अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने का फैसला किया है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान के साथ कारोबार जारी रखेगा, उसे अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने इस अभियान को ‘इकोनॉमिक डी-डे’ नाम दिया है। इसका मकसद ईरान को आर्थिक और वित्तीय रूप से अलग-थलग करना है।
बेसेंट के मुताबिक, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दुनिया के कई नेताओं से फोन पर बात कर रहे हैं। ट्रंप इन देशों से ईरानी सरकार के साथ अपने कारोबारी और आर्थिक संबंध खत्म करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए देशों को एक तय समयसीमा दी जाएगी। जो देश इस समयसीमा के भीतर ईरान से अपने संबंध नहीं तोड़ेंगे, उन पर अमेरिका एकतरफा प्रतिबंध लगा सकता है।
बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ईरान के दुनिया भर में मौजूद वित्तीय संबंधों के खिलाफ बड़ा आर्थिक अभियान शुरू कर रहा है। उनका लक्ष्य ईरानी सरकार पर इतना आर्थिक दबाव बनाना है कि वह अपनी नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर हो।
यह अमेरिका की ओर से ईरान पर दबाव बढ़ाने की नई कोशिश है। ईरान ने अब तक अमेरिकी मांगों के आगे झुकने से इनकार किया है। फरवरी के अंत से दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव और अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान ने अपना रुख नहीं बदला है। ईरान पहले से ही कई वर्षों से अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।
इस कदम से यह भी संकेत मिलता है कि राष्ट्रपति ट्रंप अब इस युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं। अमेरिका में लंबे समय से जारी युद्ध को लेकर असंतोष बढ़ रहा है और नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में युद्ध को खत्म करने का दबाव ट्रंप प्रशासन पर लगातार बढ़ रहा है।
अमेरिका के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट की ईरान के खिलाफ नई प्रतिबंध नीति से वहां की सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है, लेकिन यह साफ नहीं है कि इससे ईरान हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ ढीली करेगा या नहीं। यह समुद्री रास्ता दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है।
क्लेयर ओ’नील मैकक्लेस्की, पूर्व अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारी और Clarity Compliance Consulting की सह-संस्थापक, ने कहा कि फिलहाल अमेरिका की घोषणा 2020 से ट्रेजरी विभाग के पास मौजूद अधिकारों के तहत अतिरिक्त सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की धमकी जैसी दिखाई देती है।
उनके मुताबिक, इन प्रतिबंधों का असर ईरान को उसके कुछ कारोबारी साझेदारों से और दूर करने के रूप में दिख सकता है, लेकिन इससे ईरान अपने रुख में कितना बदलाव करेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
अमेरिका की नई चेतावनी से चीन के साथ तनाव बढ़ने का खतरा भी है। चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और अब तक उसने ईरान से तेल खरीदना बंद नहीं किया है।
बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के कारोबारी साझेदारों पर तुरंत कार्रवाई इसलिए नहीं की है क्योंकि वह सभी देशों को अपना व्यवहार बदलने का मौका देना चाहता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला कदम नहीं उठाना चाहता।
अमेरिका ने सोमवार को 60 से ज्यादा संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए। इनका फोकस ईरान की अर्थव्यवस्था के पांच अहम क्षेत्रों पर है। इनमें डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग शामिल हैं। बेसेंट ने ईरान से संबंध रखने वाली एक बड़ी वित्तीय संस्था पर इस सप्ताह के अंत तक प्रतिबंध लगाने की भी चेतावनी दी, हालांकि उसका नाम नहीं बताया।
जेनिफर वेल्च और एडम फरार, Bloomberg Economics के विश्लेषकों, ने कहा कि बेसेंट की घोषणा के बाद कई बड़े सवाल अभी भी बने हुए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए चीन के साथ चल रहे नाजुक व्यापार समझौते को जोखिम में डालेगा।
दोनों विश्लेषकों के मुताबिक, असली परीक्षा यह होगी कि क्या अमेरिका उन देशों पर वास्तव में प्रतिबंध लगाता है जो ईरान के साथ अपने संबंध खत्म नहीं करते। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या अमेरिका चीन की बड़ी वित्तीय और ऊर्जा कंपनियों को निशाना बनाता है।
जब बेसेंट से पूछा गया कि क्या अमेरिका ईरान के साथ कारोबार में मदद करने वाले बड़े चीनी बैंकों को प्रतिबंधों के दायरे में ला सकता है, तो उन्होंने कहा कि कोई भी अमेरिकी प्रतिबंधों से ऊपर नहीं है। हालांकि, उन्होंने चीन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया और कहा कि इस मामले में ‘शांत कूटनीति’ सबसे बेहतर रास्ता है।
ईरान ने अमेरिकी चेतावनी के सामने झुकने के संकेत नहीं दिए हैं। अमेरिका के साथ बातचीत में ईरान के प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने सोशल मीडिया पर अमेरिका की धमकियों को खारिज किया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को और सीमित कर सके।
अप्रैल में स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ ‘इकोनॉमिक फ्यूरी’ अभियान की घोषणा की थी। उस समय भी अमेरिकी प्रशासन ने ईरान की गतिविधियों का समर्थन करने वाली विदेशी वित्तीय संस्थाओं पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी।
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी पहले कह चुके हैं कि ईरान का तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जाएंगे। हालांकि, उस समय इस धमकी को बड़े स्तर पर लागू नहीं किया गया था।
स्कॉट बेसेंट ने नई प्रतिबंध नीति की तुलना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नॉर्मंडी लैंडिंग से की थी। उनका कहना था कि यह ईरान के खिलाफ बड़े आर्थिक अभियान की शुरुआत है।
हालांकि, डेनियल फ्राइड, पूर्व अमेरिकी राजनयिक और Atlantic Council से जुड़े विशेषज्ञ, ने इसे वास्तविक ‘डी-डे’ मानने से इनकार किया। उनके मुताबिक, अमेरिका ने अभी सिर्फ बड़ी कार्रवाई की तैयारी की चेतावनी दी है। उनके अनुसार वास्तविक ‘डी-डे’ तब होगा जब अमेरिका इन धमकियों को बड़े स्तर पर लागू करेगा।
बेसेंट के बयान के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में पहले की गिरावट बनी रही। S&P 500 करीब 0.3 फीसदी गिरा। वहीं, डॉलर मजबूत हुआ और Bloomberg Dollar Spot Index में करीब 0.2 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।
अमेरिका के 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड करीब 4.70 फीसदी पर बनी रही।