नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) ने अपने लंबे समय से प्रतीक्षित इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए प्रस्तावित शेयर बिक्री को संभालने के लिए कई मर्चेंट बैंकरों, लॉ फर्मों और अन्य सलाहकारों के बड़े कंसोर्टियम की नियुक्ति की है। एक्सचेंज ने गुरुवार को कहा कि उसकी आईपीओ समिति ने इस प्रक्रिया को मंजूरी दे दी है। इस समिति की अध्यक्षता पूर्व नौकरशाह और एनएसई के चेयरमैन श्रीनिवास इंजेटी (Srinivas Injeti) कर रहे हैं। कंपनी के मुताबिक, आईपीओ के लिए सलाहकारों और अन्य मध्यस्थों का चयन एक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए किया गया है।
बाजार के जानकारों का कहना है कि एक्सचेंज दो महीने से भी कम समय में सेबी के पास अपना ऑफर दस्तावेज दाखिल कर सकता है और इस साल के अंत से पहले IPO आने की पूरी संभावना है।
आईपीओ के लिए 20 निवेश बैंकों को नियुक्त किया गया है, जिनमें कोटक महिंद्रा कैपिटल, जेएम फाइनेंशियल, एक्सिस कैपिटल, आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज, एसबीआई कैपिटल मार्केट्स, नुवामा वेल्थ मैनेजमेंट, एवेन्डस कैपिटल, मॉर्गन स्टेनली, सिटीग्रुप और जेपी मॉर्गन आदि शामिल हैं।
आठ कानूनी सलाहकारों का भी चयन किया गया है, जिनमें सिरिल अमरचंद मंगलदास, खैतान एंड कंपनी, एजेडबी एंड पार्टनर्स, एसएंडआर एसोसिएट्स, शार्दुल अमरचंद मंगलदास और ट्राइलीगल शामिल हैं।
अन्य नियुक्त मध्यस्थों में रजिस्ट्रार MUFG Intime India भी शामिल है। इसके अलावा कई एडवाइजरी और कम्युनिकेशन फर्मों को भी चुना गया है, जो दस्तावेज़ीकरण, ड्यू डिलिजेंस, मार्केटिंग और ऑफर के काम-काज को पूरा करने में मदद करेंगी।
मध्यस्थों के चयन की इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी वैश्विक सलाहकार फर्म रोथ्सचाइल्ड एंड कंपनी ने की, जिसने NSE के लिए प्रोसेस एडवाइजर की भूमिका निभाई। चयन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही अब रोथ्सचाइल्ड का यह कार्यकाल भी समाप्त हो गया है।
एक्सचेंज को इस साल की शुरुआत में बाजार नियामक से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) मिल गया है। इससे उसके आईपीओ का रास्ता साफ हो गया है। माना जा रहा है कि यह भारत की सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली लिस्टिंग्स में से एक हो सकती है। यह इश्यू पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) के रूप में आएगा।
NSE करीब एक दशक से पब्लिक होने की कोशिश कर रहा है। लेकिन को-लोकेशन मामले से जुड़ी नियामकीय जांच के कारण यह योजना अटक गई थी। इस मामले में कुछ ब्रोकर्स पर एक्सचेंज के सर्वरों तक अनुचित ट्रेडिंग पहुंच पाने का आरोप लगा था।
एक्सचेंज ने पहले 2016 में सेबी के पास आईपीओ के लिए ड्राफ्ट दस्तावेज दाखिल किए थे, लेकिन चल रही जांच और नियामकीय प्रक्रियाओं के कारण उस समय आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिल सकी थी।
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पिछले कुछ वर्षों में NSE ने नियामकीय अनिश्चितताओं को दूर करने के लिए कुछ मामलों का निपटारा किया है और अपने गवर्नेंस सिस्टम को भी मजबूत किया है। को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामले में सेटलमेंट का इंतजार है, जिसके लिए एक्सचेंज ने करीब 1,400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
NSE के शेयर अनलिस्टेड बाजार में सक्रिय रूप से कारोबार करते हैं। हाल के वर्षों में इनका वैल्यूएशन लगभग 4-5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा रहा है, जो भारत के डेरिवेटिव बाजार में इसकी मजबूत पकड़ और बेहतर मुनाफे को दर्शाता है।
अनलिस्टेड जोन के अनुसार, अनलिस्टेड बाजार में NSE का एक शेयर करीब 1,975 रुपये पर कारोबार कर रहा था।