कृषि कानून पर रार, पंजाब ने पारित किए नए विधेयक

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 14, 2022 | 10:25 PM IST

हाल में अस्तित्व में आए कृषि कानूनों पर केंद्र और पंजाब सरकार के बीच टकराव तेज हो गया है। मंगलवार को पंजाब विधानसभा ने संसद में पारित कृषि कानूनों पर उठे तूफान के बीच नए विधेयक पारित किए हैं। राज्य विधानसभा द्वारा पारित इन विधेयकों के अनुसार कि सानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे गेहूं एवं चावल की बिक्री करने के लिए बाध्य करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
इसके साथ ही विधानसभा में पारित विधेयकों के अनुसार अनाज मंडी से बाहर होने वाले सभी लेनदेन पर कर लगाया जाएगा। जाहिर है, इन संशोधनों से राज्य ने अपने वित्तीय हित भी साधने की कोशिश की है। इस तरह, इन विधेयकों के बाद संसद में पारित तीन कृषि कानूनों का कुछ हिस्सा राज्य में निष्प्रभावी हो गया है। राज्य विधानसभा ने संसद में पारित तीनों कृषि कानूनों को राज्य एएपीएमसी अधिनियम, 1961 के अनुरूप करने के लिए इनमें संशोधन किए हैं। इस तरह, राज्य विधानसभा ने विधेयक पारित कर केंद्रीय कानूनों को दरकिनार कर दिया है।
कारोबार सुविधा कानून और अनुबंध कृषि कानून दोनों के मामलों में राज्य विधानसभा में किए गए संशोधन गेहूं एवं धान के संबंध में लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने लगगभ 22 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है और इनमें कई जैसे कपास एवं मक्का की बिक्री राज्य में एमएसपी से नीचे हुई है।
पंजाब में सामान्य धान एवं गेहूं के मामले में अनुबंध आधारित खेती कभी-कभी होती है। कानूनों के तहत पंजाब सरकार को केंद्र के मूल कानून में परिभाषित ‘कारोबार क्षेत्र’ में मंडी से बाहर होने वाले किसी लेनदेन पर कर लगाने का अधिकार दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य विधानसभा में पारित कानूनों का मतलब साफ है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को पंजाब में गेहूं एवं धान की लगभग सभी खरीदारी पर 8.5 प्रतिशत शुल्क देना होगा। मोटे अनुमानों के अनुसार पंजाब ऐसी खरीदारी से करीब सालाना 500 करोड़ रुपये अर्जित करता है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम में हुए संशोधन के संबंध में पंजाब के कानूनों का कहना है कि राज्य को भी आपात परिस्थितियों में केंद्र के साथ भंडारण सीमा लगाने का अधिकार होगा। इसी तरह, राज्य विधानसभा में पारित विधेयकों में कहा गया है कि केंद्रीय कानूनों में किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों के अलावा कोई किसान मौजूदा कानूनों के तहत किसी भी दीवानी अदालत में अपील कर सकता है।
दूसरी तरफ केंद्रीय कानूनों में स्पष्ट कहा गया है कि कारोबार सुविधा अधिनियम के तहत किसी विवाद की स्थिति में अगर संबंधित पक्ष अनुमंडलीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) या उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था से असंतुष्ट है तो वह न्यायालय में इसे चुनौती दे सकता है। कुछ विशेषज्ञों और किसानों के समूहों ने अनुबंध आधारित खेती के मामलों में विवाद पैदा होने पर इसके समाधान ढांचे पर सवाल खड़े किए हैं। इनका कहना है कि केंद्रीय कानूनों में जिस समाधान ढांचे की व्यवस्था की गई है उसका झुकाव बड़ी कंपनियों और कारोबारियों के पक्ष में है। राज्य सरकार के इन विधेयकों में केंद्रीय कानूनों में तथाकथित खामियों को दूर करने की कोशिश की गई है।
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने पंजाब विधानसभा में पारित विधेयकों को पूरी तरह गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक करार दिया है। कश्यप ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘राज्य केवल राज्य सूची में आने वाले विषयों पर कानून बना सकता है। समवर्ती सूची में शामिल किसी विषय पर संसद में बने कानून को मानने से कोई राज्य इनकार नहीं कर सकता है। राज्यों के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है।’ उन्होंने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को पंजाब विधानसभा में पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए। कश्यप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि राज्य सरकार ने राजनीतिक कारणों से यह कदम उठाया है। राज्य विधानसभा में कानून पारित कराने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।’

First Published : October 20, 2020 | 11:41 PM IST