राजनीतिक घटनाक्रम, बदलते नियमों और कारोबार में आते परिवर्तनों के कारण गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और सूक्ष्म वित्त संस्थान (एमएफआई) अब पारंपरिक माइक्रोफाइनैंस उधारी से इतर कारोबार बढ़ा रहे हैं। ऋणदाता अब माइक्रोफाइनैंस पर केंद्रीकरण कम करने के लिए तेजी से एमएसएमई ऋण, संपत्ति के बदले ऋण (एलएपी), किफायती आवास ऋण और वाहन ऋण क्षेत्र में विस्तार कर रहे हैं।
उद्योग के जानकारों ने कहा कि नियामक बदलाव के अलावा कई राज्यों में सामाजिक-राजनीतिक माहौल की वजह से विविधीकरण हो रहा है। माइक्रोफाइनैंस ऋणदाता पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, असम और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर काम करते हैं, जहां राज्य सरकारों ने एमएफआई को विनियमित करने और जबरदस्ती वसूली की घटनाओं पर काबू करने के लिए कानून पेश किए हैं।
क्रेडिटएक्सेस ग्रामीण, सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क, स्पंदन स्फूर्ति फाइनैंशियल और आरोहण फाइनैंशियल सर्विसेज जैसे बड़े खिलाड़ियों ने पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे मिलते जुलते उधारी खंडों में विस्तार किया है।
सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर एचपी सिंह ने वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के परिणाम की घोषणा के बाद कहा कि माइक्रोफाइनैंस क्षेत्र के परिपक्व होने के साथ ही विविधीकरण की प्रवृत्ति तेज होने की संभावना है।
उन्होंने कहा, ‘एमएफआई की प्रबंधन के तहत संपत्ति (एयूएम) में वृद्धि लगभग 10-15 प्रतिशत होने की उम्मीद है, जबकि सहायक कंपनियों (सैटिन हाउसिंग फाइनैंस और सैटिन फिनसर्व) में 40-50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इतनी ही वृद्धि जारी रहेगी। हम बहुत सतर्क रहकर वृद्धि चाहते हैं। हम अपनी सहायक कंपनियों को काफी मजबूती से बढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है कि हमारे माइक्रोफाइनैंस ऋण में 10 से 15 प्रतिशत वृद्धि सतर्कतापूर्ण और बेहतर है।’
एक प्रमुख एनबीएफसी-एमएफआई के वरिष्ठ कार्यकारी ने कहा कि चुनाव के दौरान ऋण माफी या उधार लेने वालों को सुरक्षा देने के राजनीतिक बयानों से ऋण वसूली प्रभावित हो सकती है और कर्ज चुकाने के अनुशासन पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, ‘माइक्रोफाइनैंस का कामकाज वहां के राजनीतिक माहौल से निकटता से जुड़ा हुआ है। उधार लेने वालों को राहत या विनियमन को लेकर कोई भी बयानबाजी कर्ज चुकाने के व्यवहार पर सीधा असर डाल सकती है।’
हाल ही में बिहार सरकार ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) पर एक कानून पारित किया है जिसका उद्देश्य माइक्रोफाइनैंस ऋणदाताओं की निगरानी को सख्त करना और उधार लेने वालों को जबरदस्ती वसूली की गतिविधियों से बचाना है। इससे पहले, कर्नाटक और तमिलनाडु ने भी इसी तरह के कानून पारित किए थे। इसके अलावा माइक्रोफाइनैंस क्षेत्र में ऋण लेने वाले अत्यधिक कर्ज से दबे होने और क्षेत्रीय व्यवधानों से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि चूंकि माइक्रोफाइनैंस ऋण आमतौर पर असुरक्षित होते हैं और समान उधारकर्ता समूहों के बीच केंद्रित होते हैं, इसलिए पुनर्भुगतान के रुझान कमजोर होने पर ऋणदाताओं को अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है।
एक अन्य प्रमुख एनबीएफसी-एमएफआई के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘चूंकि हम असुरक्षित खंड में काम करते हैं, इसलिए हमें ब्याज की उच्च दर वसूलनी होगी, क्योंकि यह मॉडल इसी तरह काम करता है। लेकिन कानूनों, जलवायु संबंधी मुद्दों (बाढ़ आदि) के रूप में लगातार आ रही समस्याओं के कारण संरचनात्मक रूप से एमएफआई की वृद्धि व मुनाफा कम रहा है।’इसकी वजह से एनबीएफसी-एमएफआई ने अपने कुल पोर्टफोलियो में माइक्रोफाइनैंस ऋण की हिस्सेदारी कम करना शुरू कर दिया है। उद्योग के लोगों ने कहा कि अब एनबीफसी एमएसएमई उधारी, गोल्ड लोन, संपत्ति के बदले लोन, किफायती आवास के लिए लोन और वाहन फाइनैंसिंग जैसे सुरक्षित ऋण खंडों का विस्तार कर रहे हैं।
उद्योग के जानकारों ने कहा कि अधिकांश एनबीएफसी-एमएफआई के लिए माइक्रोफाइनैंस मुख्य व्यवसाय बना रहेगा, लेकिन कुल पोर्टफोलियो में ऐसे ऋणों की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही है।
क्रेडिटएक्सेस ग्रामीण के सीईओ और एमडी गणेश नारायणन ने वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के परिणामों की घोषणा के वक्त कहा, ‘हमने अपने मध्यम अवधि के लक्ष्य में संकेत दिया था कि माइक्रोफाइनैंस की वृद्धि दर कम रहेगी और बाकी वृद्धि खुदरा से आएगा। खुदरा क्षेत्र हमारी उम्मीदों से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। यह संभव है कि खुदरा व़ृद्धि हमारी अपेक्षा से कुछ अधिक रहेगी।’
उद्योग के विशेषज्ञों ने कहा कि सुरक्षित और अर्ध सुरक्षित खंडों में विविधीकरण से बैलेंस शीट स्थिरता में सुधार, ग्राहक संबंधों का विस्तार और माइक्रोफाइनैंस क्षेत्र में राजनीतिक या आर्थिक व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता कम होने की उम्मीद है।’