मुआवजे की बात पर कोविड-19 टीका निर्माताओं की बंटी राय

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 9:37 AM IST

भारत का कोविड टीकाकरण अभियान 16 जनवरी को शुरू हो गया जिसके लिए सबसे पहले करीब 3 करोड़ स्वास्थ्य सेवा कार्यकर्ता और अग्रिम पंक्ति के सैन्यकर्मियों को प्राथमिकता दी जा रही है लेकिन टीका निर्माता किसी भी गंभीर प्रतिकूल घटना (एसएई) की स्थिति में मुआवजा देने के मुद्दे पर बंटे हुए नजर आते हैं। सरकार द्वारा भी मुआवजा दिए जाने या टीका के कारण किसी प्रतिकूल प्रतिक्रिया की स्थिति में टीका निर्माताओं को कोई छूट देने की संभावना नहीं है।
अहमदाबाद की कंपनी जाइडस कैडिला ने भी कहा कि इसने कानूनी मुआवजे के बिंदु पर विचार नहीं किया है जिसका डिऑक्सिरिबोन्यूक्लिक एसिड प्लाज्मिड तकनीक पर आधारित टीका जाइकोव-डी अब तीसरे चरण के परीक्षण में हैं। कैडिला हेल्थकेयर के अध्यक्ष पंकज पटेल ने कहा कि इस टीके की शुरुआत करने से पहले ही इसका गहन परीक्षण किया जाएगा और उन्हें मुआवजे का कोई कारण नजर नहीं आता है। अपने टीके में भरोसा जताते हुए पटेल ने कहा कि कंपनी ने पहले भी जो अन्य दवाओं और टीके की पेशकश की है, ठीक उसी तरह इसके किसी ज्ञात दुष्प्रभाव (जैसे बुखार, दर्द आदि) का जिक्र इसके लेबल पर किया जाएगा। नियामक ने कहा है कि टीका निर्माताओं (जिनके पास अब सीमित आपातकालीन इस्तेमाल का अधिकार है) को टीका लगाए जाने के दौरान अपने उत्पादों की फैक्टशीट (तथ्यपरक जानकारी) देनी होगी।
इससे पहले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ  इंडिया (एसआईआई) के मुख्य कार्याधिकारी और इंडियन वैक्सीन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अदार पूनावाला ने संकेत दिया था कि उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर मुआवजे वाली बात रखी थी। हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ साक्षात्कार में पूनावाला ने कहा था कि महामारी के इस दौर में क्षतिपूर्ति की शर्त से यह सुनिश्चित होगा कि टीकाकरण अभियान में कोई बाधा न आए। उन्होंने कहा था, ‘अगर कोई आदेश दिया जाता है और अदालत कहती हैं कि जांच होने तक बाकी बचे लोगों को टीके नहीं दिए जाएंगे तो इससे कई जिंदगियों पर असर पड़ेगा। इसका संबंध केवल कंपनी के वित्तीय नुकसान तक ही सीमित नहीं है। पूरा सरकारी अभियान भी रुक जाता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कुछ उच्चस्तरीय सांविधानिक शक्तियों के प्रावधान पर विचार करना होगा।’
कानूनी विशेषज्ञों ने महसूस किया कि महामारी के दौरान टीका निर्माताओं को क्षतिपूर्ति देने की मांग पर सरकार के सक्रिय होने की कोई संभावना नहीं है। एक कानून विशेषज्ञ का कहना है, ‘टीकाकरण स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं है। इसका मतलब यह है कि जब कोई टीका लेने के लिए सहमत होता है तो सहमति शामिल होती है।’ उन्होंने बताया कि एक सहमति प्रपत्र भी महत्त्वपूर्ण होगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अगर किसी को परीक्षण के तहत टीका दिया जा रहा है और उस टीके को पूर्ण मार्केटिंग का भी अधिकार नहीं मिला है तो इसका अर्थ यही लगाया जाता है कि वॉलंटियर इसके जोखिम को समझता है।
मुंबई के एक वरिष्ठ वकील का कहना है, ‘भारत बायोटेक और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के कोवैक्सीन की क्लीनिकल परीक्षण की शुरुआत हो रही है। मुझे इस बात पर संदेह है कि आईसीएमआर किसी भी प्रतिकूल गंभीर प्रतिक्रिया की स्थिति की जबावदेही के मामले में मुआवाजा देगा। सरकार के भी ऐसा करने की संभावना नहीं है। उपभोक्ता, देश के उपभोक्ता कानूनों के तहत मुआवजे की मांग कर सकते हैं। टीका देने की शुरुआत के बाद काफी अव्यवस्था और भ्रम का माहौल बन सकता है।’
चेन्नई के एक वॉलंटियर (जो एन्सेफेलोपैथी से पीडि़त थे) ने एसआईआई को कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें दावा किया गया कि उनकी बीमारी टीके की वजह से हुई और इसके बाद ही मुआवजे के मुद्दे में तेजी आई। हालांकि बाद की जांच में टीका उत्पाद की भूमिका से इनकार किया गया। कार्यकर्ताओं ने भोपाल में भारत बायोटेक के कोवैक्सीन परीक्षण इकाई पर भी सवाल उठाए जहां टीका दिए जाने के बाद एक व्यक्ति की मौत विषाक्तता के कारण हो गई।
भारत बायोटेक के कोवैक्सीन और एसआईआई के कोविशील्ड को आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिली है लेकिन अभी मार्केटिंग का अधिकार नहीं मिला है। इसका मतलब यह है कि पूर्ण अधिकार हासिल करने के लिए नियामक के पास अभी तक पर्याप्त आंकड़े पेश नहीं किए गए हैं।

First Published : January 18, 2021 | 1:39 AM IST