महामारी ने डॉक्टरों और अस्पताल के सहयोगी कर्मचारियों के हालात से जुड़ी कई कमियों को भी उजागर किया है। बात 1896 की है। ब्यूबानिक प्लेग मुंबई (पहले बंबई) में जंगल की आग की तरह फैल रहा था जिससे साल खत्म होने के एक हफ्ते में ही करीब 1,900 लोगों की मौत हो गई। सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए 1897 में महामारी रोग अधिनियम (ईडीए) लागू किया। गुजरात क्षेत्र में हैजा के प्रसार (2018), चंडीगढ़ में डेंगू और मलेरिया (2015) से निपटने और पुणे में स्वाइन फ्लू (2009) को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश दौर के इस कानून का इस्तेमाल किया जाता रहा और अब देश में कोरोनावायरस महामारी से निपटने के लिए भी इस कानून के साथ-साथ आपदा प्रबंधन अधिनियम के कुछ प्रावधानों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। व्यावहारिक रूप से 124 साल में इसमें कोई बदलाव नहीं दिखा है और ईडीए ‘महामारी की बीमारी’ को परिभाषित नहीं करता है जो ज्यादातर पानी वाले जहाज और जमीन से जुड़ी यात्राओं के कारण फैलता है और इसमें टीके से जुड़े अभियान के अमल की अनदेखी की जाती है और एक सदी पहले हवाई यात्रा के जरिये प्रसार पर भी इसका जोर नहीं था। लेकिन महामारी वाले साल में इस पुराने कानून की कमियों को स्पष्ट रूप से महसूस किया गया है।
इस शृंखला के लिए बिज़नेस स्टैंडर्ड ने देश भर के विभिन्न स्तर के स्वास्थ्यसेवा कर्मियों का साक्षात्कार किया जो संक्रमित लोगों से किसी न किसी तरह सीधे जुड़े हैं। इस बातचीत से अंदाजा लगा कि किसी महत्त्वपूर्ण बदलाव के बिना महामारी या किसी भी भविष्य के स्वास्थ्य संकट से निटपना आसान नहीं होगा बल्कि उसमें खामियां बरकरार रहेंगी। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के मानद महासचिव आर वी अशोकन कहते हैं, ‘भारत में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा केवल कागजों पर मजबूत है जिसका विस्तार छोटी आबादी और समुदायों तक है। उनका और कई अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवरों का मानना है कि महामारी के लिए एक एकजुट राष्ट्रव्यापी कदम के लिए सबसे बड़ी बाधा यह है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है।’ वह कहते हैं, ‘हमने देखा है कि कोविड के खिलाफ संघर्ष जिला स्तर पर की गई कार्रवाइयों पर निर्भर करती है। लेकिन राज्य सरकारों ने इस पर अलग तरह से प्रतिक्रिया दी है। कई लोगों ने जांच, संक्रमित होने की दर, मृत्यु दर आदि से संबंधित महत्त्वपूर्ण जिलावार आंकड़ों को साझा नहीं किया है जिससे राष्ट्रीय स्तर का प्रयास और कठिन हो गया है। इसके समाधान के लिए आईएमए ने लंबे समय से अखिल भारतीय भारतीय चिकित्सा सेवा की वकालत की है। 1961 में स्वास्थ्य सर्वेक्षण एवं योजना समिति (जिसे मुदलियार समिति के नाम से भी जाना जाता है) द्वारा इसकी पेशकश की गई ताकि देश भर में समान रूप से प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीय स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जा सके। महामारी ने डॉक्टरों और सहयोगी कर्मचारियों की स्थिति के विवरण की कमी को भी उजागर किया है। उदाहरण के लिए, जब कोच्चि में आईएमए के अध्यक्ष राजीव जयदेवन पूरे भारत में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों की एक सूची तैयार करना चाहते थे जिनकी कोविड संक्रमण की वजह से मौत हुई थी तब उन्हें आधिकारिक डेटा के अभाव में अखबारों की खबरों पर भरोसा करना पड़ा। वह कहते हैं, ‘डॉक्टरों के स्वास्थ्य का उचित ब्योरा तैयार करना और उसका आकलन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे उनसे जुड़ी कल्याणकारी नीतियों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।’ नर्सों और आशा कार्यकर्ताओं के लिए भी यही तर्क दिया जा सकता है।
इंडियन नर्सिंग काउंसिल ऐक्ट (आईएनसीए) को बदलने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने नैशनल नर्सिंग ऐंड मिडवाइफरी कमीशन विधेयक, 2020 को अंतिम रूप दे दिया है। नर्स कार्यकर्ताओं ने उम्मीद जताई थी कि यह पुराने कानून की कुछ कमियों को दूर करेगा और स्वास्थ्य सेवा एवं मरीजों की देखभाल, नर्स तथा मरीज के अनुपात, स्टाफ मानक और वेतन के लिए मानदंड निर्धारित करेगा। लेकिन विधेयक इन पर मौन है। इंडियन प्रोफेशनल नर्सेज एसोसिएशन (आईपीएनए) के संयुक्त सचिव सिजू थॉमस कहते हैं, ‘महामारी के दौरान कई निजी अस्पतालों ने नर्सों के वेतन में 30 प्रतिशत तक की कटौती की जबकि कुछ सरकारी अस्पतालों ने वेतन में देरी की।’ कार्यकर्ताओं का कहना है कि नर्सें भी बदलाव महसूस करती हैं क्योंकि उन्हें अक्सर राज्य नर्सिंग आयोगों से बाहर रखा जाता है। महाराष्ट्र में यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जिबिन टीसी कहते हैं, ‘नर्सों के कल्याण से जुड़े ज्यादातर फैसले डॉक्टरों द्वारा लिए जाते हैं।’
नर्सों और आशा कार्यकर्ताओं में भी अनियमित काम की परिस्थितियों की वजह से असंतुष्टि बढ़ रही है। देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी नर्स यूनियनों में से एक ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (टीएनएआई) के अध्यक्ष रॉय जॉर्ज कहते हैं, ‘नर्सों का वेतन देश भर में सरकारी और निजी अस्पतालों में भी व्यापक रूप से अलग है। सरकार अपने हितों की रक्षा के लिए एक आम न्यूनतम वेतन क्यों नहीं निर्धारित कर सकती?’ आशा कार्यकर्ताओं को भी बेहद शोषण वाली परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। नैशनल फेडरेशन ऑफ आशा वर्कर्स (एनएफडब्ल्यू) की विजय लक्ष्मी सवाल करती हैं, ‘सरकार उन महिलाओं के कैडर से निचले स्तर तक बेहतर तरीके से स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की उम्मीद कैसे कर सकती है जिन्हें केवल ‘वॉलंटियर’ का दर्जा प्राप्त है और वे हर महीने महज 2,000-6,000 रुपये कमाती हैं? उन्हें सरकार की तरफ से 18,000 रुपये प्रतिमाह के हिसाब से न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए।’