प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक ने ओडिशा में एक नया हाई-सिक्योरिटी डेटा सेंटर तैयार कर लिया है। यह सुविधा खास तौर पर उन जगहों से दूर बनाई गई है जहां सीमा पार से कोई खतरा हो सकता है या भूकंप का जोखिम ज्यादा है। इसका मकसद देश की अहम वित्तीय व्यवस्था को और मजबूत बनाना है ताकि कोई भी मुश्किल हालात में भी काम रुके नहीं।
भुवनेश्वर के पास इंफो वैली-टू, खोरधा में 18.55 एकड़ में फैला यह ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट 2023 में शुरू हुआ था। यहां RBI के कोर कंप्यूटिंग सिस्टम रखे गए हैं जो करेंसी मैनेजमेंट, पेमेंट और सेटलमेंट ऑपरेशंस तथा रेगुलेटरी डेटा से जुड़े काम संभालते हैं।
जब RBI ने 2023 में इस कैंपस पर काम शुरू किया तो शुरुआत में किसी ने जगह पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए। लेकिन अंदरूनी बातें देखें तो लोकेशन का फैसला सिर्फ लॉजिस्टिक्स या ऑपरेशनल वजहों से नहीं हुआ। रणनीतिक सुरक्षा सबसे बड़ा फैक्टर था।
यह जगह भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं से काफी दूर है। इससे मिसाइल या ड्रोन जैसे खतरे कम हो जाते हैं। साथ ही यह देश के सबसे ज्यादा भूकंप वाले जोनों से बाहर है। ऐसे में बड़े भूकंप आने पर भी सिस्टम सुरक्षित रह सकता है। एक सेक्टर एनालिस्ट का कहना है कि यह लोकेशन वित्तीय ढांचे की सुरक्षा और बाकी जरूरी चीजों के लिए काफी सही है।
Also Read: RBI के नए नियमों के बाद अधिग्रहण फाइनैंसिंग के लिए जापानी बैंकों के साथ हाथ मिलाएगा SBI
मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में समंदर के नीचे बिछी बड़ी कम्युनिकेशन केबल्स उतरती हैं, लेकिन ओडिशा ऐसा केंद्र नहीं है। यहां इंटरनेट ट्रैफिक भी दूसरी जगहों के मुकाबले कम है, इसलिए साइबर हमलों और नेटवर्क गड़बड़ी का खतरा घट जाता है। पिछले साल भारत-पाक तनाव के दौरान, जब सीमा पर ड्रोन गतिविधि बढ़ी, एक बड़े बैंक ने एहतियातन अपना डेटा सेंटर जयपुर से मुंबई शिफ्ट कर दिया था। ऐसी घटनाओं से RBI का यह फैसला और ज्यादा समझदारी भरा नजर आता है।
ओडिशा में जमीन, पानी और बिजली सब कुछ भरपूर उपलब्ध है। भूवैज्ञानिक नजरिए से भी यहां हिमालयी क्षेत्र की तरह भूकंप का खतरा कम है। यही वजह है कि क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को यहां रखना ज्यादा सुरक्षित माना गया।
RBI का यह दूसरा डेटा सेंटर है। पहला प्राइमरी डेटा सेंटर नवी मुंबई के खारघर में पहले से चल रहा है। अब ओडिशा वाला नया सेंटर पूरी तरह टियर IV सर्टिफिकेशन वाला है। इसका मतलब है कि डिजाइन में सबसे ऊंचे स्तर की विश्वसनीयता और परफॉर्मेंस है। यहां फॉल्ट टॉलरेंस, रिडंडेंसी और सिस्टम अवेलेबिलिटी को बहुत ध्यान में रखा गया है।
दुनिया के दूसरे सेंट्रल बैंक भी यही रास्ता अपना रहे हैं। वे अपनी खुद की सुरक्षित सुविधाएं बना रहे हैं ताकि डेटा पर पूरा कंट्रोल रहे।
अमेरिका के फेडरल रिजर्व का ईस्ट रदरफोर्ड ऑपरेशंस सेंटर इसका अच्छा उदाहरण है। वहां पेमेंट और सेटलमेंट के सिस्टम को लेयर्ड फिजिकल और साइबर सुरक्षा के साथ रखा गया है। RBI भी उसी तरह की आर्किटेक्चर फॉलो कर रहा है।
फाइनेंशियल डेटा को अब देश की अहम संपत्ति माना जाता है। इसलिए उसे साइबर हमलों, वेंडर पर ज्यादा निर्भरता और किसी भी तरह की रुकावट से बचाना बहुत जरूरी है। डिजिटल लेन-देन और रियल-टाइम पेमेंट तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में सुरक्षित डेटा सिस्टम सिर्फ आईटी का मामला नहीं, बल्कि पूरे वित्तीय सिस्टम को सुचारु रखने की जरूरत बन गया है।
RBI के साथ-साथ सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसे संस्थान भी अपने डेटा सेंटर बना रहे हैं या बना चुके हैं। इससे पता चलता है कि अब बैंकिंग सेक्टर अपनी खुद की सुरक्षित व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा कर रहा है।
2025 तक RBI ने मुंबई और हैदराबाद में पायलट क्लाउड फैसिलिटी भी शुरू कर दी है। इसका मकसद फाइनेंशियल कंपनियों को लोकल क्लाउड स्टोरेज देना है। कुल मिलाकर RBI का यह कदम दिखाता है कि मिशन-क्रिटिकल सिस्टम पर कड़ा नियंत्रण रखना, बाहरी खतरे कम करना और किसी भी हालत में फाइनेंशियल बैकबोन को चलाते रखना अब नीति का हिस्सा बन गया है।
(PTI के इनपुट के साथ)