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सीमेंट-मांग से अधिक आपूर्ति

Last Updated- December 07, 2022 | 6:02 PM IST

सीमेंट स्टॉक के लिए पिछले कुछ महीनें काफी आकर्षक रहे हैं। अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट ने बाजार को आउटपरफार्म किया। यहां तक कि इंडिया सीमेंट और एसीसी ने भी पॉजिटिव रिटर्न दिया।


यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि जून की तिमाही में देश भर में सीमेंट की कीमतें स्थिर रहीं। हालांकि जुलाई और अगस्त में देश के कुछ भागों में कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई विशेषकर दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में। यद्यपि जुलाई में सीमेंट उत्पादकों मे कम मात्रा में सीमेंट का उत्पादन किया।

जून में जहां सीमेंट कंपनियों ने 147 लाख टन सीमेंट का उत्पादन किया था वहीं जुलाई में यह उत्पादन महज 145 लाख टन रहा। उद्योग पर निगाह रखने वाले लोंगो के अनुसार मांग में धीरे धीरे कमी आ रही है जबकि आपूर्ति के वित्तीय वर्ष 2008 से 2011 तक 20 से 22 फीसदी बढ़ने की संभावना है।

जून में भी मांग कमजोर रही और देश के अधिकांश भागों में मांग में ईकाई अंकों की ही बढोतरी देखी गई हालांकि दक्षिणी राज्यों में दोहरे अंकों में बढ़त हुई। इसकी वजह रही मानसून का समय से पहले आ जाना। अगले कुछ सालों में मांग के 10 से 12 फीसदी की गति से बढ़ने की संभावना है। इससे सीमेंट की कीमतों पर असर पड़ सकता है और यह अगले 12 से 15 महीनों में आठ से 12 फीसदी गिर सकती हैं।

यहां तक कि इंडस्ट्री के कैपिसिटी यूटिलाइजेशन के भी पांच सालों में पहली बार गिरने की संभावना है। यह पिछले साल 100 फीसदी रही थी जबकि इस साल इसके सिर्फ 89 फीसदी रहने की संभावना है। इसकी वजह है कि वित्तीय वर्ष 2008 में 300 लाख टन सीमेंट का उत्पादन और होने लगेगा।

यूटीलाइजेशन के मौजूदा 95 फीसदी के स्तर से गिरकर 87 फीसदी के स्तर पर पहुंचने की संभावना है और वित्त्तीय वर्ष 2010 में इसके और गिरने की संभावना है क्योंकि अगले दो तीन सालों में 1200 लाख टन की अतिरिक्त सीमेंट क्षमता जुड़ेगी।

सीमेंट उत्पादकों को कोयले की ऊंची कीमतों को झेलना होगा। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोयले की कीमतों में जुलाई के महीनें में 14 फीसदी की गिरावट आई है और यह 152 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंच गया है।

लेकिन अभी भी ये 166 फीसदी ज्यादा है। हालांकि यह जून की तिमाही में स्थिर रहा। बिजली की ऊंची कीमतों की वजह से भी ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ेगा। सीमेंट स्टॉक का कारोबार इससमय वित्त्तीय वर्ष 2009 में अनुमानित आय से पांच से दस गुना के सस्तर पर हो रहा है और यह महंगा नही है।

भारत-इतना सस्ता भी नहीं

विदेशी निवेशक भारतीय स्टॉक में फिर दिलचस्पी ले रहे हैं। सिटी ग्रुप की रिपोर्ट कहती है कि पिछले हफ्ते विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में शुध्द खरीदार बने रहे और अप्रैल 2008 के बाद उन्होंने भारतीय बाजार में सबसे ज्यादा खरीदारी की। पिछले चार हफ्तों में बाजार में इनफ्लो 15.2 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया और पिछले हफ्ते के दौरान ही यह 5.2 करोड़ डॉलर रहा।

सिटी ग्रुप का मानना है कि ऊंची वैल्यूएशन अभी भी एक समस्या है। 14,678 अंकों पर बीएसई सेंसेक्स का कारोबार वित्त्तीय वर्ष 2009 में अनुमानित आय से 15 से 16 गुना के स्तर पर हो रहा है। यह साल की शुरुआत से कम है जब बाजार का कारोबार 17 से 18 गुना के स्तर पर हो रहा था।

हालांकि तब से आर्थिक हालातों में भी परिवर्तन आया है और अब भविष्य में ज्यादा वैल्यूएशन की संभावना नजर नहीं आ रही है। ऊंची महंगाई की वजह से हाईरिस्क रेट के बढ़ने की संभावना है। हालांकि यह संभावना भी बन सकती है कि 10 वर्षीय बेंचमार्क बांड स्टॉप की वजह से यह रुझान टूटे।

यह देखना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि क्यों विदेशी संस्थागत निवेशक भारत में चयनित स्टॉक की खरीदारी कर रहे हैं। साल की शुरुआत से अब तक भारतीय दूसरा सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन करने वाला बाजार रहा है। यदि वैल्यूएशन सस्ता होता है तब भी तरलता के टाइट बने रहने की संभावना है। रोचक बात यह है कि भारतीय घरेलू निवेशकों ने भी अब तक अगस्त के महीनें में 823 करोड़ की खरीदारी की है।

जुलाई लगातार दसवां महीना रहा जब म्युचुअल फंड ने शुध्द इनफ्लो देखा। लेकिन यह 260 करोड़ का आंकड़ा पिछले नौ महीनों में सबसे कम और जून महीनें की तुलना में 81 फीसदी कम रहा। हालांकि जीवन बीमा कंपनियां जो इक्विटी की काफी खरीदारी करती है, म्युचुअल फंडों के लेने वाले बने रहे।

निजी कंपनियों की बिजनेस ग्रोथ 80 फीसदी सालाना ज्यादा रही और यह 2600 करोड़ के स्तर पर रहा जो यह दिखाता है कि इक्विटी बाजार में आई गिरावट की वजह से निवेशक इससे दूरी बना रहे हैं।

First Published - August 21, 2008 | 10:27 PM IST

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