बीएस बातचीत
कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद अर्थव्यवस्था व बाजारों में बदलाव हो रहा है, ऐसे में लंदन के अशमोर समूह के शोध प्रमुख जॉन डेन ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में कहा कि विदेशी निवेशक मुख्य रूप से अमेरिकी बाजार पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं क्योंकि वहां टीकाकरण में काफी प्रगति हुई है। लेकिन भारत व उभरते बाजारों में जब टीकाकरण रफ्तार पकड़ेगा तो इसमें बदलाव होगा और आर्थिक सुधार में मजबूती आएगी। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश…
वैश्विक बाजारों के लिहाज से भारतीय इक्विटी कितनी आकर्षक नजर आ रही है?
भारतीय इक्विटी काफी आकर्षक है, मुख्य रूप से फंडामेंटल आधार पर। भारत कोरोना वायरस के डेल्टा संस्करण को उम्मीद से ज्यादा बेहतरी के साथ काबू करने में सफलता पाई है, जो ज्यादा आर्थिक गतिविधियों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है और यह आय को सहारा देगा। मूल्यांकन हालांकि सख्त है, लेकिन यह हर जगह का मामला है लेकिन विदेशी निवेशकों की पोजिशनिंग भारत में अपेक्षाकृत मामूली है और फंडामेंटल को लेकर परिदृश्य ठोस है। पिछले कुछ महीनों से भारत में खरीदारी का माहौल मिड व स्मॉलकैप में रहा है। इन दोनों क्षेत्रों में और बढ़त की क्षमता है क्योंंकि आर्थिक सुधार व्यापक हो रहा है। खुदरा निवेशकों के बीच उल्लास का माहौल चिंताजनक है। लेकिन यह पूरी दुनिया का मामला है।
भारतीय इक्विटी में विदेशी निवेश को लेकर आगे की राह?
मेरा अनुमान है कि उभरते बाजारों में निवेश जारी रहेगा, हालांकि इसकी रफ्तार धीमी होगी और सामान्य रिकवरी के मुकाबले अनिश्चित होगी। मात्रात्मक सहजता की नीतियों के कारण पैदा हुए अवरोध के कारण वैश्विक पूंजी को उभरते बाजारों की ओर जाने की दरकार होगी, जिसने भारी-भरकम सब्सिडी के तौर पर काम किया है और जिसने अमेरिकी स्टॉक की पूंजी सोख ली और यूरोपीय फिक्सड इनकम को भी सोख लिया। ये दोनों बाजार काफी महंगे हैं और उभरते बाजारों के लिए और रकम है। हालांकि कई निवेशक सोचते हैं कि उभरते बाजार जोखिम भरे हैं।
क्या तेल की मजबूत कीमतें अगले कुछ महीने में भारतीय इक्विटी को पटरी से उतार देगी?
मैं इसे अहम जोखिम के तौर पर नहीं देखता। जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी काफी हद तक अस्थायी वजहोंं से हुई है। लॉकडाउन में ढील के बाद मांग में आपूर्ति के मुकाबले तेजी से सुधार हुआ है, जिससे कीमतें बढ़ी हैं लेकिन ऊंची कीमतें जल्द ही आपूर्ति से नरम पड़ेगी, जो बाजार को संतुलन लाने और कीमतें स्थिर करने में मदद करेगा। यह लंबे समय की समस्या नहीं है।
आप किन क्षेत्रों पर ओवरवेट हैं और किन पर अंडरवेट?
वित्त वर्ष 22 की आय को लेकर हमारा नजरिया काफी सकारात्मक है और यह 20 फीसदी से ज्यादा रहेगा, जिसकी अगुआई वित्तीय क्षेत्र, मैटीरियल और इंडस्ट्रियल करेंगे। हम वित्तीय क्षेत्र व इंडस्ट्रियल और फार्मा पर ओवरवेट हैं। साथ ही आईटी सेवाओं पर भी हमारा नजरिया कुछ-कुछ ओवरवेट का है।
क्या साल 2021 बैकों का साल होगा क्योंकि आर्थिक रिकवरी रफ्तार पकड़ रही है?
बैंकों को दो स्थितियों में फायदा होता है – जब आर्थिक गतििवधियोंं मे तेजी के कारण कर्ज की मांग बढ़ती है और जब यील्ड कर्व तीव्र होता है, ऐसे में वे जमाओं के लिए करने वाले भुगतान के मुकाबले ज्यादा कीमत पर उधारी दे सकते हैं। ऐसे में बैंक बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
क्या बाजारों व कोविड से प्रभावित क्षेत्रों को सरकारी नीतियों ने निराश किया है?
राजकोषीय मोर्चे पर सरकार काफी सख्त स्थिति में थी, ऐसे में यह कुछ हद तक अवरोधित हुआ। वैश्विक स्तर पर क्रेडिट एजेंंसियां डरी हुई हैं कि अगर भारत सरकार ने ज्यादा खर्च किया तो राजकोषीय घाटा दो अंकों में होगी, जिसका मतलब यह है कि लक्षित राहत और खाद्य व नकदी सहायता संवेदनशील नीतियों के तहत दी गई। विभिन्न स्तर पर सरकार अब आक्रामकता के साथ टीकाकरण बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जो कोविड पर लगाम कसने के लिए आवश्यक है। नीतिगत मोर्चे पर सिर्फ एक आलोचना यह है कि सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर का अनुमान नहीं लगाया और वह टीकाकरण में पहले ही तेजी ला सकती थी और दूसरी लहर के लिए बेहतर तैयारी कर सकती थी। उदाहरण के लिए ऑक्सीजन की किल्लत को आसानी से दूर किया जा सकता था, अगर भारत दूसरी लहर की तैयारी करती। सामान्य तौर पर नीतिगत मोर्चे पर सरकार का इरादा कारोबारों से कम जुडऩे का होना चाहिए, जैसा कि बजट में कहा गया है।