प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 3 से 5 दिसंबर तक होने वाली है। 5 दिसंबर को गवर्नर संजय मल्होत्रा फैसला सुनाएंगे कि रीपो रेट में 25 आधार अंक की कटौती होगी या फिर मौजूदा 5.5 फीसदी पर ही रुकेंगे। बाजार और अर्थशास्त्रियों के बीच इस बार राय बिल्कुल बंटी हुई है। कोई कह रहा है महंगाई बहुत नीचे चली गई है, कटौती बनती है। वहीं कुछ का मानना है कि 8.2 फीसदी की जोरदार GDP ग्रोथ के बाद अब कटौती की जल्दी नहीं है।
पिछले दो महीनों से खुदरा महंगाई (CPI) सरकार के तय 2 फीसदी निचले बैंड से भी नीचे चल रही है। अक्टूबर में तो यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। खाने-पीने की चीजें सस्ती होने और GST में कटौती की वजह से महंगाई पर लगाम लगी है। दूसरी तरफ दूसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 8.2 फीसदी आई है, जो ज्यादातर अनुमानों से कहीं बेहतर है। यही वजह है कि कटौती का फैसला आसान नहीं रह गया है।
क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी का कहना है कि अक्टूबर में महंगाई में भारी गिरावट ने 25 आधार अंक कटौती का पूरा स्पेस बना दिया है। उनका मानना है कि ग्रोथ तो मजबूत है ही, महंगाई का इतना नीचे जाना मौका दे रहा है।
HDFC बैंक की रिपोर्ट भी कहती है कि इस साल ग्रोथ उम्मीद से ज्यादा और महंगाई उम्मीद से कम रही है। रिपोर्ट में लिखा है कि अभी भी दूसरी छमाही में ग्रोथ पर कुछ रिस्क बाकी हैं और महंगाई वित्त वर्ष 27 की तीसरी तिमाही तक 4 फीसदी से काफी नीचे रहने वाली है। इसलिए दिसंबर में 25 आधार अंक कटौती की गुंजाइश बनी हुई है।
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हाउसिंग और रियल एस्टेट से जुड़े कारोबारी अशोक कपूर भी यही कहते हैं कि महंगाई रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, RBI के पास पूरी गुंजाइश है। उनका कहना है कि पहले की 100 आधार अंक कटौती और GST में राहत से हाउसिंग सेक्टर को पहले ही फायदा मिल रहा है, एक और कटौती से रफ्तार और बढ़ेगी।
बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सब्नाविस कहते हैं कि मामला बराबर का है। उनका तर्क है कि नीति आगे की सोच कर बनाई जाती है। वित्त वर्ष 26 की चौथी तिमाही और अगले साल महंगाई फिर 4 फीसदी के ऊपर जाने की संभावना है। ऐसे में रियल रीपो रेट 1 से 1.5 फीसदी के दायरे में रहेगा, जो ठीक-ठाक है। इसलिए रेट में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।
ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर भी यही राय रखती हैं। उनका कहना है कि दूसरी तिमाही में GDP 8 फीसदी के पार चली गई है, ऐसे में दिसंबर में कटौती की संभावना अब कम लग रही है, भले ही अक्टूबर में महंगाई सबसे नीचे रही हो।
SBM बैंक के हेड-फाइनेंशियल मार्केट्स मंदार पितले भी स्टेटस-को बनाए रखने के पक्ष में हैं। उनकी दलील है कि अभी बैलेंस ऑफ पेमेंट को सपोर्ट करने और बैंकों के पास जमा बढ़ाने के लिए ऊंचे ब्याज दरों की जरूरत है। कटौती हुई तो लोग बैंक डिपॉजिट से पैसा निकालकर दूसरी जगह लगा सकते हैं।
SBI की रिसर्च रिपोर्ट भी कहती है कि इतनी अच्छी ग्रोथ और इतनी कम महंगाई के बीच अब RBI को बाजार को साफ-साफ बताना होगा कि आगे रेट का रास्ता क्या होगा। अभी न्यूट्रल रुख ही बना रहने की उम्मीद है।
ज्यादातर विशेषज्ञों का अनुमान है कि भले फैसला जो भी हो, गवर्नर का लहजा न्यूट्रल से थोड़ा डोविश (कटौती की तरफ झुका हुआ) रहेगा और लिक्विडिटी को लेकर आश्वासन जरूर मिलेगा। साथ ही आगे भी ग्रोथ के हिसाब से और कटौती की गुंजाइश का संकेत मिल सकता है।
(PTI के इनपुट के साथ)