आर्थिक विशेषज्ञों ने भारत की वृद्धि दर के अनुमान को नीचे की ओर से संशोधित करना शुरू कर दिया है क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है। व्यापार मार्गों में दिख रही बाधाओं के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की संतुलित स्थिति को खतरा दिख रहा जो मजबूत विकास, कम महंगाई और प्रबंधित बाह्य घाटा से जुड़ा है।
आईसीआईसीआई बैंक ने एक शोध रिपोर्ट में कहा कि गंभीर आपूर्ति बाधाएं एक महीने के भीतर सुलझनी चाहिए और इसने वित्त वर्ष 2027 के जीडीपी वृद्धि अनुमान को 50 आधार अंकों तक घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘अगर संघर्ष एक महीने से ज्यादा समय तक चलता है और होर्मुज स्ट्रेट के जरिये ऊर्जा परिवहन कम होता है तब हमारे अनुमान पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, ऐसी स्थिति वैश्विक आर्थिक वृद्धि को भी प्रभावित करेगी और भारत के लिए अतिरिक्त कठिनाई पैदा कर सकती है।’
गोल्डमैन सैक्स पहली बड़ी एजेंसी है जिसने भारत के वित्त वर्ष 2027 के वृद्धि अनुमान को घटाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया जो पहले 7 प्रतिशत था और इसके पीछे धीमी निर्यात वृद्धि और स्थिर महंगाई को प्रमुख कारण बताया गया।
अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आर्थिक वृद्धि वित्त वर्ष 2026 के मार्च तिमाही में भी प्रभावित हो सकती है हालांकि कम असर के साथ। ब्रोकरेज फर्म एमके ग्लोबल ने पहले वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही के लिए जीडीपी वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था लेकिन कहा कि अब वह अपने अनुमान में नीचे की ओर संशोधन कर सकते हैं क्योंकि वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम और ऊर्जा लागत तथा व्यापार प्रवाह पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखा जा रहा है।
भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने कहा कि अगर ईरान युद्ध कम से कम एक महीने तक चलता है तब असली नुकसान वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दिखाई देगा। उन्होंने कहा, ‘व्यापार मोर्चे पर अधिक बाधा दिख सकती है क्योंकि शिपमेंट रोक दिए जाते हैं। ऊर्जा-गहन विनिर्माण क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जबकि सेवा क्षेत्र तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में हो सकता है। कुल मिलाकर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध कितना लंबा चलता है।’
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को कहा कि अगर संघर्ष या इसके प्रभाव लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो ईरान संकट का भारत की वृद्धि, महंगाई और चालू खाते पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत की वृहद् अर्थव्यवस्था की स्थिरता को देखते हुए, भारत कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करेगा।
सरकार ने रसोई गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया है, लेकिन तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने अभी तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई हैं। इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र के पंत ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ता, तेल कंपनियां और सरकार में से कौन कितना उठाता है।
पिछले दो सालों से खुदरा ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस दौरान जब कच्चे तेल की कीमतें ज्यादा थीं तब तेल कंपनियों ने नुकसान सह, और जब वैश्विक तेल कीमतें कम हुईं तब उस नुकसान की भरपाई कर ली।
एक अर्थशास्त्री ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तब 4 मई को राज्य विधानसभा चुनावों का दौर खत्म होने के बाद कीमतें बढ़ सकती हैं। उन्होंने कहा, ‘इससे न केवल महंगाई बढ़ेगी बल्कि माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है जिसका नकारात्मक असर आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।’