सर्वोच्च न्यायालय ने मैसर्स काबरा ऐंड एसोसिएट्स बनाम रेखा राजकुमार हेमदेव एवं अन्य मामले में कहा कि अगर कोई पक्ष रियल एस्टेट (नियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा) के तहत राहत मांग रहा है तो वह उसी मुद्दे पर वह बाद में उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 के तहत उपभोक्ता अदालतों का रुख नहीं कर सकता। अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के इसी मामले में आए एक फैसले को खारिज कर दिया।
किंग स्टब्स ऐंड कासिवा एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज में पार्टनर डेजिग्नेट अमृता वर्षिणी श्रीधर कहती हैं, ‘सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों कानून मकान खरीदारों को समाधान प्रदान करते हैं, लेकिन एक ही मामले के लिए क्रमिक अथवा समानांतर रूप से उनका उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस फैसले का उद्देश्य फोरम का अनावश्यक इस्तेमाल और मामलों की बहुतायत को रोकना है।’
कानून के विशेषज्ञों के अनुसार अदालतों ने न्यायिक व्याख्या के जरिये इस फैसले को आकार दिया है। रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 मकान खरीदारों को उपभोक्ता अदालतों में जाने से स्पष्ट तौर पर नहीं रोकता है और यह बताता है कि उसके समाधान अन्य कानूनी समाधानों के अतिरिक्त हैं। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया था कि खरीदार रेरा और उपभोक्ता कानून दोनों के तहत समाधान हासिल कर सकते हैं। बीएमआर लीगल के पार्टनर शांकी अग्रवाल ने कहा, ‘न्यायालय ने अब समाधान चुनने के सिद्धांत पर दृढ़ता से जोर दिया है। इस फैसले से उपभोक्ता समाधान खत्म नहीं होते हैं बल्कि यह फोरम के शुरुआती चयन को बाध्यकारी बनाता है।’
रेरा सामान्य तौर पर मकान का कब्जा देने में देरी, रिफंड के दावे, परियोजना संबंधी खुलासे और बिल्डर के दायित्व जैसे मुद्दों से निपटता है। क्षेत्र विशेष पर केंद्रित होने के कारण उसकी प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और रियल एस्टेट मामलों के अनुकूल होती है। अग्रवाल ने कहा, ‘इसे पारंपरिक मुकदमेबाजी के मुकाबले अपेक्षाकृत तेजी से समाधान देने के लिए बनाया गया है। प्राधिकरण बिल्डरों को परियोजना समय-सारणी का पालन करने, ब्याज सहित रकम वापस करने और वैधानिक उल्लंघन को ठीक करने का निर्देश दे सकते हैं। इस प्रकार रेरा उन मकान खरीदारों के लिए एक प्रभावी प्लेटफॉर्म बन जाता है जो कब्जा, रिफंड या बिल्डर के दायित्वों को लागू करवाने जैसे मामलों से जूझ रहे हैं।’
एक्विलॉ की पार्टनर आस्था शर्मा ने कहा, ‘रेरा स्वीकृत योजनाओं को लागू करने, पांच साल के भीतर ढांचागत खामियों को ठीक करने और डिफॉल्ट करने वाले डेवलपरों के लिए तीन साल तक की जेल जैसे समाधान प्रदान करता है। अगर कोई परियोजना पंजीकृत नहीं है तो भी रेरा के अधिकारी इस कानून के तहत शिकायतों की जांच कर सकते हैं।’
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 उन मकान खरीदारों को उपभोक्ता मानता है जो व्यक्तिगत उपयोग के लिए मकान खरीदते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि उपभोक्ता अदालत खरीदार और डेवलपर के बीच अनुबंध की शर्तों के इतर मुआवजा दिला सकती है। शर्मा ने कहा, ‘उनके पास राहत देने की व्यापक शक्तियां होती हैं। उनमें ब्याज सहित रिफंड, खामियों को दूर करने और दंडात्मक हर्जाना शामिल हैं। उपभोक्ता अदालतों के पास प्रवर्तन संबंधी शक्तियां भी हैं। आदेशों का पालन न करने पर कारावास भी हो सकता है।’
रेरा या उपभोक्ता अदालत में से किसी एक का चयन वास्तव में तथ्यों और मांगी गई राहत पर निर्भर होना चाहिए। शर्मा ने कहा, ‘अगर खरीदार मुख्य तौर पर क्षतिपूर्ति चाहता है तो उसके लिए उपभोक्ता अदालत उपयुक्त हो सकती है। मगर रेरा उन मामलों में अधिक उपयुक्त हो सकता है जब उद्देश्य नियामकीय प्रवर्तन या डेवलपर के खिलाफ निवारक कार्रवाई करना हो।’ परियोजना में देरी, गैर-पंजीकरण या नियामकीय उल्लंघन जैसे मुद्दों को रेरा अधिकारियों द्वारा बेहतर तरीके से निपटाया जा सकता है।
मकान खरीदारों को अपनी शिकायत की प्रकृति का सावधानीपूर्वक आकलन करते हुए उपयुक्त फोरम का चयन करना चाहिए। श्रीधर ने कहा, ‘मकान खरीदारों को बिल्डर-खरीदार समझौते और भुगतान रिकॉर्ड जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज संभालकर रखने चाहिए। साथ ही उन्हें प्रकिया शुरू करने से पहले कानूनी सलाह अवश्य लेनी चाहिए।