बॉन्ड बाजार इन दिनों सुर्खियों में है। दुनियाभर में बॉन्ड यील्ड कई दशकों के उच्च स्तर पर पहुंच गई है, जिससे निवेशकों के बीच जोखिम से बचने की भावना (रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट) बढ़ी है। हालांकि, यील्ड में तेज बढ़ोतरी से फिक्स्ड-इनकम निवेशकों के लिए अच्छे रिटर्न पाने के मौके भी बन रहे हैं। फंड मैनेजरों का रुझान बॉन्ड यील्ड कर्व के छोटी अवधि वाले हिस्से की ओर है, क्योंकि उन्हें ब्याज दरों में आगे और बढ़ोतरी की आशंका है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स की यील्ड बढ़कर करीब तीन साल के उच्च स्तर 4.81 फीसदी पर पहुंच गई। वहीं, जापान की 10 साल की बॉन्ड यील्ड 3 फीसदी से ऊपर बनी हुई है, जो 30 साल का उच्च स्तर है। ऑस्ट्रेलिया में 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 5.198 फीसदी हो गई, जो 15 साल से ज्यादा समय में इसका सबसे ऊंचा स्तर है। घरेलू बाजार की बात करें तो बुधवार के कारोबार में भारत की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड भी 4 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 7 फीसदी हो गई। यह तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।
महंगाई बढ़ने की आशंका और वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में तेजी के कारण केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने की उम्मीद बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर गोलीबारी होने के बाद तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका बढ़ गई। इसके चलते ब्रेंट क्रूड का वायदा भाव 96 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया।
ट्रस्ट म्युचुअल फंड्स के सीईओ संदीप बागला ने कहा कि बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का मुख्य कारण आगे महंगाई बढ़ने की आशंका है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी, नरम मौद्रिक नीति और लंबे समय से कम बनी हुई ब्याज दरें भी इसके प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका में केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देता रहा है और ब्याज दरें काफी लंबे समय से बहुत कम रही हैं।’’ अमेरिका में जुलाई में महंगाई दर 3.4 फीसदी रही, लेकिन यह अब भी अमेरिकी फेडरल रिजर्व के 2 फीसदी के तय लक्ष्य से ऊपर है।
कैनरा रोबेको म्युचुअल फंड के डेट विभाग के सीआईओ अवनीश जैन ने कहा कि एक अन्य चिंता विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता राजकोषीय घाटा (फिस्कल डेफिसिट) है। उन्होंने कहा, ‘‘खास तौर पर अमेरिका में राजकोषीय घाटा करीब 6 फीसदी के बेहद ऊंचे स्तर पर है। राजकोषीय चिंताओं के कारण जापान में भी ब्याज दरें बढ़ रही हैं। वहीं, बढ़ते रक्षा खर्च के कारण यूरोपीय संघ में भी राजकोषीय घाटा बढ़ने की संभावना है।’’
टाटा एएमसी में फिक्स्ड इनकम के हेड मूर्ति नागराजन ने कहा कि घरेलू स्तर पर भारतीय डेट बाजार फिलहाल करीब 75 बेसिस प्वाइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी को अपने मौजूदा भाव में शामिल कर चुका है। यही मौजूदा बॉन्ड यील्ड के स्तर में भी दिखाई दे रहा है।
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नागराजन का मानना है कि मौजूदा यील्ड स्तर पर लो-ड्यूरेशन फंड्स 7 फीसदी से ज्यादा का कैरी रिटर्न दे रहे हैं। वहीं, ड्यूरेशन प्रोडक्ट्स में यील्ड 7.5 फीसदी से ऊपर है। ऐसे में मौजूदा स्तर निवेशकों के लिए आकर्षक बने हुए हैं।
बागला ने कहा कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका को देखते हुए निवेशकों की रणनीति यील्ड कर्व के निचले हिस्से पर फोक्स्ड होनी चाहिए। भारत में इसका मतलब हाई क्वालिटी वाले दो से तीन साल की अवधि वाले कॉरपोरेट बॉन्ड्स से है, जहां स्प्रेड आकर्षक हैं। उन्होंने कहा, ‘‘इन बॉन्ड्स को इस लिहाज से सुरक्षित भी माना जा सकता है कि समय बीतने के साथ इनकी मैच्योरिटी अवधि कम होती जाएगी। मैच्योरिटी नजदीक आने पर ये बॉन्ड यील्ड कर्व के निचले हिस्से में कारोबार करने लगेंगे, जिससे निवेशक के रिटर्न को सुरक्षा मिल सकती है।’’
व्हाइटओक कैपिटल म्युचुअल फंड के डायरेक्टर और सीनियर फंड मैनेजर पीयूष बरनवाल ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) की मांग सुस्त रही है।उन्होंने कहा, ‘‘पिछले साल एसेट एलोकेशन में बदलाव के कारण पेंशन फंड भी कम एक्टिव रहे। इस साल मांग में सुधार हो सकता है, लेकिन बॉन्ड की सप्लाई अभी भी काफी ज्यादा है। लंबी अवधि के भारतीय बॉन्ड्स में एफपीआई की मांग भी कमजोर रही है। इस साल FCNR डिपॉजिट से आने वाले फंड के कारण बाजार में लिक्विडिटी बेहतर है। ऐसे में आरबीआई की बड़े पैमाने पर बॉन्ड खरीदारी की संभावना कम है। इससे मांग और सप्लाई के बीच असंतुलन की चिंता और बढ़ रही है।’’
इस स्थिति को देखते हुए बरनवाल यील्ड कर्व के लंबे छोर को लेकर सतर्क हैं। खासतौर पर 10, 15 और 30 साल की अवधि वाले बॉन्ड्स को लेकर उनका रुख सावधानी भरा है। उन्होंने कहा, ‘‘अगर यील्ड में पर्याप्त बढ़ोतरी होती है, तो ये बॉन्ड आकर्षक हो सकते हैं। लेकिन मौजूदा स्तर पर मैं दो से चार साल की अवधि वाले छोटे अवधि के बॉन्ड्स को प्राथमिकता दूंगा, क्योंकि इनमें जोखिम और संभावित रिटर्न का संतुलन बेहतर है।’’
इसी तरह की राय जताते हुए जैन ने कहा कि अगर कोई निवेशक एक से दो साल की ड्यूरेशन वाले फंड्स पर विचार कर रहा है या अल्ट्रा-शॉर्ट-टर्म अथवा लो-ड्यूरेशन फंड्स में निवेश करना चाहता है, तो ये मौजूदा स्तर पर आकर्षक हैं। इनमें कैरी रिटर्न बेहतर है और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से जुड़ा जोखिम भी कम रहता है।
(डिस्क्लेमर: यहां साझा किए गए विचार और आउटलुक संबंधित ब्रोकरेज/विश्लेषकों के हैं और बिजनेस स्टैंडर्ड इनका समर्थन नहीं करता है। पाठकों को निवेश संबंधी निर्णय अपने विवेक से लेना चाहिए।)