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ग्रोथ व वैल्यू हैं निवेश के दो तरीके

Last Updated- December 09, 2022 | 4:46 PM IST

ग्रोथ व वैल्यू हैं निवेश के दो तरीके

 

फंड प्रश्नोत्तरी

 

बीएस संवाददाता /  January 04, 2009

 

 

 

कृपया ग्रोथ फंड और वैल्यू फंड के बीच फर्क समझाएं?

 

एमवी राव

 

ग्रोथ और वैल्यू शेयरों में निवेश के दो मूलभूत नजरिए हैं। ग्रोथ आधारित निवेश उन शेयरों में निवेश किया जाता है जिनसे जबरदस्त आशाएं होती हैं और उम्मीद की जाती है कि यह बाकियों से तेज बढ़ेंगे।

ऐसे शेयरों की कीमत ज्यादा होती है। दूसरी ओर वैल्यू इनवेस्टिंग में उन शेयरों में निवेश किया जाता है जो अंडरवैल्यूड होते हैं और जिनकी कैपिटल बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है लेकिन निवेशकों में ज्यादा आकर्षण का केंद्र नहीं होते।

हमारा सवाल ट्रेलिंग कमीशन पर है। अगर किसी ने सीधे निवेश किया है और शुरुआती निवेश के बाद भी एजेंट को इंट्रोडयूस नहीं किया है तो क्या ऐसे मामलों में भी ट्रेलिंग कमीशन लगेगा?

क्या एजेंट को कमीशन एएमसी की इनकम से दिया जाएगा या मेरे निवेश से? मैं जानना चाहूंगा कि हमारे एकाउंट स्टेटमेंट में एक्सपेंस (खर्च) का अनुपात कैसे दिखाया जाता है। क्या यह शुरुआती निवेश के बाद हर साल हमारे निवेश पर लगता है और क्या इस अनुपात का हमारे पर असर पड़ता हैं?

सतीश सुतारिया

अगर आप शुरुआती निवेश में भी सीधे निवेश करते हैं और किसी एजेंट को नहीं शामिल करते तो आपके निवेश से कोई किसी को कोई ट्रेल कमीशन देने की जरूरत नहीं। ट्रेल कमीशन एएमसी की इनकम से नहीं दिया जाता बल्कि स्कीम से पूल आधार पर लिया जाता है।

लिहाजा, आपके डायरेक्ट निवेश से बचे ट्रेल कमीशन का फायदा सभी निवेशकों को भी मिलता है।  अब आपके सवाल पर आते हैं एक्सपेंस रेशियो एकाउंट स्टेटमेंट में नहीं दिखाया जाता।

इसमें स्कीम के संचालन से जुड़ी फीस और खर्च शामिल किए जाते हैं और इसे एनएवी से घटा दिया जाता है। आप सीधे निवेश करें या एजेंट के जरिए आपके एक्सपेंस रेशियो पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

मैने रिलायंस नैचुरल रिसोर्सेस फंड में एनएफओ के दौरान जनवरी 2008 में दस हजार का निवेश किया था। उस समय उन्होंने 2.25 फीसदी का एंट्री लोड लिया था, हालांकि हमने सुना था कि स्कीम पर कोई एंट्री लोड नहीं होगा। कृपया बताएं। 

अशोक कुमार

रिलायंस नैचुरल रिसोर्सेस फंड में दो करोड़ के नीचे के निवेश पर एंट्री लोड 2.25 फीसदी है। बिना एजेंट के सीधे निवेश करने पर कोई भी फंड एंट्री लोड नहीं लगता। लिहाजा अगर आपने किसी ब्रोकर के जरिए निवेश किया है तो लोड लगेगा अन्यथा नहीं।

अगर हम किसी ईएलएसएस स्कीम में अतिरिक्त खरीदारी करते हैं तो क्या खरीद की तारीख से आगे के तीन साल के लिए उसे रखना जरूरी होगा?                

जे शिवरामप्रसाद

जी हां, अगर आप ईएलएसएस में अतिरिक्त यूनिट खरीदते हैं तो आपको अतिरिक्त यूनिट खरीद की तारीख से तीन साल के लिए रखनी होंगी। लेकिन जो यूनिट आपने पहले से ले रखी हैं उन्हे उनकी खरीद के तीन साल पूरे होने पर भुनाया जा सकता है।

मैं ईटीएफ को समझना चाहता हूं। एनएफओ के बाद ईटीएफ स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेड होते हैं तो इससे एएमसी को कैसे लाभ होता है?  इसकी एनएवी कैसे घोषित होती है?

आशीष आहूजा

एक ईटीएफ पोर्टफोलियो के मामले में इंडेक्स फंड जैसा होता है। बॉस्केट ऑफ स्टॉक्स उसी अनुपात में होता है जैसा पहले से तय इंडेक्स में होता है। शुरुआत में हिस्सेदार फंड को बास्केट ऑफ स्टॉक्स देते हैं और बदले में एक्सचेंज में फंड के यूनिट लेते हैं।

यह यूनिट फिर शेयर बाजार में ब्रोकरों के जरिए ट्रेड होते हैं। लिहाजा, जिन निवेशकों को ईटीएफ में यूनिट लेने होते हैं, उन्हें डीमैट खाता खोलना जरूरी होता है।

ईटीएफ के भाव अंडरलाइंग इंडेक्स (जिस इंडेक्स में वे हैं)के साथ चढ़ते उतरते हैं। एनएवी आमतौर पर इंडेक्स की वैल्यू का एक हिस्सा होती है, जैसे दसवां हिस्सा या सौवां हिस्सा।

लेकिन ये जिस भाव पर ट्रेड होते हैं, वह मांग और आपूर्ति से तय होता है। लिहाजा ईटीएफ प्रीमियम पर या डिस्काउंट पर ट्रेड हो सकता है।

ईटीएफ से एएमसी को फायदा वैसे ही होता है जैसे दूसरे म्युचुअल फंडों को होता है। लेकिन चूंकि यह एक इंडेक्स को ट्रैक करता है, इसे पोर्टफोलियो के प्रबंधन की उस तरह जरूरत नहीं पड़ती।

ब्याज दरों में मौजूदा गिरावट को देखते हुए क्या छह माह के लिए गिल्ट फंड में निवेश बैंक की एफडी से बेहतर निवेश होगा? एक से तीन साल की एफडी (टैक्स के बाद) में 6.67 फीसदी का रिटर्न मिलेगा और जैसा कि बताया जाता है गिल्ट फंडों में अच्छा रिटर्न मिलता है।

गिल्ट फंड में क्या कोई अतिरिक्त जोखिम होता है? या फिर रिडेम्पशन के दबाव में इसमें कोई तरलता का संकट रहता है?

पार्थन

गिरती ब्याज दरों के माहौल में गिल्ट फंडों की ईल्ड गिरती है और उनकी कीमत बढ़ने लगती है। जब ब्याज दरें कमजोर होंगी तो गिल्ट को फायदा होगा।

लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि ब्याज दरें पिछले कुछ समय से ही कमजोर पड़ रही हैं, इसके अलावा गिल्ट फंड की ईल्ड एक जैसी नहीं है।

लिहाजा इसमें काफी उतार चढ़ाव है। भविष्य में रिडेम्पशन के दबाव में उस इंस्ट्रूमेंट की लिक्विडिटी और उसकी वैल्यू उस समय की कीमतों पर निर्भर करेंगीं।  लिहाजा इसमें ब्याज दरों की हलचल के साथ ही उतार-चढ़ाव की उम्मीद भी करनी चाहिए।

 

 

 

First Published - January 4, 2009 | 8:59 PM IST

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