामान्य स्तर पर क्रॉस-चेकिंग बढ़ सकती है।
इस अभियान में ऐसा कोई तय नियम नहीं है कि विदेश में एक निश्चित रकम भेजने, किसी खास देश में पैसा भेजने या किसी विशेष व्यक्ति को भुगतान करने पर अपने आप जांच शुरू हो जाएगी। असल में विभाग का ध्यान लेनदेन के संदिग्ध पैटर्न पर है।
टैक्स एक्सपर्ट रितिका नायर के मुताबिक, कुछ स्थितियां जांच के लिए संकेत बन सकती हैं:
यानी केवल विदेश पैसा भेजना समस्या नहीं है। रेमिटेंस की रकम, कंपनी की आय, कारोबार, भुगतान का कारण और उससे जुड़े दस्तावेजों के बीच तालमेल न होना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
विदेश पैसा भेजने के लिए अगर आपने अधिकृत बैंक या फॉरेक्स डीलर का इस्तेमाल किया है, तब भी आयकर विभाग जरूरत पड़ने पर उस लेनदेन के बारे में सवाल पूछ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर विदेशी रेमिटेंस संदिग्ध है। मुख्य बात यह है कि आपके पास पैसे के स्रोत, भेजने की वजह और लेनदेन की वास्तविकता को साबित करने के लिए पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज होने चाहिए।
टैक्स एक्सपर्ट के मुताबिक, अधिकृत बैंक या फॉरेक्स डीलर के जरिए पैसा भेजना और लागू टैक्स का भुगतान करना नियमों के पालन की दिशा में जरूरी कदम हैं। लेकिन करदाता को यह भी बताने में सक्षम होना चाहिए कि पैसा कहां से आया, किस उद्देश्य से भेजा गया, किस व्यक्ति या संस्था को भेजा गया और लेनदेन वास्तविक क्यों है।
विदेशी रेमिटेंस करने वाले करदाताओं को बैंक या रेमिटेंस की रसीद, लागू Form 15CA/15CB या नए संबंधित फॉर्म, TDS चालान, बिल, एग्रीमेंट, लाभार्थी की जानकारी और पैसे के स्रोत से जुड़े प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए।
अगर पैसा किसी कारोबारी काम के लिए विदेश भेजा गया है, तो कॉन्ट्रैक्ट, इनवॉइस और अकाउंटिंग रिकॉर्ड भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इन दस्तावेजों से यह साबित करने में मदद मिल सकती है कि भुगतान वास्तविक कारोबारी लेनदेन के तहत किया गया था।
टैक्स एक्सपर्ट बी. श्रवणथ शंकर के मुताबिक, आयकर विभाग संदिग्ध लेनदेन की पहचान के लिए डेटा एनालिटिक्स, अधिकृत डीलर बैंकों से मिलने वाली जानकारी और अंतरराष्ट्रीय सूचना साझा करने की व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकता है।
इसमें PAN के आधार पर अलग-अलग लेनदेन को जोड़ा जा सकता है। यानी अगर किसी व्यक्ति ने अलग-अलग बैंकों के जरिए विदेश पैसा भेजा है, तो जरूरी नहीं कि वे लेनदेन विभाग की नजर में अलग-अलग रहें। उपलब्ध डेटा के आधार पर उन्हें एक ही PAN से जोड़कर देखा जा सकता है।
कुछ लोग बड़ी रकम को अलग-अलग बैंकों से छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन में भेजकर यह मान सकते हैं कि इससे किसी खास सीमा से नीचे रहा जा सकेगा। लेकिन PAN स्तर पर डेटा को जोड़ने की व्यवस्था के कारण ऐसा तरीका विभाग की नजर से बचने की गारंटी नहीं देता।
टैक्स एक्सपर्ट अंकित जैन, पार्टनर, वेद जैन एंड एसोसिएट्स के मुताबिक, आयकर विभाग अधिकृत डीलर बैंकों की रिपोर्ट और दूसरे उपलब्ध डेटा के जरिए विदेशी रेमिटेंस की जानकारी का मिलान कर सकता है। खास तौर पर तब सवाल उठ सकते हैं, जब विदेश भेजी गई रकम करदाता की ITR में घोषित आय के मुकाबले बहुत ज्यादा हो।
अगर कोई व्यक्ति LRS के तहत व्यक्तिगत तौर पर विदेश पैसा भेजता है और सभी नियमों का पालन करता है, तो आम तौर पर उसका जोखिम संदिग्ध कारोबारी लेनदेन की तुलना में कम हो सकता है। लेकिन अगर उसकी घोषित आय और विदेश भेजी गई रकम में बड़ा अंतर है, तो लेनदेन पर सवाल उठ सकते हैं।
खासकर कम समय में ₹25 लाख से लेकर ₹1 करोड़ या उससे अधिक की बड़ी रकम विदेश भेजने पर, यदि उसका उचित स्रोत और उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो अतिरिक्त जांच की संभावना बढ़ सकती है।
इसलिए विदेश पैसा भेजते समय केवल बैंकिंग चैनल का इस्तेमाल करना ही पर्याप्त नहीं है। लेनदेन का उद्देश्य, पैसे का स्रोत और उससे जुड़े दस्तावेज भी स्पष्ट और सही होना जरूरी है।
विदेश पैसा भेजने को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि अगर रेमिटेंस RBI की Liberalised Remittance Scheme (LRS) की सीमा के अंदर है, तो उस पर टैक्स से जुड़ा कोई सवाल नहीं उठ सकता। ऐसा जरूरी नहीं है।
LRS के तहत भारत में रहने वाला कोई व्यक्ति एक वित्तीय वर्ष में तय नियमों और मंजूर उद्देश्यों के लिए 2.5 लाख डॉलर तक विदेश भेज सकता है। इसमें पढ़ाई, इलाज, यात्रा, गिफ्ट और निवेश जैसे खर्च शामिल हो सकते हैं।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि 2.5 लाख डॉलर की सीमा टैक्स छूट की सीमा नहीं है। यह FEMA यानी विदेशी मुद्रा से जुड़े नियमों के तहत तय की गई सीमा है।
एडवोकेट बी. श्रवणथ शंकर, मैनेजिंग पार्टनर, B Shanker Advocates LLP के मुताबिक, LRS की लिमिट सिर्फ FEMA के तहत तय सीमा है। इसका मतलब यह नहीं है कि उस रकम के स्रोत या टैक्स से जुड़े सवाल खत्म हो जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी व्यक्ति की सालाना घोषित आय 10 लाख रुपये है, लेकिन वह एक साल में करीब 1.5 करोड़ रुपये विदेश भेज देता है, तो सिर्फ LRS की सीमा का पालन करना इस रकम के स्रोत को स्पष्ट नहीं करता।
ऐसी स्थिति में आयकर विभाग व्यक्ति से यह पूछ सकता है कि विदेश भेजी गई रकम कहां से आई और इसे भेजने का उद्देश्य क्या था। इसलिए बड़े रेमिटेंस के मामले में पैसे के स्रोत और लेनदेन से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कई माता-पिता अपने बच्चों की विदेश में पढ़ाई, फीस, रहने और दूसरे जरूरी खर्चों के लिए नियमित रूप से पैसे भेजते हैं। आयकर विभाग की मौजूदा कार्रवाई का घोषित फोकस ऐसे सामान्य व्यक्तिगत रेमिटेंस पर नहीं है। फिर भी परिवारों को अपने लेनदेन का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना चाहिए।
बी. श्रवणथ शंकर की सलाह है कि विदेश पढ़ाई के लिए पैसे भेजते समय बैंक में जमा की गई LRS घोषणा, कॉलेज या यूनिवर्सिटी का एडमिशन लेटर, फीस की रसीद या इनवॉइस, बैंक स्टेटमेंट और पैसे के स्रोत से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखें।
अगर बच्चे की पढ़ाई का खर्च एजुकेशन लोन से पूरा किया जा रहा है, तो लोन सेंक्शन लेटर और उसकी रिपेमेंट से जुड़े रिकॉर्ड भी संभालकर रखने चाहिए।
मान लीजिए किसी परिवार ने बच्चे की विदेश में पढ़ाई के लिए 30 लाख रुपये भेजे हैं। ऐसे में परिवार के पास यह साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज होने चाहिए कि यह रकम वास्तव में पढ़ाई से जुड़े खर्चों के लिए भेजी गई थी।
बी. श्रवणथ शंकर के अनुसार, विदेश भेजी गई रकम को वास्तविक और दस्तावेजों से साबित होने वाले खर्चों से जोड़कर रखना उपयोगी रहेगा।
यानी LRS की सीमा के अंदर रेमिटेंस करना अपनी जगह जरूरी है, लेकिन पैसे का स्रोत, उसका सही इस्तेमाल और उससे जुड़े दस्तावेज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
अगर आप विदेश में शेयर, ETF या किसी दूसरे विदेशी एसेट में निवेश कर रहे हैं, तो सिर्फ पैसा विदेश भेज देना ही पर्याप्त नहीं है। भारत के निवासी जब Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत विदेश में निवेश करते हैं, तो उन्हें अपने विदेशी निवेश और उससे होने वाली कमाई की जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न में सही तरीके से देनी होती है।
इनकम टैक्स विभाग बैंक से मिले विदेश भेजे गए पैसों के रिकॉर्ड की तुलना ITR में दी गई जानकारी से कर सकता है। इसमें खास तौर पर Schedule Foreign Assets में घोषित विदेशी संपत्तियों और विदेश से हुई आय को देखा जा सकता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने विदेश में शेयर खरीदने के लिए 20 लाख रुपये भेजे। अगर बाद में वह ITR में उन विदेशी शेयरों की जानकारी या उनसे हुई आय का खुलासा नहीं करता है, तो मामला सिर्फ विदेश पैसा भेजने तक सीमित नहीं रहेगा।
एडवोकेट बी. श्रवणथ शंकर के मुताबिक, ITR के Schedule Foreign Assets में विदेशी संपत्ति या उससे हुई आय की जानकारी नहीं देना गंभीरता से लिया जाता है। ऐसे मामलों में Black Money (Undisclosed Foreign Income and Assets) Act के तहत कार्रवाई हो सकती है।
यानी विदेश पैसा भेजना नियमों के मुताबिक होना पहला कदम है। इसके बाद उस पैसे से खरीदी गई विदेशी संपत्ति और उससे हुई कमाई की सही जानकारी टैक्स रिटर्न में देना भी उतना ही जरूरी है।
टैक्स एक्सपर्ट जैन के मुताबिक, LRS के तहत विदेश भेजी गई हर रकम का स्रोत वैध और टैक्स के लिहाज से समझाने योग्य होना चाहिए।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति करीब 2 लाख डॉलर विदेश भेजता है, लेकिन उसकी सालाना घोषित आय सिर्फ 10 लाख रुपये है, तो आयकर विभाग के सामने यह सवाल उठ सकता है कि इतनी बड़ी रकम का स्रोत क्या है।
इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि आपने LRS की तय सीमा के अंदर पैसा भेजा है। पैसे का स्रोत और उससे जुड़े दस्तावेज भी स्पष्ट होने चाहिए।
इनकम टैक्स विभाग की मौजूदा जांच में Form 15CB जारी करने वाले प्रोफेशनल्स पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कुछ खास तरह के विदेशी रेमिटेंस में यह चार्टर्ड अकाउंटेंट की ओर से जारी किया जाने वाला सर्टिफिकेट होता है, जिसमें भुगतान पर टैक्स की स्थिति तय करने के लिए खातों और दूसरे संबंधित दस्तावेजों की जांच की जाती है।
विभाग के डेटा विश्लेषण में सामने आया कि अपेक्षाकृत कम संख्या में प्रोफेशनल्स ने बड़ी संख्या में Form 15CB जारी किए। साथ ही, इन प्रमाणपत्रों से जुड़े कई रेमिटेंस विदेश की कुछ चुनिंदा संस्थाओं तक पहुंचे।
इससे यह सवाल उठा कि इन प्रमाणपत्रों को जारी करने से पहले संबंधित लेनदेन की पर्याप्त जांच और सावधानी बरती गई थी या नहीं। इसी वजह से 36 प्रोफेशनल्स को वेरिफिकेशन एक्सरसाइज में शामिल किया गया है।
एडवोकेट बी. श्रवणथ शंकर के अनुसार, Form 15CB पर साइन करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट को केवल रेमिटर की बताई जानकारी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें संबंधित लेनदेन, दस्तावेज और खातों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए और उचित सावधानी के साथ पेशेवर निर्णय लेना चाहिए।
इसका मतलब है कि Form 15CB जारी करना महज एक कागजी प्रक्रिया नहीं है। इसे जारी करने वाले प्रोफेशनल की भी जिम्मेदारी तय होती है।
अगर आप अपने बच्चे की विदेशी पढ़ाई, यात्रा, इलाज, किसी को गिफ्ट या विदेशी निवेश के लिए पैसा भेज रहे हैं, तो सिर्फ बैंक से ट्रांसफर मंजूर हो जाना ही पर्याप्त नहीं है।आपके पास इन सवालों का स्पष्ट जवाब और जरूरत पड़ने पर दस्तावेज होने चाहिए:
सबसे जरूरी बात यह है कि LRS की 2.5 लाख डॉलर की सालाना सीमा के अंदर विदेश पैसा भेजना अपने आप यह साबित नहीं करता कि लेनदेन इनकम टैक्स के नियमों के तहत भी पूरी तरह सही है।
विदेशी मुद्रा से जुड़े नियमों का पालन और इनकम टैक्स कानूनों का पालन दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। इसलिए विदेश पैसा भेजते समय सिर्फ RBI/FEMA नियमों पर ध्यान देने के बजाय उसके स्रोत, उद्देश्य, विदेशी एसेट और उससे होने वाली आय की टैक्स रिपोर्टिंग भी सही रखना जरूरी है।