संकट भरे आर्थिक माहौल के बीच पात्र संस्थागत नियोजन (क्यूआईपी) के जरिये इक्विटी फंड जुटाने की गतिविधियां 80 फीसदी से ज्यादा घटकर 5,039 करोड़ रुपये रहीं। इनमें आई तेज गिरावट दो साल तक अच्छी खासी रकम जुटाने के बाद देखने को मिली। नई पूंजी जुटाने के लिए क्यूआईपी सूचीबद्ध कंपनियों के सबसे ज्यादा तरजीही जरिये में से एक है। इसके जरिए जुटाई गई रकम का इस्तेमाल मोटे तौर पर विस्तार और बढ़त का मार्ग प्रशस्त करने में होता है। सबसे ज्यादा क्यूआईपी वित्तीय फर्में जारी करती हैं क्योंकि उन्हें उधार देने और अपनी बैलेंस शीट की बढ़ोतरी के लिए लगातार रकम की दरकार होती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि क्यूआईपी के जरिए जुटाई गई रकम में तेज गिरावट शायद यह संकेत दे र हा है कि भारतीय कंपनी जगत के दिग्गज देखना चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था के अवरोध मसलन बढ़ती ब्याज दरें, जिंसों की ऊंची कीमतों और खराब हो रहे आर्थिक मानदंडों का क्या रुख रहता है।
वैश्विक बैंक के निवेश बैंकर ने कहा, पिछले साल इस दौरान माहौल काफी तेजी का था। इसने कंपनियों को अपनी विस्तार योजना आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके अलावा काफी नकदी मौजूद थी, जिसने फंड जुटाने के माहौल को अनुकूल बना दिया। अब चीजें बदल गई हैं और पूंजी की किल्लत दिख रही है, ऐसे में कंपनियां आर्थिक अनिश्चितता को देखते हुए ज्यादा सतर्क हो गई हैं।
मध्य जून में बेंचमार्क निफ्टी 13 महीने के निचले स्तर पर आ गया था, वहीं निफ्टी मिडकैप 100 व निफ्टी स्मॉलकैप 100 मंदी के दौर में चले गए थे।
आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के कार्यकारी निदेशक अजय सराफ ने कहा, पिछले तीन -चार महीने, खास तौर से अप्रैल के बाद पूंजी बाजार की गतिविधियों के लिए अनुकूल नहीं रहे हैं। यहां तक कि पिछले छह महीने में आईपीओ से जुटाई गई रकम भी काफी कम रही है, अगर हम एलआईसी को छांट दें तो। हर कोई बाजार के स्थिर होने और क्यूआईपी का रास्ता अपनाने के मामले में देखो व इंतजार करो की रणनीति अपना रहा है।
उद्योग के प्रतिभागियों ने कहा कि संस्थागत निवेशक बढ़ते बाजार में क्यूआईपी में निवेश करना पसंद करते हैं। शेयर कीमतों में उतारचढ़ाव और मंदी का परिदृश्य निवेशकों को हतोत्साहित करता है। क्यूआईपी मोटे तौर पर मौजूदा बाजार कीमत के करीब होता है। इसके परिणामस्वरूप कमजोर बाजार में निवेशक मार्क-टु-मार्केट नुकसान का सामना कर सकते हैं।
महामारी के बाद क्यूआईपी ने जोर पकड़ा था क्योंकि कंपनियां कोविड पूंजी की तलाश में थीं, जो क्यूआईपी व राइट्स इश्यू के जरिए जुटाए गए ताकि बैलेंस शीट मजबूत हो और बढ़त के मौके में पूंजी का इस्तेमाल किया जा सके। 2020 व 2021 की पहली छमाही में कंपनियों ने क्रमश: 28,573 करोड़ रुपये और 28,177 करोड़ रुपये जुटाए। इसे भारतीय बाजारों में पूंजी प्रवाह से सहारा मिला। साल 2020 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 1.7 लाख करोड़ रुपये के शेयर खरीदे और 2021 में वे 25,572 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे। इस साल अब तक एफपीआई 2.2 लाख करोड़ रुपये के बिकवाल रहे हैं।
मोतीलाल ओसवाल इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स के एमडी व सीईओ अभिजित तारे ने कहा, कंपनियां बाजार के उतारचढ़ाव की नई वास्तविकता से रूबरू हो चुकी हैं और जिन्हें तत्काल पूंजी की दरकार है वे बेहतर मूल्यांकन के लिए मौके का इंतजार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि अगले छह महीने बेहतर रहेंगे। हम कई कंपनियों को क्यूआईपी के जरिए रकम जुटाते देखेंगे, लेकिन इसका आकार पहले के मुकाबले छोटा रह सकता है।