बड़े बैंक प्रवासी भारतीयों के विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक (एफसीएनआर-बी) खातों में जमा के मुकाबले 9 गुना तक का फायदा (लीवरेज) मुहैया कराने की ढांचागत पेशकश पर कार्य कर रहे हैं। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक ने वाणिज्यिक बैंकों और उनकी शाखाओं को प्रवासी भारतीयों के एफसीएनआरबी खातों में स्पेशल स्वैप सुविधा के तहत जमा राशि पर ऋण मुहैया कराने के बारे में स्पष्टीकरण जारी कर दिया है। बैंकरों के मुताबिक इन ढांचागत पेशकश की बदौलत प्रवासी भारतीय (एनआरआई) को 12-18 प्रतिशत का प्रभावी रिटर्न अर्जित होने की उम्मीद है। हालांकि नियामक ने स्पष्ट किया है कि बैंक ऐसी जमा राशि पर ऋण दे सकते हैं और यह व्यक्तिगत रूप से बैंकों पर निर्भर करेगा कि वे एफसीएनआर-बी जमाओं के मुकाबले कितना ऋण देंगे।
निजी क्षेत्र के बैंक के एक वरिष्ठ बैंकर ने कहा, ‘हमारी समझ है कि 50 अरब डॉलर से अधिक की राशि आनी चाहिए। ज्यादातर बैंक लगभग 9 गुना लाभ की पेशकश की ओर बढ़ रहे हैं। रिजर्व बैंक ने कोई सीमा निर्दिष्ट नहीं की है – चाहे वह 3गुना, 9गुना या इससे भी अधिक हो – लेकिन मेरी समझ है कि ज्यादातर बैंक में लगभग 9 गुना तक रहेंगे। हमेशा अपवाद हो सकते हैं, लेकिन यह बाजार का उभरता हुआ मानदंड प्रतीत होता है।’उन्होंने बताया कि ग्राहकों के लिए रिटर्न बैंक के आधार पर अलग-अलग होगा। इसका कारण यह है कि जमा दरें और धन की लागत संस्थानों में भिन्न होती है।
उदाहरण के लिए यदि कोई ग्राहक जमा पर 7 प्रतिशत अर्जित करता है और इसके मुकाबले 6 प्रतिशत पर उधार लेने में सक्षम है तो अंतर (स्प्रेड) एक प्रतिशत है। 9 गुना लीवरेज मानते हुए ग्राहक अपने स्वयं के 10 लाख डॉलर पर 7 प्रतिशत अर्जित करता है और उधार लिए गए 90 लाख डॉलर उधारी पर अतिरिक्त एक प्रतिशत अर्जित करता है। ऐसे में प्रभावी रूप से यह मूल 10 लाख डॉलर पर लगभग 16 प्रतिशत रिटर्न में बदल जाता है। ज्यादातर ग्राहक आमतौर पर 12-18 प्रतिशत की सीमा में रिटर्न की ओर बढ़ सकते हैं। इसमें ज्यादातर संभवतः 12-15 प्रतिशत ब्रैकेट में आते हैं।
कुछ बड़े बैंकों ने प्रवासी भारतीय ग्राहकों के लिए 9 गुना तक फायदे (लीवरेज) की पेशकश करने वाली योजनाएं पेश की हैं। मध्यम आकार और छोटे बैंक 3-5 गुना के कम लीवरेज का विकल्प चुन सकते हैं। बैंकरों ने कहा कि 2013 में इसी तरह की योजना के दौरान लीवरेज पांच गुना से नौ गुना तक था। हालांकि, बैंकरों ने आगाह किया कि बैंकों के कोष जुटाने की क्षमता पर प्रवासी भारतीयों को दिए जाने वाले लाभ निर्भर करेगा। उनके अनुसार जिन बैंकों के थोक ऋण देने की बड़ी फ्रेंचाइजी नहीं है, उन्हें बड़े ऋण जुटाने में कठिनाई होगी।
ऊपर उद्धृत बैंकर ने कहा ‘ऐसा नहीं है कि दरों में कटौती के कारण ऑटो ऋण की मांग अचानक दोगुनी हो जाएगी। इसमें समय लगता है। इसका कारण यह है कि वितरण मशीनरी इतने अधिक अतिरिक्त ऋण मांगने वालों की जानकारी जुटाने और उन पर कार्य करने के लिए ढांचागत रूप से तैयार नहीं है। हम शायद 10-25 प्रतिशत तक ऋण बढ़ा सकते हैं, लेकिन इससे अधिक नहीं। बड़े कॉरपोरेट ऋण देने वाली फ्रेंचाइजी वाले बैंक लाभान्वित हो सकते हैं और वे इन कोषों का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरा विकल्प देनदारी प्रबंधन है – बैंक उच्च लागत वाली थोक जमाओं को परिपक्व होने दे सकते हैं और उन्हें बढ़ी हुई दरों पर नवीनीकृत करने से बच सकते हैं। यही एक कारण है कि जमा प्रमाणपत्रों की ब्याज दर में कमी आई है।’
एक निजी क्षेत्र के बैंक के एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘हम लगभग नौ गुना लीवरेज की तलाश कर रहे हैं। कुछ बैंक थोड़ा कम या थोड़ा अधिक करने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन यह भारत में अपने बही खाते में उन जमाओं का इस्तेमाल करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।’