ब्रोकरेज फर्म नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कॉरपोरेट दुनिया यानी India Inc. के पास मुनाफा और नकद पैसा तो काफी है, लेकिन कमजोर मांग के चलते कंपनियों के पास आगे बढ़ने के साफ विकल्प नहीं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब मांग धीरे चल रही हो और शेयरों के दाम पहले से ऊंचे हों, तो कंपनियों के लिए पैसा कहां और कैसे लगाएं, यह एक बड़ी उलझन बन जाती है।
नुवामा के अनुसार, इस समय कंपनियों के सामने कोई भी रास्ता आसान नहीं है। अगर कंपनियां नया निवेश करती हैं, तो बाजार में मांग कम होने की वजह से माल ज्यादा हो सकता है और मुनाफा घट सकता है। केमिकल्स, आईटी, फास्ट फूड और कंज्यूमर सामान बनाने वाली कंपनियों में 2021 के बाद ऐसा ही हुआ और उनके शेयरों ने कई साल तक अच्छा रिटर्न नहीं दिया।
अगर कंपनियां मुनाफा बचाकर रखती हैं और खर्च नहीं बढ़ातीं, तो कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। FMCG और पेंट्स जैसे सेक्टर में यही देखने को मिला है, जहां कंपनियों ने अच्छा मुनाफा तो कमाया, लेकिन कारोबार ज्यादा नहीं बढ़ा और शेयरों में भी खास तेजी नहीं आई।
तीसरा रास्ता शेयरधारकों को पैसा लौटाने का है, जैसे डिविडेंड देना या शेयर वापस खरीदना, लेकिन शेयरों के दाम पहले से ऊंचे होने की वजह से यह भी ज्यादा फायदेमंद नहीं लगता। इन तीनों ही वजहों से निवेशकों को अच्छे रिटर्न नहीं मिल पा रहे हैं। रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि शायद इसी कारण कई कंपनियों के बड़े अधिकारी और मालिक अपने शेयर बेच रहे हैं।
यह नुवामा की तीसरी सालाना रिपोर्ट है, जिसमें देखा गया है कि कंपनियां अपने पैसे का इस्तेमाल कितनी समझदारी से कर रही हैं। इसके लिए नुवामा ने एक पैमाना इस्तेमाल किया है, जिसे I-CRoIC कहा जाता है। इसका मतलब है कि कंपनी ने जो नया पैसा लगाया, उससे उसे कितना अतिरिक्त नकद मुनाफा मिला। यह गणना पिछले पांच सालों के आंकड़ों को देखकर की गई है। नुवामा का कहना है कि वही कंपनी अच्छा निवेश करती मानी जाती है, जो नए निवेश पर 15 फीसदी या उससे ज्यादा का फायदा कमा सके।
रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड के बाद कंपनियों ने अपने खर्च और ढांचे में सुधार किया, जिससे उनके नए निवेश पर मुनाफा बेहतर दिखने लगा। लेकिन यह सुधार इसलिए नहीं हुआ क्योंकि बाजार में मांग बढ़ी, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि कंपनियों ने खुद को दोबारा व्यवस्थित किया। अब यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और पिछले पांच साल का मुनाफे का स्तर एक जगह टिक गया है।
दूसरी तरफ, बाजार में मांग अब भी कमजोर है और सालाना 10 फीसदी से भी कम की रफ्तार से बढ़ रही है। पिछले 10 सालों में ज्यादातर सेक्टरों की बढ़त औसतन 10 फीसदी के आसपास ही रही है। इनमें से 10 में से 7 साल ऐसे रहे हैं, जब कारोबार की बढ़त 10 फीसदी से नीचे रही।
नुवामा का कहना है कि मांग कमजोर रहने की बड़ी वजह निर्यात में सुस्ती और लोगों की आमदनी का धीरे बढ़ना है। इससे आगे चलकर देश की आर्थिक रफ्तार पर भी असर पड़ सकता है। यह हालात 2000 के दशक से बिल्कुल अलग हैं, जब बाजार में मांग मजबूत थी और कारोबार करीब 20 फीसदी की सालाना रफ्तार से बढ़ रहा था।
नुवामा के अनुसार, इस समय भारत की कंपनियां अच्छा मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन आगे क्या करें, यह तय करना मुश्किल हो गया है। अगर कमजोर मांग के बीच कंपनियां फिर से ज्यादा निवेश करती हैं, तो आईटी, केमिकल्स, ड्यूरेबल्स और फास्ट फूड जैसे सेक्टरों में मुनाफा घटने का खतरा है, जैसा कि पिछले कुछ सालों में देखा गया है। दूसरी तरफ, अगर कंपनियां सिर्फ मुनाफा बचाकर बैठी रहती हैं, तो FMCG और पेंट्स जैसे सेक्टरों में कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, क्योंकि नई तकनीक और आसानी से मिलने वाले पैसे की वजह से मुकाबला बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में नुवामा ने बताया है कि मौजूदा हालात में निवेश के कुछ रास्ते फिर भी मौजूद हैं। पहला रास्ता उन सेक्टरों का है, जहां कंपनियां अभी खुद को सुधार रही हैं और मुनाफा दबाव में है, लेकिन सरकार की नीतियों से उन्हें मदद मिल रही है, जैसे ड्यूरेबल्स और केमिकल्स। दूसरा रास्ता उन कंपनियों का है, जो लगातार कारोबार बढ़ा रही हैं और दोबारा निवेश कर रही हैं, भले ही उनका मुनाफा बहुत ज्यादा न हो। तीसरा रास्ता उन कंपनियों का है, जो अच्छा नकद पैसा कमा रही हैं और निवेशकों को उसका फायदा देती हैं।