प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को तथाकथित ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ में गंभीर लापरवाही की तरफ इशारा किया। न्यायालय ने कहा कि ऐसे कुछ मामले तो इसलिए होते हैं क्योंकि इनमें बैंक अधिकारियों की ही मिलीभगत लगती है। न्यायालय ने कहा कि ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ जैसे मामलों से बैंकिंग तंत्र में लोगों का विश्वास कमजोर होता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची और न्यायाधीश जस्टिस एन वी अंजारिया के पीठ ने धोखाधड़ी से होने वाला नुकसान रोकने और ठगी गई रकम की वसूली के लिए जांच, नियामक और कार्यकारी एजेंसियों के बीच सख्त समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। न्यायालय का पीठ डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों की बढ़ती घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई कर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बैंक जमाकर्ताओं की रकम के संरक्षक हैं इसलिए वे अपने व्यवहार में लापरवाही नहीं बरत सकते या अति उत्साह का शिकार नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि न्यायालय के समक्ष आए कई मामले ऐसे हैं जिनमें अधिकारियों और जालसाजों के बीच सांठगांठ प्रतीत होती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों को रोकने में बैंकों की विफलता अक्सर जालसाजों के लिए ऋण तक पहुंच और बाद में विवाद दिवालियापन मंचों पर ले जाना आसान बना देती है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा,‘हमने देखा है कि बैंक अधिकारी डिजिटल गिरफ्तारी के इन मामलों में आरोपियों के साथ पूरी तरह से मिले हुए हैं।’
उन्होंने कहा,‘ये मामले बैंकों की साख पर चोट कर रहे हैं। बैंकों को पता होना चाहिए कि वे अपने ग्राहकों के संरक्षक हैं और उन्हें पूरे होश में काम करना चाहिए। वे ग्राहकों के विश्वास को नहीं तोड़ सकते। समस्या यह है कि ये बैंक इन धोखेबाजों को ऋण देते हैं और फिर मामले फिर एनसीएलटी, एनसीएलएटी में पहुंच जाते हैं।’
शीर्ष न्यायालय की यह टिप्पणी महाधिवक्ता आर वेंकटरमणी द्वारा न्यायालय को यह जानकारी देने के बाद आई कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अनिवार्य सुरक्षा उपायों को लागू करते समय बैंकों को अवैध धन की हेराफेरी करने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई ‘खच्चर’ खातों का पता लगा था।
शीर्ष न्यायालय ने पिछले साल अक्टूबर में एक वरिष्ठ नागरिक दंपती के पत्र के बाद इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया था। उस पत्र में कहा गया था कि उन्हें जांच एजेंसियों और न्यायपालिका के अधिकारी होने का दावा कर धोखेबाजों ने 1.5 करोड़ रुपये ठग लिए। दिसंबर 2025 में न्यायालय ने इस तरह के घोटालों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर जांच का आदेश दिया था।
सोमवार को सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि केंद्र ने डिजिटल गिरफ्तारी धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई का समन्वय करने के लिए एक अंतर-विभागीय समिति का गठन किया है। यह भी बताया गया कि सीबीआई ने अब तक ऐसे मामलों से जुड़ी लगभग 10 करोड़ रुपये की आय की पहचान की है और बैंकों ने संदिग्ध लेनदेन को चिह्नित करने के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) उपकरणों को तैनात करना शुरू कर दिया है। पीठ ने दोहराया कि रोकथाम और उठाए गए कदमों में पूरा तालमेल होना चाहिए।
पीठ ने सीबीआई को डिजिटल गिरफ्तारी मामलों का पता लगाने को कहा और आरबीआई को बैंकों के स्तर पर कार्रवाई शुरू करने और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को ऑनलाइन मध्यस्थों द्वारा समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा,‘हम सीबीआई को डिजिटल गिरफ्तारी मामलों की पहचान करने, आरबीआई को जारी करने वाले बैंक के अंत में कदम उठाने और उचित कदम उठाने का निर्देश देते हैं। इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को समयबद्ध अनुपालन के लिए मध्यस्थों के साथ लगातार पता लगाने का निर्देश दिया जाता है।’
न्यायालय को यह भी बताया गया कि ऑनलाइन धोखाधड़ी के बाद उठाए गए कदमों को सुव्यवस्थित करने के लिए एक मसौदा समझौता ज्ञापन और एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार हुए हैं।
इसका संज्ञान लेते हुए पीठ ने चार सप्ताह के भीतर समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप देने का आदेश दिया। न्यायालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को 2 जनवरी 2026 की आरबीआई की एसओपी को औपचारिक रूप से अपनाने और पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया और एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय के लिए दो सप्ताह के भीतर आवश्यक नियमों को अधिसूचित करने के लिए कहा।