पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग के पहले ही दिन, यानी 28 फरवरी को, अमेरिका की घातक मिसाइल हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इससे पूरा ईरान सदमे में आ गया। काफी सोच-विचार और इंतजार के बाद, 9 मार्च को उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुन लिया गया। लेकिन एक बात सबके मन में घूम रही है कि मोजतबा के नाम के आगे ‘अयातुल्लाह’ क्यों नहीं लगा? क्या सुप्रीम लीडर बनने के लिए ये जरूरी नहीं? आइए, इसकी पड़ताल करते हैं कि शिया इस्लाम में अयातुल्लाह क्या मायने रखता है और ईरान की राजनीति में धर्म कैसे घुलमिल गया है।
शिया मुसलमानों के बीच ‘अयातुल्लाह’ एक बड़ा सम्मानजनक खिताब है। अरबी में ये ‘आयत अल्लाह’ से बना है, जिसका सीधा मतलब होता है ‘अल्लाह का निशान’। ये उन ऊंचे दर्जे के विद्वानों को दिया जाता है जो इस्लामी कानूनों की गहरी समझ रखते हैं। ऐसे लोग ‘मुज्ताहिद’ कहलाते हैं, मतलब वो खुद सोच-समझकर धार्मिक नियमों की व्याख्या कर सकते हैं।
ये खिताब सिर्फ धार्मिक मामलों के लिए है। एक अयातुल्लाह को राजनीति में पड़ना जरूरी नहीं, और न ही हर नेता को अयातुल्लाह होना पड़ता है। लेकिन ईरान में ये चीजें आपस में जुड़ गई हैं। यहां राजनीति और धर्म एक-दूसरे से इतने करीब हैं कि कभी-कभी फर्क समझना मुश्किल हो जाता है। मिसाल के लिए, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से सुप्रीम लीडर का पद धार्मिक विद्वान से जुड़ा हुआ है।
1979 में जब ईरान में क्रांति आई, तो अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी पहले सुप्रीम लीडर बने। उनकी मौत के बाद, 1989 में अली खामेनेई को चुना गया, जो उस वक्त ईरान के राष्ट्रपति थे। लेकिन तब अली खामेनेई अयातुल्लाह नहीं थे, बल्कि होज्जतोलिस्लाम का दर्जा रखते थे। होज्जतोलिस्लाम का मतलब होता है ‘इस्लाम का प्रमाण’ या ‘इस्लाम पर अधिकार’। ये अयातुल्लाह से नीचे का स्तर है।
फिर भी, अली खामेनेई को क्यों चुना गया? शायद इसलिए क्योंकि वो खुमैनी के करीबी थे और 1981 से 1989 तक राष्ट्रपति रहकर लोगों के बीच मशहूर हो चुके थे। कई बड़े धार्मिक नेता उनसे ऊपर थे, लेकिन सुप्रीम लीडर बनने के लिए राजनीतिक तजुर्बा और करीबियत ने काम किया। शुरू में ईरान के संविधान में सुप्रीम लीडर के लिए ‘मरजा’ होना जरूरी था, जो बहुत ऊंचा धार्मिक पद है। लेकिन अली खामेनेई को चुनने के बाद 1989 में संविधान बदल दिया गया। ‘मरजा’ की शर्त हटा ली गई, ताकि कम दर्जे का क्लेरिक भी सुप्रीम लीडर बन सके। उसके बाद अली खामेनेई को स्थायी नेता बना दिया गया।
शिया इस्लाम में अयातुल्लाह से भी ऊंचे पद हैं। सबसे बड़ा है ग्रैंड अयातुल्लाह, जिसे अयातुल्लाह अल-उज्मा भी कहते हैं। ये बहुत अनुभवी विद्वान होते हैं। और फिर आता है ‘मरजा’, जिसका मतलब है ‘अनुसरण का स्रोत’। ‘मरजा’ वो होता है जिसकी धार्मिक राय को लाखों लोग मानते हैं और अपनी जिंदगी में अपनाते हैं।
ग्रैंड अयातुल्लाह अक्सर ‘मरजा’ का काम भी करते हैं, और उनके फॉलोअर्स कई देशों में फैले होते हैं। जैसे, भारत का कोई शिया मुसलमान ईरान या इराक के ग्रैंड अयातुल्लाह की बात मान सकता है। आज ईरान में कई ग्रैंड अयातुल्लाह हैं, जिनकी पहचान पूरी शिया दुनिया में है। ये लोग धार्मिक फैसले लेते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि राजनीति में पड़ें।
शिया इस्लाम में एक बड़ा अयातुल्लाह क्या कर सकता है? वो पढ़ा सकता है, उपदेश दे सकता है, कानूनी राय जारी कर सकता है, मदरसों की देखभाल कर सकता है और लोगों को राह दिखा सकता है। अगर वो ‘मरजा’ या ग्रैंड अयातुल्लाह है, तो उसकी पहुंच और भी ज्यादा होती है। उसके फॉलोअर्स खुद उसकी बातें अपनाते हैं, चाहे वो पूजा के तरीके हों या कानूनी मसले।
लेकिन अयातुल्लाह का पद पोप जैसा नहीं है। वो पूरी शिया दुनिया पर राज नहीं करता। शिया इस्लाम बहुत बिखरा हुआ है। एक ही समय में कई बड़े अयातुल्लाह और ‘मरजा’ हो सकते हैं, जिनके चाहने वाले ईरान, इराक, लेबनान, खाड़ी देशों, साउथ एशिया, यूरोप और अमेरिका में फैले होते हैं। कोई एक केंद्र नहीं है जो सबको कंट्रोल करे।
शिया इस्लाम में क्लेरिक बनना आसान नहीं। इसमें कई स्तर हैं, जैसे सीढ़ियां चढ़ना। सबसे नीचे तलबेह होते हैं, जो मदरसे में पढ़ने वाले स्टूडेंट हैं। फिर आता है होज्जतोलिस्लाम, जो मिडिल लेवल का क्लेरिक है। उसके बाद अयातुल्लाह, जो सीनियर क्लेरिक और मुज्ताहिद होता है। फिर ग्रैंड अयातुल्लाह, जो बहुत ऊंचा विद्वान है। और सबसे टॉप पर ‘मरजा अल-तकलीद’, जो लोगों के लिए धार्मिक गाइड होता है।
अयातुल्लाह बनने के लिए क्या लगता है? सबसे पहले लंबी पढ़ाई, जिसमें सालों लग जाते हैं। क्लेरिक अरबी, कुरान, हदीस, कानून, थ्योरी, धर्मशास्त्र, लॉजिक और फिलॉसफी पढ़ते हैं। फिर मुज्ताहिद की पहचान मिलती है, मतलब वो खुद कानून की व्याख्या कर सकें। इसके अलावा, अच्छी रेपुटेशन जरूरी है। क्लेरिक एडवांस क्लास पढ़ाते हैं, किताबें लिखते हैं, राय देते हैं और स्टूडेंट्स को आकर्षित करते हैं।
शिया व्यवस्था थोड़ी बिखरी हुई है, इसलिए यहां किसी पद पर पहुंचने के लिए सबसे जरूरी चीज है नाम और पहचान बनाना। जब मदरसों के विद्वान और आम लोग किसी धार्मिक विद्वान को अयातुल्लाह मानने लगते हैं, तभी उसे यह दर्जा मिलता है। यह खिताब 20वीं सदी में ज्यादा लोकप्रिय हुआ और अब पहले की तुलना में ज्यादा लोगों को दिया जाता है।
वहीं ‘मरजा’ बनना इससे भी कठिन है। इसके लिए किसी विद्वान को सबसे बड़ा और जानकार इस्लामी जुरिस्ट माना जाना पड़ता है। अंत में लोग खुद तय करते हैं कि वे किस मरजा की धार्मिक राय और मार्गदर्शन को मानेंगे।
अभी मोजतबा खामेनेई अयातुल्लाह नहीं हैं। उनका दर्जा होज्जतोलिस्लाम है, जो अयातुल्लाह से नीचे है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि आगे उनका पद ऊंचा किया जा सकता है। ईरान की कई मीडिया वाली जगहों पर उन्हें पहले से अयातुल्लाह कहकर पुकारा जा रहा है। ये दिखाता है कि ईरान में धार्मिक पद राजनीतिक जरूरतों से प्रभावित हो सकते हैं।
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ईरान का संविधान कहता है कि जब हिडन इमाम (शिया मान्यता में एक छिपा हुआ लीडर) मौजूद नहीं, तो देश को एक न्यायप्रिय और जानकार इस्लामी जुरिस्ट चलाए। ये आर्टिकल 5 में लिखा है। आर्टिकल 107 और 109 में बताया गया है कि असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स योग्य धार्मिक विद्वानों में से सुप्रीम लीडर चुनती है।
इन विद्वानों में गहरी धार्मिक जानकारी के साथ न्याय, राजनीतिक समझ, हिम्मत और मैनेजमेंट स्किल्स होनी चाहिए। ये पूरा सिस्टम वेलायत-ए फकीह पर आधारित है, जिसे अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी ने बनाया। 1979 की क्रांति के बाद ये ईरान की राजनीति का बेस बन गया।
व्यवहार में, सुप्रीम लीडर को सेना, बड़े अपॉइंटमेंट्स और अहम नीतियों पर पूरा कंट्रोल मिलता है। ये पद क्लेरिकल सिस्टम से जुड़ा है, लेकिन अब कम दर्जे वाले भी इसे संभाल सकते हैं, जैसे अली खामेनेई के केस में हुआ।
इराक का नजफ शिया पढ़ाई का सबसे पुराना केंद्र है। यहां के क्लेरिक्स ज्यादातर धार्मिक और नैतिक मसलों पर बात करते हैं, लेकिन सरकारी कामों से दूर रहते हैं। वो समाज को गाइड करते हैं, राजनीति में नहीं उलझते।
दूसरी तरफ, ईरान का कोम शहर 1979 की क्रांति के बाद राजनीति से जुड़ गया। ये ईरान के अंदर शिया पढ़ाई का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। यहां से निकले विचार ईरान की राजनीति और धर्म को शेप देते हैं। दोनों जगहों की सोच अलग है, लेकिन शिया दुनिया पर असर डालती हैं।
ईरान में शिया क्लेरिकल पावर को स्टेट पावर से जोड़ दिया गया है। यहां धर्म और राजनीति एक हो गए हैं। लेकिन बाकी शिया कम्युनिटीज में ऐसा नहीं है। ज्यादातर जगहों पर अयातुल्लाह सिर्फ धार्मिक गाइड होते हैं, राजनीतिक बॉस नहीं।
अयातुल्लाह असल में इस्लामी कानून और धर्मशास्त्र के बड़े विद्वान होते हैं। ईरान ने इसे राजनीतिक लीडरशिप में बदल दिया, लेकिन दूसरे शिया समाजों में वो सिर्फ धार्मिक रोल निभाते हैं। ये फर्क दिखाता है कि शिया इस्लाम कितना विविध है।